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बिहार के मोतीहारी जिले से लाए जा रहे बाल मजदूर, ‘नर्क’ में जीवन जीने मजबूर

शहर में रेलवे स्टेशन व छोटी-छोटी फैक्ट्रियों में काम कर रहे बाल श्रमिकों के मामले को प्रशासन ने गंभीरता से लिया है।
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Narendra Hazare

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Updated: 18 Jan 2017, 2:28 PM IST

child labour

child labour

(फाइल फोटो।)

इंदौर। शहर में रेलवे स्टेशन व छोटी-छोटी फैक्ट्रियों में काम कर रहे बाल श्रमिकों के मामले को प्रशासन ने गंभीरता से लिया है। अलग-अलग स्थानों पर की गई कार्रवाई के बाद पकड़े गए 53 बच्चों के बारे में जांच-पड़ताल करने पर पता चला कि अधिकांश बिहार के मोतीहारी जिले से आए हैं। इन्हें यहां कैसे भेजा गया, इस बात का पता लगाने के लिए कलेक्टर ने मुख्य सचिव के माध्यम से एक पत्र बिहार सरकार को लिखा है।


बीते दिनों पुलिस, प्रशासन और महिला एवं बाल विकास के अधिकारियों ने कलेक्टर पी नरहरि के आदेश पर अलग-अलग जगहों पर कार्रवाई की थी। इस दौरान कई बच्चे बदतर हालत की जिंदगी जीने के लिए मजबूर थे। बच्चों से यहां पर छोटे-छोटे कमरों में काम करवाया जा रहा था और उनके लिए सोने तक की अलग से कोई जगह नहीं थी। ऐसी हालत को देखते हुए कलेक्टर पी नरहरि ने मामले को गंभीरता से लिया है।

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मामा-चाचा छोड़कर गए

पकड़े गए बच्चों से जब पूछा गया, यहां कैसे आए तो वह अपना आधार कार्ड बता देते हैं। कौन छोड़ कर गया? इस सवाल का जवाब गोलमाल तरीके से देते हुए कोई कहता है चाचा छोड़ गए तो कोई मामा का नाम लेता है। जांच रिपोर्ट के आधार पर ही बिहार सरकार को पत्र लिख कर जानकारी दी जा रही है, जिससे स्थानीय स्तर पर जांच कर इस बात का पता लगाया जाए कि क्षेत्र के बच्चों को अवैध तरीके से बेचने का गोरखधंधा तो नहीं चल रहा है।


बच्चों को मुक्त कराया जा रहा है

बाल श्रमिक प्रतिबंधित होने के बाद भी शहर के कारखानों व दुकानों पर 18 साल से कम उम्र के बच्चें काम करते हुए मिल रहे हैं। प्रशासन द्वारा लगातार कार्रवाई कर इन बच्चों को मुक्त कराया जा रहा है। हाल ही में एसडीएम शालिनी श्रीवास्तव ने रेलवे स्टेशन व मोती तबेला में कार्रवाई करके करीब 53 बाल श्रमिकों को मुक्त कराया है। कलेक्टर पी. नरहरि के निर्देश पर जब इन बच्चों के बारे में पूरी जानकारी निकाली गई तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।