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कभी सहानुभूति तो कभी नाराजगी ने तय की चुनाव में हार-जीत

इंदिरा, राम मंदिर और मोदी की सुनामी ने पलटे समीकरण
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भोपाल

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Anil Chaudhary

•

Updated: 1 Oct 2018, 5:22 AM IST

They take so much votes that the equation of BJP-Congress candidate's

bjp congress bsp

भोपाल. प्रदेश में पिछले तीन दशकों से भाजपा-कांग्रेस का पॉकेट वोट 30-30 फीसदी के ऊपर रहा है। हालांकि, कांग्रेस के कमिटेड वोट में लगातार गिरावट आई है, लेकिन 30 प्रतिशत के नीचे तक की नहीं। उधर, भाजपा बढ़ते हुए 35-36 प्रतिशत समर्पित मतदाताओं पर जा पहुंची है। दोनों दलों के अपने वोट बैंक होने के बाद भी यहां कई बार सरकारें बदली हैं। इसके पीछे का कारण है विशेष लहर माना गया। देश और प्रदेश में चली लहर ने किसी एक राजनीति दल को पिछले चुनाव की तुलना में औसतन 6-8 फीसदी तक ज्यादा वोट दिलवाए, जिससे उस दल की सरकार बनी।

इंदिरा लहर में बहे वोट
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1985 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 320 में से 250 सीटें मिली थीं। वोटों का स्विंग होना इंदिरा लहर का नतीजा माना गया। कांग्रेस को 48.87 फीसदी वोट मिले। भाजपा को इस चुनाव में 32.45 प्रतिशत वोट मिले थे।

राम मंदिर और बोफोर्स तोप की गूंज
1990 के विधानसभा चुनाव के समय देश में बोफोर्स तोप घोटाला गूंज रहा था। उधर, भाजपा ने राम मंदिर का राग भी छेड़ दिया था। लालकृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा ने भाजपा को भारी स्विंग दिलाई। इस चुनाव में कांग्रेस प्रदेश में तब तक के न्यूनमतम रेकॉर्ड 56 सीटों पर सिमट गई थी। उधर, भाजपा को 220 सीटों मिलीं। पिछले भाजपा को 6.69 प्रतिशत की स्विंग मिली थी। सुंदरलाल पटवा ने सरकार बनाई। इस चुनाव में भाजपा को 39.14 और कांग्रेस को 33.38 प्रतिशत वोट मिले थे।

राष्ट्रपति शासन के बाद कांग्रेस के पक्ष में
1992 में बाबरी मस्जिद टूटने के बाद मध्यप्रदेश में दंगे हुए। यहां पटवा सरकार भंग करके एक साल तक राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। 1993 में हुए विधानसभा चुनाव तक एक बार फिर परिदृश्य बदला। कांग्रेस के पक्ष में लहर चली। इस बार भाजपा के पिछले चुनाव से मात्र 0.32 प्रतिशत वोट कम हुए, लेकिन कांग्रेस के पक्ष में 7.29 फीसदी वोट बढ़ गए। भाजपा को 117 सीटें और 38.82 वोट से संतोष करना पड़ा। कांग्रेस को 174 सीटें और 40.67 प्रतिशत वोट मिले।

दिग्विजय सरकार के खिलाफ नाराजगी बनी तूफान
विधानसभा चुनाव 2003 में भाजपा के पक्ष में तूफानी लहर चली। दस साल के दिग्विजय सरकार के कार्यकाल के बाद जनता में कांग्रेस के प्रति भारी नाराजगी थी। भाजपा ने मौके को भांपते हुए फायर ब्रांड नेत्री उमा भारती को सीएम कैंडीडेट के रूप में मैदान में उतारा। इस चुनाव में भाजपा को तब तक के रेकॉर्ड 42.50 फीसदी वोट मिले। यह 1998 से 3.22 प्रतिशत ज्यादा थे। कांग्रेस ने 8.98 प्रतिशत वोट का गोता लगाया। उसे 31.61 प्रतिशत ही वोट मिले। कांग्रेस इतिहास में पहली बार मात्र 38 सीटों पर सिमट गई। भाजपा को रेकॉर्ड 173 सीटें मिलीं।

गुटबाजी में फंसी कांग्रेस नहीं बना पाई लहर
विधानसभा चुनाव 2008 में कोई स्विंग नहीं था। भाजपा सरकार में इन पांच सालों में तीन मुख्यमंत्री बने। डंपर जैसे कई मामले थे, लेकिन गुटबाजी में फंसी कांग्रेस कोई लहर नहीं ला पाई। भाजपा का वोट घटकर 37.64 प्रतिशत पर और सीटें 143 पर आ पहुंची, लेकिन कांग्रेस 71 सीटों और 32.39 प्रतिशत वोट पर ही ठहर गई।

मोदी की आंधी से भाजपा हुई मजबूत
लोकसभा चुनाव 2014 के लिए भाजपा ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया। पूरे देश में मोदी की आंधी चली और इसी दौर में 2013 में हुए विधानसभा के चुनाव में भाजपा ने वोटों का बड़ा स्विंग अपने खाते में कराया। भाजपा को 44.88 प्रतिशत वोट मिले जो पिछले चुनाव से 7.24 प्रतिशत ज्यादा थे। सीटें भी 143 से बढ़कर 165 हो गईं। 2008 की तुलना में कांग्रेस का वोट लगभग 4 फीसदी बढ़कर 36.38 हो गया, लेकिन सीटें घटकर 58 रह गई।