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गजेटियर्स के ग्रेट शिल्पी थे जबलपुर के राय बहादुर हीरालाल

150वीं जयंती पर विशेष- बात अगर उनके विशेष कार्यों की हो तो शहर के गजेटियर की कल्पना उनके बिना संभव नहीं थी। जबलपुर ज्योति की 8 किरणें आज भी शोध छात्रों के लिए मील का पत्थर हैं। अद्भुत काम को अभिलेखों के तौर पर भावी पीढ़ी को सौंप गए रायबहादुर हीरालाल को गजेटियर्स का हीरो कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी

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Lali Kosta

Oct 01, 2016

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दीपिका सोनी@जबलपुर। वे अपने काम के प्रति जुनूनी थे। गौंड़ी, कोरकू, गदबी जैसी कई भाषाओं के जानकार थे। जनगणना अधिकारी, पुरातत्ववेत्ता, विज्ञान विषय के शिक्षक और डिप्टी कमिश्नर जैसी अनेक भूमिकाओं का निर्वहन किया। यहां बात राय बहादुर हीरालाल की हैै, जो कटनी में 1 अक्टूबर 1867 में जन्में। बात अगर उनके विशेष कार्यों की हो तो शहर के गजेटियर की कल्पना उनके बिना संभव नहीं थी। जबलपुर ज्योति की 8 किरणें आज भी शोध छात्रों के लिए मील का पत्थर हैं। अद्भुत काम को अभिलेखों के तौर पर भावी पीढ़ी को सौंप गए रायबहादुर हीरालाल को गजेटियर्स का हीरो कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। उनकी पौत्री डॉ. छाया राय ने पत्रिका से साझा किए उनके कुछ अनसुने किस्से।

6 जिलों का बनाया गजेटियर
हीरालाल ने जबलपुर ज्योति के सागर, दमोह, सिवनी, मंडला और नरसिंहपुर गजेटियर्स को अलग खंडों में आकर्षक नाम दिए। सागर सरोज में 8 पखुरी, दमोह दीपक में 8 वर्तिका, सिवनी सरोजिनी में 4 कली, मंडला मयूख में 5 शिखा, नरसिंह नयन में 6 पलक लिखे गए हैं।

रिसर्च के लिए फ्रांस ने मांगा था ब्रेन
राय बहादुर ने 17 क्षेत्रों में एक साथ काम किया। उन्हें कई भाषाएं के ग्रामोफोन रिकॉड्र्स भी अंग्रेज सरकार ने बनवाए थे। डॉ. छाया राय ने बताया कि इतने सारे क्षेत्रों का विशेषज्ञ होने के चलते फ्रांस सरकार ने मृत्यु के बाद उनका ब्रेन रिसर्च के लिए मांगा था।

साहित्य को दीं अमूल्य निधि
कई शोध पत्र और पुस्तकें रायबहादुर हीरालाल को एक उच्चकोटि साहित्यकार भी बनाती हैं। प्रमुख कार्यों में 1914 में आई मध्यप्रांत और बरार के शिलालेख, 1908 में एथनोग्राफिक्स नोट्स, 1916 में ट्राइब्स एंड कास्ट्स ऑफ द सेंट्रल प्रॉविसेंस ऑफ इंडिया, रामटेक का दर्शन, चिमूर का घोड़ा, बुंदेलखंड की त्रिमूर्ति आदि उल्लेखनीय हैं।
खास-खास
1910 में मध्यप्रांत गजेटियर्स कार्य के संपादन के लिए राय बहादुर की उपाधि मिली।
कटनी मुड़वारा में रायबाड़ा पैतृक निवास था, जहां की अमूल्य प्रतिमाएं रानी दुर्गावती संग्रहालय में दी गईं।
भेड़ाघाट चौराहे से आगे स्थित हीरापुर बंधा गांव का नाम रायबहादुर हीरालाल के नाम पर ही पड़ा।
रायबहादुर हीरालाल ने 10 हजार संस्कृत और प्राकृत पांडुलिपियों की खोजीं, जिनका पहले ज्ञान नहीं था।
अपनी वसीयत में हीरालाल ने तत्कालीन रॉबर्टसन कॉलेज के लिए 10 हजार और अन्य संस्थाओं के लिए 3 हजार की स्कॉलरशिप का उल्लेख किया है।
शासकीय सेवाओं के लिए विविध पदों पर वे रायपुर, बालाघाट, नागपुर, ङ्क्षछदवाड़ा, दमोह, जबलपुर और वर्धा में पदस्थ रहे।
1922 में वे डिप्टी कमिश्नर पद से नरसिंहपुर से सेवानिवृत हुए, जिसके बाद भी उनका शोध कार्य चलता रहा।
पुरातत्व के उच्च कोटि विद्वान होने चलते उन्हें चेदि कीर्ति चंद्र भी कहा जाता था।

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