OMG जिला के निजी और सरकारी अस्पतालों में कुल 103 वेंटीलेटर, एक भी नहीं खाली

कोरोना महामारी के बीच इंजेक्शन को लेकर जद्दोजहद जारी.

By: Abdul Salam

Updated: 22 Apr 2021, 11:43 PM IST

भिलाई. जिला के निजी और सरकारी अस्पतालों में कुल 103 वेंटीलेटर मौजूद है। जिसमें से एक भी इस वक्त खाली नहीं है। क्रिटिकल मरीजों को उसमें रखा गया है। अस्पताल में इसके अलावा कोरोना संक्रमित मरीजों के लिए बेड की व्यवस्था भी है। जिसमें से 90 से 99 फीसदी में मरीज मौजूद हैं। इस बीच रेमडेसिविर इंजेक्शन को लेकर मरीजों के परिजनों में होड़ लगी है। जिसकी वजह से इसकी जमकर काला बाजारी हो रही है। इस इंजेक्शन के संबंध में लोगों को अधिक जानकारी नहीं है, बावजूद इसके वे किसी भी तरह इसे लगवाने के लिए हर तरह से कोशिश कर रहे हैं। चिकित्सक इस इंजेक्शन को साफ तौर पर अंडर ट्रायल दवा बता रहे हैं, लेकिन मरीजों के साथ रहने वाले इसको सुनने तक राजी नहीं है। जिला में कोरोना मरीजों के लिए कुल बेड 2326 हैं, जिसमें से जिसमें से 118 बेड खाली है।

सरकारी अस्पतालों में दस फीसदी बेड है खाली
जिला में मौजूद सरकारी अस्पतालों में इस वक्त 900 बेड है, जिसमें से 800 बेड में मरीज मौजूद हैं। इस तरह से महज दस फीसदी खाली है। वह भी हर दिन पॉजिटिव मरीजों की लिस्ट आते ही भरते जा रही है। सरकारी अस्पताल लोगों के लिए इस वक्त उम्मीद की किरण के तौर पर देखा जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग ने भी वहां चिकित्सकों को तैनात किया है। बावजूद इसके मरीजों की शिकायत है कि चिकित्सक उनका हाल जानने नहीं पहुंच रहे हैं। इस दिक्कत को जल्द दूर किया जाना चाहिए। वार्डों में लगे सीसीटीवी कैमरा के फुटेज को जिला प्रशासन खुद चेक करे, तो यह समस्या भी दूर हो सकती है।

निजी अस्पताल में दो फीसदी बेड खाली
जहां सरकारी अस्पताल में करीब दस फीसदी बेड खाली है। जिला के निजी अस्पतालों में 879 बेड हैं, जिसमें से 861 में मरीज दाखिल हैं। इस तरह से निजी अस्पतालों में महज दो फीसदी बेड में मरीज नहीं है। इसके अलावा भिलाई इस्पात संयंत्र के सेक्टर-9 अस्पताल में 547 बेड है, जिसमें से कोई बेड भी खाली नहीं है। पॉजिटिव होने के बाद मरीजों में दहशत कायम हो रहा है। असल में वे दवा खाने के साथ-साथ बताए गए निर्देश का पालन करते हैं तो जल्द ठीक हो सकते हैं, लेकिन लोग कई बार डर की वजह से अस्पताल तक का रुख कर रहे हैं। मरीजों को सलाह देने वाले मुकेश चंद्राकर ने बताया कि मरीज और उनके परिजन खुद ही तय कर रहे हैं कि उनको वेंटिलेटर में रखने की जरूरत है। यह पहली बार हो रहा है, लोगों को समझाना पड़ रहा है कि पहले जिला अस्पताल, दुर्ग या किसी भी अस्पताल में जाकर दाखिल हों, उसके बाद चिकित्सक तय करेंगे कि ऑक्सीजन में रखने लायक हैं या वेंटिलेटर में।

विशेषज्ञों से पहले लें राय तब लगवाएं मरीजों को रेमडेसिविर इंजेक्शन
रेमडेसिविर इंजेक्शन की मांग जिला में एकाएक बढ़ गई है। कोरोना संक्रमित मरीज को इसकी जरूरत हो या नहीं, लेकिन मरीजों के रिश्तेदार किसी भी तरह इस इंजेक्शन को लगवा लेना चाहते हैं। इसके लिए वे हर तरह से प्रयास कर रहे हैं। जिसकी वजह से ही इस इंजेक्शन की काला बाजारी जमकर हो रही है।

रेमडेसिविर लाइफ सेविंग ड्रग नहीं
होम आइसोलेशन कंट्रोल सेंटर प्रभारी, मेडिकल आफिसर डॉक्टर रश्मि भुरे ने बताया कि लोगों में भ्रम है कि रेमडेसिविर दवा दे देने से ही मरीजों की जान बच जाएगी। जबकि रेमडेसिविर लाइफ सेविंग ड्रग नहीं है। अभी यह अंडर ट्रायल दवा है। अलग-अलग मरीजों में इसका अलग-अलग असर होता है। रेमडेसिविर के साथ ही अनेक स्टेराइड और एंटीबायोटिक दवाएं हैं जो मरीजों को दी जाती हैं और इनसे मरीज की रिकवरी तेज होती है।

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