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मेडिसिन फ्री लाइफ में मददगार है फिजियोथैरेपी

फिजियोथैरेपी यानी शरीर की मांसपेशियों, जोड़ों, हड्डियों-नसों के दर्द या तकलीफ वाले हिस्से की वैज्ञानिक तरीके से एक्सरसाइज

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मेडिसिन फ्री लाइफ में मददगार है फिजियोथैरेपी

फिजियोथैरेपी यानी शरीर की मांसपेशियों, जोड़ों, हड्डियों-नसों के दर्द या तकलीफ वाले हिस्से की वैज्ञानिक तरीके से एक्सरसाइज के माध्यम से मरीज को आराम पहुंचाना। हालांकि अधिकतर लोग मानते हैं कि केवल योगा और कुछ कसरतें ही फिजियोथैरेपी होती हैं लेकिन ऐसा नहीं है। फिजियोथैरेपी में विशेषज्ञ कई तरह के व्यायाम और नई तकनीक वाली मशीनों की मदद से इलाज करते हैं। आज की जीवनशैली में हम लंबे समय तक अपनी शारीरिक प्रणालियों का सही ढंग से उपयोग नहीं कर पा रहे हैं और जब शरीर की सहनशीलता नहीं रहती है तो वह तरह-तरह की बीमारियों व दर्द की चपेट में आ जाता है। दवाइयां तात्कालिक राहत देती हैं। लेकिन लंबे समय तक इन्हें लेना सुरक्षित नहीं माना जाता है।फिजियोथैरेपी को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाकर दवाइयों पर निर्भरता कम करके स्वस्थ रह सकते हैं: -

इन तकलीफों में कारगर
लाइफस्टाइल संबंधी परेशानी (मोटापा, ब्लड प्रेशर, डायबिटीज), क्लाइमेट चेंज से जुड़ी तकलीफें (लंबे समय तक दफ्तर के एसी में रहना, धूप के बिना रहना, लंबी सिटिंग आदि, ऐसा वातावरण जो परेशानी को बढ़ाता है), मैकेनिकल एवं ऑर्थोपेडिक डिसऑर्डर (पीठ, कमर, गर्दन, कंधे, घुटने का दर्द या दुर्घटना के कारण भी), आहार-विहार (जोड़ों का दर्द, हार्मोनल बदलाव, पेट से जुड़ी समस्याएं), खेलकूद की चोटें, ऑर्गन डिसऑर्डर, ऑपरेशन से जुड़ी समस्याएं, न्यूरोलॉजिकल बीमारियां (मांसपेशियों का खिंचाव व उनकी कमजोरी, नसों का दर्द व उनकी ताकत कम होना), चक्कर आना, कंपन, झनझनाहट, सुन्नपन और लकवा, बढ़ती उम्र संबंधी बीमारियों के कारण चलने-फिरने में दिक्कत, बैलेंस बिगडऩा, टेंशन, हैडेक और अनिद्रा में फिजियोथैरेपी को अपना सकते हैं।

फायदा न होने की वजह
कई बार मरीज कहते हैं कि फिजियोथैरेपी भी करवाकर देख ली, लेकिन कुछ फर्क ही नहीं पड़ा। इलाज से फायदा न हो तो देखना होता कि मरीज के साथ निम्न में से कोई स्थिति तो नहीं है। फिजिशियन या सर्जन के स्तर पर मरीज को समय रहते फिजियोथैरेपिस्टक के पास जाने की सलाह दी गई थी या नहीं।

घुटनों का दर्द : मरीज फिजियोथैरेपी में तब आता है जबकि ऑर्थोपेडिक सर्जन की राय में उसके घुटने लगभग खत्म हो चुके होते हैं।

कमर-गर्दन दर्द : मरीज जब आता है जबकि न्यूरोफिजिशियन-सर्जन की राय में उसकी नसों की दबने से ताकत कम हो चुकी होती है।

