मोदी सरकार अब महिलाआें को बनाने जा रही है हथियार, एेसे होगी 2019 की नैया पार

मोदी सरकार अब महिलाआें को बनाने जा रही है हथियार, एेसे होगी 2019 की नैया पार

Saurabh Sharma | Updated: 07 Aug 2018, 06:52:23 PM (IST) अर्थव्‍यवस्‍था

नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस के महानिदेशक देबी प्रसाद मंडल के मुताबिक सरकार ने जनवरी से एक साल तक ऐसा सर्वे कराने की योजना बनाई है। इसमें पता लगाने की कोशिश की जाएगी कि घरेलू महिलाएं किस तरह से अपना समय घर में बिताती हैं।

नई दिल्ली। मोदी सरकार अपनी 2019 की नैया पार लगाने के लिए महिलाआें को बड़ा हथियार बनाने में जुटी हुर्इ है। अगर सब कुछ ठीक रहा तो आने वाले आम चुनावों में नरेंद्र मोदी की दोबारा प्रधानमंत्री का श्रेय महिलाआें को दिया जाएगा। जी हां, नौकरियों के मसले पर घिरी सरकार अब महिलाओं द्वारा घर में किए जाने वाले कामकाज का सर्वे कराने की तैयारी में है। आने वाले समय में इसे रोजगार के आंकड़ों में भी शामिल किया जा सकता है। अगर एेसा हुआ तो सरकार हर साल लोगों को दो करोड़ नौकरी देने के वादे के करीब पहुंच जाएगी। इससे पहले सरकार ने मुद्रा योजना के तहत दिए जाने वाले धन को भी रोजगार की श्रेणी में जोड़ दिया था।

कराया जाएगा महिलाआें पर सर्वे
नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस के महानिदेशक देबी प्रसाद मंडल के मुताबिक सरकार ने जनवरी से एक साल तक ऐसा सर्वे कराने की योजना बनाई है। इसमें पता लगाने की कोशिश की जाएगी कि घरेलू महिलाएं किस तरह से अपना समय घर में बिताती हैं। इसके तहत महिलाओं द्वारा किए जाने वाले घरेलू कामों की मैपिंग की जाएगी। इस सर्वे के नतीजों को जून 2020 में जारी किया जाएगा और हर तीन साल में एक बार ऐसा सर्वे कराया जाएगा। मंडल ने कहा कि इससे हम यह जान सकेंगे कि महिलाएं खाना पकाने और कपड़े धोने जैसे कामों में कितना वक्त देती हैं। इन नतीजों से नीति निर्माताओं को यह समझने में मदद मिलेगी कि अर्थव्यवस्था में रोजगार की क्या स्थिति है और कल्याणकारी योजनाओं को किस तरह से चलाया जाए।

घर के कामों को नहीं जोड़ा जाता है
दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शुमार भारत के आर्थिक आंकड़े कई मायनों में अन्य देशों की तुलना में अलग किस्म के होते है। इसके चलते यह जानने में मुश्किल होती है कि आखिर महत्वपूर्ण सेक्टरों में रोजगार स्थिति कैसी है। खासतौर पर खुदरा कारोबार (रिटेल) और आवास के बारे में यह सटीक पता नहीं चल पाता। भारत की करीब 70 करोड़ की आबादी यानी अमेरिका से दोगुनी जनसंख्या वर्कफोर्स का हिस्सा ही नहीं है। महिलाओं द्वारा घर में किए गए उनके कामों को राष्ट्रीय आय में नहीं जोड़ा जाता।

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