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सतपुड़ा के जंगलों की जड़ी-बूटियों में है कैंसर की बीमारी का फ्री इलाज

जिले की ख्याति वैसे तो सतपुड़ा के जंगलों की वजह से हैं, लेकिन यहां के जंगलों में कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी को खत्म कर देने वाली बहुमूल्य जड़ी-बूटियां भी मिलती है। जिला मुख्यालय से 50 किमी दूर घोड़ाडोंगरी ब्लॉक के छोटे से ग्राम कान्हावाड़ी में रहने वाले भगत बाबूलाल पिछले कई सालों से जंगल में मिलने वाली जड़ी-बूटी एवं औषधियों के द्वारा कैंसर जैसी बीमारी से लोगों को छुटकारा दिलाने में लगे हुए हैं।

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कैंसर डे विशेष

Bhagat Babulal treating patients

बैतूल। जिले की ख्याति वैसे तो सतपुड़ा के जंगलों की वजह से हैं, लेकिन यहां के जंगलों में कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी को खत्म कर देने वाली बहुमूल्य जड़ी-बूटियां भी मिलती है।जिला मुख्यालय से ५० किमी दूर घोड़ाडोंगरी ब्लॉक के छोटे से ग्राम कान्हावाड़ी में रहने वाले भगत बाबूलाल पिछले कई सालों से जंगल में मिलने वाली जड़ी-बूटी एवं औषधियों के द्वारा कैंसर जैसी बीमारी से लोगों को छुटकारा दिलाने में लगे हुए हैं। यहां आने वाले लोगों का दावा है कि यदि परहेज के साथ जड़ी-बूटी का सेवन किया जाए तो कैंसर से निजात मिल सकती है। यही कारण है कि देश भर से लोग यहां इलाज कराने बड़ी संख्या में पहुंचते हैं। चूंकि मरीजों को उनकी दवा से फायदा पहुंचता है इसलिए उनके यहां प्रत्येक रविवार एवं मंगलवार को दिखाने वालों का ताता लगा रहता है। यहां भगत को दिखाने के लिए नंबर का टोकन लेना पड़ता है।

एक दिन पहले लगाना पड़ता है नंबर
कान्हावाड़ी में इलाज के लिए बाहर से आने वाले मरीजों को एक दिन पहले नंबर लगाना पड़ता है। एक दिन में करीब एक हजार से ऊपर मरीज यहां इलाज के लिए पहुंचते हैं। खासकर महाराष्ट्र से बड़ी संख्या में लोग इलाज के लिए यहां एक दिन पहले ही रात में आ जाते हैं। भगत बाबूलाल जो जड़ी-बूटी देते हैं उसका असर परहेज करने पर ही होता है। इलाज के दौरान मांस-मदिरा सहित अन्य प्रकार की सब्जियां प्रतिबंधित कर दी जाती है। जिसका कड़ाई से पालन करना होता है। भगत द्वारा मरीजों की नाड़ी पकड़कर ही मर्ज का इलाज किया जाता है।

शहर में चल रहा मेजर ध्यानचंद कैंसर जागरूकता मिशन

कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी से जंग जीत चुके बैतूल के हेमंतचंद्र बबलू दुबे अब कैंसरे के प्रति जंग लड़ रहे हैं। उन्होंने हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद की स्मृति में मेजर ध्यानचंद कैंसर जागरूकता मिशन संचालित किया है। जिसके तहत वे कैंसर जैसी बीमारी के प्रति लोगों को जागरूक करने के साथ गरीब कैंसर पीडि़त मरीजों को आर्थिक सहायता भी मुहैया कराते हैं। उनके द्वारा प्रतिदिन ५० लोगों से संपर्क कर उन्हें कैंसर के प्रति जागरूक किया जा रहा है। साथ ही कैंसर की बीमारी में इस्तेमाल होने वाले लक्ष्मी तरू के पौधे भी उनके द्वारा शहर में लगाए गए हैं। उनका मानना है कि जागरूकता से ही कैंसर को हराया जा सकता है। कैंसर से लोगों को छुटकारा दिलाना ही उनका मिशन है। उन्होंने बताया कि जिले में हर साल ५०० से ८०० के बीच कैंसर के मरीज सामने आ रहे हैं। कई मामले तो जागरूकता की कमी की वजह से सामने ही नहीं आ पाते हैं।

विश्व कैंसर दिवस का इतिहास
यूआईसीसी (केंद्रीय अंतरराष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण) के नियंत्रण में और विभिन्न दूसरे प्रसिद्ध कैंसर शोध संस्थानों, उपचार केंद्रों और मरीजों के समूह की सहायता के साथ 1933 में स्वीजरलैंड के जेनेवा में विश्व कैंसर दिवस मनाने की योजना की शुरूआत हुई थी। इस घातक बीमारी को नियंत्रित करने और लडऩे के लिए सभी जरूरतों को पूरा करने के लिए विश्व कैंसर दिवस के कार्यक्रम की स्थापना हुई थी। वर्ष 2019 से लेकर 2021 तक तीन साल के लिए विश्व कैंसर दिवस का थीम मैं हूं और मैं रहूंगा रखी गई है। इसके पूर्व 2016 से 2018 तक कैंसर दिवस की थीम, हम कर सकते हैं। मैं कर सकता हूं। रखी गई थी।

इनका कहना
- पहले राज्य बीमारी सहायता निधि के प्रकरणों में कैंसर के मरीजों की संख्या ज्यादा हुआ करती थी। चूंकि योजना बंद हो गई है इसलिए वर्तमान में कैंसर मरीजों का रिकॉर्ड नहीं है, लेकिन इस बीमारी के 500 से 1000 के बीच मरीज प्रतिवर्ष सामने आ रहे हैं। जागरूकता से ही इस बीमारी से बचा जा सकता है।
- जीसी चौरसिया, सीएमएचओ स्वास्थ्य विभाग बैतूल।

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