
Kanger Valley National Park
जगदलपुर। छत्तीसगढ के बस्तर जिले के कांगेर वैली नेशनल पार्क को राज्य के सबसे बड़े एथेनिक पर्यटन के रूप में पहचान मिले 33 साल हो रहे हैं। दो सौ वर्ग किलोमीटर वाले हरे भरे जंगल को 1982 में नेशनल पार्क का दर्जा मिला था। तब इस पार्क के देखने योग्य जगहों में भूमिगत कोटमसर गुफा और तीरथगढ़ जलप्रपात ही मुख्य थे। यहां के जंगल बारहोंमास हरे भरे रहते हैं। कांगेर नदी के किनारे-किनारे इसके 14 किमी वाले जंगलों को एशिया का पहला घोषित बायोस्फियर बताया जाता है। इस इलाके से लेकर आमाकरिया तक 100 नहीं 150 फीसदी प्राण वायु होने की बात वैज्ञानिक स्वीकार कर चुके हैं। पेड़-पत्थर और पानी की कहानी के कई कुदरती कमाल देखने टूरिस्ट सीजन में 60 से 70 हजार सैलानी यहां घूमने आते हैं। बताया जाता है कि कोटमसर की गुफाओं का निर्माण कम से कम 250 से 300 साल पुराना होगा। कांगेर वैली नेशनल पार्क की भूमिगत गुफाओं को देखने वालों में 90 फीसदी सैलानी कोटमसर की गुफा देखकर लौट जाते हैं। केवल 10 फीसदी सैलानी ही पार्क के कैलाश, दण्डक, देवगिरी, झुमरी, शीत गुफा और मादर कोन्टा की टेकरी में छिपी गुफा तक पहुंच पाते हैं। हालांकि पार्क प्रबंधन ने कैलाश गुफा दिखाने के पूरे इंतजाम कर चुके है।
यहां पहुंचने के लिए जगदलपुर से मुरमा-मोदल होकर पार्क के नेतानार चेक पोस्ट से पहुंचना होता है। वहां घने जंगल के बीच घुमावदार रास्ते से होकर करीब 6 किमी दूर कैलाश गुफा है। यह गुफा कोटमसर से इस मामले में अलग है कि कोटमसर की गुफा देखने जमीन के भीतर 60 फीट तक नीचे उतरना पड़ता है। जबकि कैलाश गुफा देखने वालों को टेकरी पर सीढिय़ों से चढ़ कर देखना होता है। यहां भी गाईड और उजाले के पूरे इंतजाम पार्क ने किये हुए है। बायोस्फियर इलाके में मौजूद पार्क की दंडक गुफा को आम सौलानियों से दूर रखा गया है। जिसका उद्देश्य शोध के जरिये नई जानकारियां जुटाना है। यह गुफा जमीन से काफी उपर टेकरी पर चढऩे के बाद देखी जा सकती है।
Published on:
30 Jan 2016 03:39 pm
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