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7वीं सदी की अमर प्रेम कहानी है लैला-मजनू

शहीद भवन में नाटक 'लैला मजनू' और 'व्यंग्य परसाई' का मंचन

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7वीं सदी की अमर प्रेम कहानी है लैला-मजनू

7वीं सदी की अमर प्रेम कहानी है लैला-मजनू

भोपाल। रंग माध्यम नाट्य संस्था की ओर युवा अनुनाद के तहत सोमवार को दो नाटक 'लैला मजनू' और 'व्यंग्य परसाई' का मंचन किया गया। लैला मजनू का नाट्य आलेख और निर्देशन अधीशा नायर और विकास शर्मा का है। एक घंटे 10 मिनट के इस नाटक में ऑनस्टेज 12 कलाकारों ने अभिनय किया। नाटक में अरेबिक म्यूजिक का यूज किया गया। हैवी सेट पर सपने को दृश्यों को दिखाने के लिए लाइटिंग इफैक्ट का यूज किया गया। दृश्यों को फेडआउट करने की बजाए स्पॉट लाइटिंग पर फोकस किया गया। वहीं, व्यंग्य परसाई का नाट्य आलेख और निर्देशन अंबुज ठाकुर और मोहित हुरमाले का रहा। 50 मिनट के इस नाटक में 7 कलाकारों ने अभिनय किया है। इसमें तीन कहानी लिट्रेचर ने तुम्हें मारा, भगत की गत, एक गौभक्त से भेंट पर नाटक तैयार किया गया।

7वीं सदी की कहानी है लैला-मजनू
नाटक 'लैला मजनू' की कहानी सरदार गुरुबख्श सिंह की प्रेम कथा संग्रह कागा सब तन खाइयों पर बेस्ड है। लैला-मजनू की कहानी 7वीं सदी की है। उस समय अरब के रेगिस्तानों में अमीरों का बसेरा हुआ करता था। उन्हीं अमीरों में से एक अरबपति शाह का बेटा कैस था। उसे लैला से मोहब्बत हो जाती है। लैला के घरवालों को मजनू पसंद नहीं आता। लैला की शादी इब्बन से कर दी जाती है। वह पति को भी कह देती है कि वह मजनू से प्यार करती है। मजनू की याद में वह बीमार रहने लगती है। लैला की हालत के बारे में सुनकर मजनू तपते रेगिस्तान से होता हुआ लैला के पास पहुंचता है। उसकी हालत देख लोग उसे पत्थर मार-मारकर भगाने लगते हैं। दोनों के प्यार में ऐसी सच्चाई और ताकत होती है कि चोट मजनू को लगती है और घायल लैला हो जाती है। न मिल पाने के दु:ख में मजनू की मौत हो जाती है। लैला की सांसें थमते ही मजनू भी दुनिया से रूखसत ले लेता है। नाटक की शुरुआत में दोनों कफन से उठकर बाहर आते हैं और अपनी कहानी सुनाते हैं, अंतिम सीन भी यही होता है।

देवता बदलना आसान है देवी बदलना मुश्किल
नाटक 'व्यंग्य परसाई' के माध्यम से हरिशंकर परसाई के जीवन, उनके विचारों को दिखाने का प्रयास किया गया। परसाई नेरेटर बनकर खुद अपनी कहानी बयां करते हैं। उन्होंने हमेशा अपनी कलम से ढोंग, आडम्बर, हिप्पोक्रेसी के खिलाफ आवाज उठाई। उन्होंने धन का मोह छोड़कर साहित्य को चुना। उन्होंने अपनी नौकरी तक छोड़ दी। वे कहते थे कि देवता(नौकरी) को छोडऩा आसान काम नहीं है, लेकिन देवी(साहित्य) को छोडऩा तो और भी मुश्किल काम है। नाटक में दिखाया गया कि लोग पूजा-पाठ और हवन से भगवान को प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं, इसके लिए लाउडस्पीकर लगाकर शोर किया जाता है। इस आडम्बर से हजारों लोगों को तकलीफ सहना पड़ती है। गौभक्त से भेंट कहानी के माध्यम से ढोंगी बाबा और तथाकथीत स्वामी पर चोट की गई है कि वे किस तरह गौरक्षा को मुद्दा बनाकर लोगों की भावनाओं से खेलते हैं।