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संपादकीय: वंचित वर्ग के बालक भी बेहतर शिक्षा के हकदार

शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीइ) के तहत निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें समाज के कमजोर वर्गों के लिए आरक्षित करने का प्रावधान वर्षों से मौजूद है। इस प्रावधान का प्रभावी क्रियान्वयन अब भी एक बड़ी चुनौती है।

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गरीब और वंचित वर्ग के बच्चों के लिए मुफ्त शिक्षा सुनिश्चित करना सरकार और अधिकारियों की जिम्मेदारी है। सुप्रीम कोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ राज्य सरकारों और स्थानीय अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने को कहा है कि वे वंचित वर्ग के बच्चों को आसपास के स्कूलों में प्रवेश दिलाएं। साथ ही कोर्ट ने यह भी कहा कि स्कूलों की भी यह जिम्मेदारी है कि वे शिक्षा के अधिकार (आरटीइ) और संविधान के अनुच्छेद 21 (ए) के तहत अपने यहां दाखिला लेने वाले बच्चों में से 25 फीसदी ऐसे बच्चों को अनिवार्य रूप से प्रवेश दें।

कोर्ट का यह स्पष्ट और सख्त संदेश केवल एक कानूनी टिप्पणी नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का आह्वान है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीइ) के तहत निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें समाज के कमजोर वर्गों के लिए आरक्षित करने का प्रावधान वर्षों से मौजूद है। इस प्रावधान का प्रभावी क्रियान्वयन अब भी एक बड़ी चुनौती है। अदालत ने इसी चुनौती की ओर ध्यान दिलाते हुए इसे राष्ट्रीय मिशन का रूप देने की जरूरत पर बल दिया है। संविधान का अनुच्छेद 21(ए) शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाता है और राज्य को यह दायित्व सौंपता है कि वह 6 से 14 वर्ष के प्रत्येक बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराए। आरटीइ के तहत निजी, गैर-अनुदानित स्कूलों को भी अपनी कक्षा की कुल संख्या का 25 प्रतिशत हिस्सा कमजोर और वंचित वर्गों के बच्चों के लिए आरक्षित करना अनिवार्य है। अदालत का यह कहना कि इस प्रावधान में समाज की सामाजिक संरचना को बदलने की असाधारण क्षमता है, अत्यंत महत्वपूर्ण है। खास बात है कि जब अलग-अलग सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के बच्चे एक ही कक्षा में पढ़ते हैं, तो न केवल शिक्षा का स्तर सुधरता है, बल्कि आपसी समझ, सहिष्णुता और समानता की भावना भी मजबूत होती है। यह व्यवस्था गरीबी और अवसरों के अभाव के उस दुष्चक्र को तोड़ सकती है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी बने रहते हैं।

हालांकि जमीनी हकीकत यह है कि आरटीइ के 25 प्रतिशत कोटे का क्रियान्वयन कई राज्यों में अधूरा और असमान है। कहीं स्कूल बहाने बनाकर प्रवेश से इनकार करते हैं, तो कहीं सरकारी स्तर पर निजी स्कूलों के पुनर्भरण राशि चुकाने में देरी को इसकी वजह बताया जाता है। कई अभिभावकों को तो इस अधिकार की जानकारी ही नहीं होती। रही-सही कसर स्थानीय प्रशासन की उदासीनता से पूरी हो जाती है। शिक्षा अधिकार कानून लागू करने के लिए पारदर्शी प्रवेश प्रक्रिया के साथ समय पर स्कूलों को प्रतिपूर्ति करना जरूरी है। सख्त निगरानी तंत्र तो हो ही, नियमों का उल्लंघन करने पर दंडात्मक कार्रवाई भी हो। इससे वंचित वर्ग के बच्चे न सिर्फ बेहतर शिक्षण संस्थाओं में प्रवेश पा सकेंगे, बल्कि समानता का वातावरण भी उपलब्ध होगा। इच्छा शक्ति हो तो यह राह कोई मुश्किल नहीं है।