भोपाल

जब माखन लाल चतुर्वेदी ने ठुकरा दी थी CM की कुर्सी

लॉटरी से निकला था Madhya Pradesh First Chief Minister नाम पर बनने से कर दिया था इनकार

2 min read
Jan 30, 2022
political Kissa Makhanlal Chaturvedi Khandwa About MP CM

भोपाल. राजनीति में पद पाने की लालसा में आज क्या कुछ नहीं होता। पार्टी, शहर, सीट, नेता सब इधर-उधर जाते हैं। पर यह किस्सा मूल्यों का है। देश में यह पहली ही बार हुआ था जब माखनलाल चतुर्वेदी ने Madhya Pradesh First Chief Minister बनने का प्रस्ताव तक ठुकरा दिया था। यह मशहूर किस्सा कवियत्री महादेवी वर्मा दादा की बात चलने पर अपने सहयोगियों को सुनाया करती थीं। आजादी के बाद वर्ष 1956 में मध्यप्रदेश राज्य बना, तब सवाल उठा कि नए राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी किसे दी जाए। उस समय किसी भी एक नाम पर सहमति नहीं बन पा रही थी। विचार-विमर्श के बाद तय हुआ कि पंडित माखनलाल चतुर्वेदी, पंडित रविशंकर शुक्ल और पंडित द्वारका प्रसाद मिश्रा में से किसी एक को इस पद से सुशोभित करना चाहिए। कागज की तीन पर्चियां बनाकर एक लॉटरी निकाली जाए। इस लॉटरी में Pandit Makhanlal Chaturvedi का नाम निकला, इस तरह यह तय हुआ कि पहले सीएम वे ही होंगे। कांग्रेस के उस समय के कई नेता दादा के पास गए और उन्हें सीएम बनने की सूचना देकर बधाई दी।
दादा के खंडवा निवासी भतीजे प्रमोद चतुर्वेदी बताते हैं, 'श्रीकांत जोशी की किताब 'यात्रा पुरुष' में भी इस घटना का उल्लेख है। पंडित जी ने कांग्रेस नेताओं से कहा था, 'मैं पहले से ही शिक्षक और साहित्यकार होने के नाते 'देवगुरु' के आसन पर बैठा हूं, मेरा ओहदा घटाकर तुम लोग मुझे 'देवराज' के पद पर बैठना चाहते हो, जो मुझे कभी स्वीकार नहीं है'। इस तरह दादा के सीएम पद के इनकार के बाद रविशंकर शुक्ल को पहले मुख्यमंत्री के रूप में कुर्सी पर बैठाया गया था।

साहित्य-पत्रिकारिता में लगाया ध्यान
गौरतलब है कि आजादी के बाद से ही दादा ने स्वयं को कांग्रेस से पूरी तरह अलग कर अपना ध्यान साहित्य और पत्रकारिता लेखन की ओर केंद्रित कर लिया था। गांधीजी की तरह उनका भी मानना था कि कांग्रेस का गठन आजादी के लिए किया गया है, इसलिए इस पार्टी को आजादी के बाद खत्म कर नए सिरे से राजनीति शुरू करनी चाहिए।

राष्ट्रपिता पहुंचे थे उनके गांव
एक संयोग यह भी है कि पं. माखनलाल चतुर्वेदी का निधन 30 जनवरी को हुआ और उनके प्रिय महात्मा गांधी का भी उसी दिन, समय भी लगभग वही 3 से 5 बजे के बीच का था। महात्मा गांधी 7 दिसंबर 1933 को माखनलाल चतुर्वेदी की जन्मस्थली बाबई (होशंगाबाद) पहुंचे। तब उन्होंने कहा था- मैं बाबई जैसे छोटे स्थान पर इसलिए जा रहा हूं, क्योंकि वह माखनलाल चतुर्वेदी का जन्म स्थान है। जिस भूमि ने माखनलालजी को जन्म दिया है, उस भूमि को मैं सम्मान देना चाहता हूं।

Published on:
30 Jan 2022 09:01 pm
Also Read
View All

अगली खबर