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कोरोना की जांच कराने से अब डर रहे लोग, अस्पताल में भर्ती नहीं होना चाहते संदिग्ध

-सैंपल देने के बाद भर्ती होने से कई लोग कतरा रहे इसलिए लक्षण आने के बाद जांच कराने में करते हैं देरी तो पड़ोसियों की प्रतिक्रिया से डरकर नहीं कराते जांच

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कोरोना की जांच कराने से अब डर रहे लोग, अस्पताल में भर्ती नहीं होना चाहते संदिग्ध

कोरोना की जांच कराने से अब डर रहे लोग, अस्पताल में भर्ती नहीं होना चाहते संदिग्ध

भरतपुर. जिले में कोरोना की दस्तक को चार महीने से अधिक हो चुके हैं, बावजूद अब भी लक्षण वाले संदिग्ध मरीज तक जांच कराने से डर रहे हैं। इस डर के पीछे रिपोर्ट पॉजिटिव आने की आशंका तो रहती ही है, सैंपल व उपचार से जुड़ी व्यवस्थाएं भी हैं। यही कारण है कि कई लोग लक्षण आने के बाद तीन-चारदिन बाद तक जांच व सैंपल कराने नहीं पहुंच रहे हैं। सर्दी-जुखाम, बुखार होने पर कोरोना संक्रमित होने की आशंका बन जाती है। ऐसी स्थिति में चिकित्सकों का कहना है कि संदिग्ध मरीज को बिना देर किए संबंधित सेंटर पहुंच कर अपनी जांच और जरुरत पडऩे पर सैंपल टेस्ट कराना चाहिए। चार महीने में हर कोई जांच व सैंपल के महत्व को समझ चुका है बावजूद अब भी कई मामलों में मरीज शुरुआती दो-चार दिन तक अस्पताल जाने से बचते हैं। वे अपने स्तर पर ही प्रयास करते हैं कि संभवत: उन्हें कोरोना न होकर आम सर्दी जुखाम ही है। जब स्वास्थ्य में नहीं होता या और बिगडऩे लगता है तो फिर वह अस्पताल पहुंचता है। ऐसे में मरीज के स्वास्थ्य पर तो प्रतिकूल असर पड़ता ही है, साथ ही करीबियों पर खतरा बढ़ जाता है। कोरोना को लेकर लोगों की मनोस्थिति जानने से सामने आया है कि संक्रमण को लेकर लोग अब भी कुछ बातों से डर रहे हैं।

कोरोना से जुड़े डर जिन्हें दूर करने की जरुरत

1. कहीं भर्ती न कर लें: थोड़े लक्षण आने पर मरीज अब भी जांच से बच रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि अस्पताल गए तो उन्हें भर्ती कर लिया जाएगा।
होना चाहिए-स्थिति अनुरुप निर्णय लिया जाना चाहिए।

डरें नहीं क्योंकि: स्वास्थ्य विभाग की मजबूरी है कि सैंपल लेने के बाद भर्ती करना पड़ता है। क्योंकि पूर्व में ऐसे मामले भी हुए, इसमें सैंपल देने के बाद मरीज होम क्वॉरंटीन रहने की जगह यहां-वहां घूमता रहा। स्वास्थ्य टीम को संक्रमण की अधिक आशंका होने पर भर्ती करने की स्थिति बनती है। इसमें भी सभी पक्ष देखे जाते हैं। इसके बाद भी यदि भर्ती होना पड़े तब भी यह स्थिति स्वयं व अपनों को खतरे में डालने से बेहतर है।

2. पड़ोसी क्या कहेंगे: जांच कराने के लिए संक्रमितों के हिसाब से संबंधित एरिया में टीम भी जाती है। बावजूद लोग डरते हैं कि यदि टीम घर आई तो आस-पड़ोस के लोग क्या सोचेंगे। कहीं सामाजिक प्रतिष्ठा धूमिल न हो जाए।
होना चाहिए: यह समझने की जरुरत है कि यह एक बीमारी है न कोई अपराध। कॉलोनीवासियों को भी ऐसे अघोषित सामाजिक बहिष्कार की जगह मनोबल बढ़ाना चाहिए ताकि मरीज व परिजनोंको आत्मग्लानि न हो और इस समस्या से बाहर आने में मदद मिल सके।

डरें नहीं क्योंकि: बीमारी किसी को भी हो सकती है। इसलिए दूसरों के नजरिए से ज्यादा जरूरी अपना व परिवार का स्वास्थ्य है। इसलिए समय पर बीमारी का पता चलना जरूरी है। ताकि उपचार हो सके।

3. कहीं संक्रमित न हो जाएं: लक्षण है लेकिन कोरोना नहीं होने की स्थिति में जांच के लिए अस्पताल जाने-आने या संदिग्ध मरीजों के साथ कुछ दिन भर्ती रहने पर कहीं संक्रमित न हो जाएं, इस डर से लोग जांच कराने से कतराते हैं।
होना चाहिए: लोगों में यह विश्वास जगाया जाए कि उनकी सुरक्षा के आवश्यक सभी इंतजाम है। शौचालय सहित अन्य सुविधाओं में और बढोतरी हो।

डरें नहीं क्योंकि: आरबीएम अस्पताल में ओपीडी व भर्ती करने के लिए अलग-अलग द्वार है। इनकी स्वास्थ्य टीम भी अलग-अलग होती है। क्वॉरंटीन सेंटर में दूरी का ध्यान रखा जाता है। मास्क पहनकर रहने, दूसरों से दूरी बनाए रखने से संक्रमित होने का खतरा न के बराबर हो जाता है। जांच रिपोर्ट भी सैंपल के अगले दिन ही मिल जाती है।