सिरदर्द, चक्कर आना, चेहरे का लकवा : मरीज उस स्थिति में आता है जबकि उसका केस बिगड़ या मर्ज बढ़ चुका होता है।

लंबे समय तक आराम
फिजियोथैरेपी में तुरंत इलाज संभव नहीं होता। विशेषज्ञ के अनुसार मरीज को धैर्य रखते हुए एक्सपर्ट के बताए अनुसार व्यायाम करने और जीवनशैली में बदलाव लाने से न सिर्फ दीर्घकालिक लाभ होता है बल्कि एक्सरसाइज भी उसकी जीवनशैली का नियमित हिस्सा बन जाते हैं। ये दोनों चीजें दवारहित जीवन व बीमारियों को दूर रखने में मददगार होती हैं। यह एलोपैथी से जुड़ी हुई चिकित्सा पद्धति है।

उपचार के तरीके
कॉम्बिेनेशन थैरेपी : दवा व कसरत दोनों के मेल से फायदा होता है।

इलेक्ट्रो थैरेपी: दवा रहित उपचार जिसमें मशीनों की सहायता से मांसपेशियों को रिलेक्स कर सूजन व दर्द में राहत दी जाती है। मशीनी तरंगें दर्द वाले प्रभावित हिस्से पर सीधे काम करती हैं। इसमें ठंडा-गर्म सेक, मैकेनिकल ट्रैक्शन (खिंचाव) से इलाज होता है।

इंस्टेंट थैरेपी: अचानक दर्द उठने पर ऑर्थोपेडिक मैनुअल थैरेपी करते हैं जिसमें प्रभावित हिस्से की मांसपेशियों के खिंचाव या डिसलोकेशन को मुद्राओं का संतुलन सही करके ठीक किया जाता है। इसे अधिकतर गर्दन, कमर दर्द व खेलों से जुड़ी चोटों में आजमाया जाता है।

इंटीग्रेटेड हॉलिस्टिक हीलिंग थैरेपी
लंबे समय से तरह-तरह के दर्द या अन्य व्याधियां (क्रॉनिक डिसऑर्डर) के कारण पूर्ण रूप से दूसरों पर निर्भर मरीजों का उनकी सक्रियता व इच्छाशक्ति बढ़ाकर क्वालिटी ऑफ लाइफ के साथ जीवन जीने की समग्र सोच से उपचार किया जाता है। विशेषज्ञ उन मरीजों के लिए हॉलिस्टिक हीलिंग थैरेपी को बेहतर परिणाम देने वाली मानते हैं जिसमें एक से ज्यादा बीमारियां, असाध्य तकलीफें या लंबे अरसे से दर्द है। इसमें एक्सरसाइज के साथ शरीर की बायो क्लॉक, दिनचर्या, खानपान का प्रबंधन और बढ़ती उम्र के बावजूद जीवन को सकारात्मकता से देखने की काउंसलिंग करके इलाज किया जाता है। कुछ मामलों में तो इसके आश्चर्यजनक परिणाम देखने में आए हैं जहां 60 पार की उम्र के ऐसे मरीज हैं जिन्होंने अपनी बीमारी को अंतिम सत्य मानते हुए बिस्तर पकड़ लिया था, हीलिंग पद्धति से इलाज के बाद वे खुद चलने फिरने लगे। सामान्य दिनचर्या करने लायक हो गए और अब दूसरों के सहारे बिल्कुल नहीं हैं।

पद्धति की शुरुआत
- 200 साल से यह पद्धति अस्तित्व में है। सबसे पहले 1813 में स्वीडन में इसे जिम्नास्टिक से जुड़े विशेषज्ञों ने शुरू किया था।
- 1887 में इसे उपचार की आधिकारिक पद्धति के रूप में मान्यता मिली।
- 1916 में पोलियो फैलने के वक्त अमरीका में इसे व्यापक रूप से आजमाया गया।