
राजस्थान का रण: राजस्थान के पहले कैशलेस गांव की हकीकत
विशाल सूर्यकांत की रिपोर्ट
आपका नयागांव सचमुच में कैशलेस गांव है? डेयरी पर दूध बेच रहे प्रेमचंद से ये सवाल पूछा, जवाब आया...म्हाराज, थ्हे कैशलेस करबा की बातां कर रय्या हो, कांइ करां..? दस किलोमीटर पैदल जावां? ...कैशलेस करबा के लिए? जवाब देकर बड़बड़ाता हुआ प्रेमचंद काम में लग गया। कुछ पल बैठे तो प्रेमचंद बोले, अजमेर का नयागांव कैशलेस सिर्फ कागजों में बना है। असल में तो गांव में एटीएम ही नहीं है, मोबाइल सिग्नल कमजोर रहते हैं, बिजली भी पूरी नहीं आती। गांव का ई-मित्र भी आधे समय बंद ही रहता है।
प्रेमचंद की दुकान के ठीक सामने दीवार पर लिखा है नयागांव-कैशलेस गांव...उसकी ओर इशारा करते हुए बोला, ये रहा कैशलेस गांव। किशनगढ़ सीट की हरमाड़ा पंचायत के नयागांव में 800 वोटर और करीब 1500 की आबादी है। लोग दिन भर खेतों में काम करते हैं, कुछ रोजगार के लिए किशनगढ़ जाते हैं और शाम ढ़लते ही दूध बेचने प्रेमचंद की डेयरी पर ही बैठते हैं। नयागांव कैसे कैशलेस गांव बना, इसकी कहानी भी कम दिलचस्प नहीं। देश में आठ नवम्बर 2016 को नोटबंदी हुई। 18 दिसम्बर, 2018 को इस गांव को कैशलेस गांव घोषित कर दिया।
अजमेर जिला प्रशासन,एक निजी बैंक और स्थानीय जनप्रतिनिधि गांव में आए। भाषणों में कहा गया कि लूगड़ी के पल्ले में रुपए बांधने की अब जरूरत नहीं। अब घूंघट और अंगूठे का जमाना नहीं है। गांव की चार दुकानदारों में से एक दामोदर बताते हैं कि हमें मशीनें मिली थी, कुछ लोगों ने वापस करने की कोशिश की तो अधिकारियों ने मशीनें हरमाड़ा के मेडिकल स्टोर और दूसरी दुकानों में लगवा दी। जब पीओएस मशीनेें दी गई तो कहा था निशुल्क हैं लेकिन एक साल बाद अचानक चालू खाते से पांच सौ रुपए कटने लगे। कार्ड स्वैप में अब दस रुपए पर एक रुपया टैक्स लग रहा है। कैशलेस के फेर में गांव में एक-एक रुपए को लेकर अविश्वास और विवाद होने लगा। गांव के बुजुर्ग छोटूजी बोले "थ्हे तो मुनादी करवा दो, कांई कैशलेस कोनी, सब झूठ्ठो परपंच हौ।" गांव से पंचायत के पूर्व सदस्य रामधन कहते हैं कि किसी ने आकर हमें समझाया ही नहीं कि कैशलेस में क्या करना है? नंदराम की दुकान पर सबसे पहले पीओएस मशीन लगी, नंदराम बताते हैं कि अब बैंक वालों से खाता बंद करने के लिए कहते हैं तो जवाब आता है कि पहले माइनस में जो बैलेंस गया है, वो भरो। गांव में पूर्व जिला परिषद सदस्य मदनलाल पोसवाल भाजपा से हैं। वह बोले सब ठीक है, गांव कैशलेस है। पास के हरमाड़ा गांव में भी आधार की अनिवार्यता के वक्त लोग बैंकों की मनमानी से परेशान रहे। कई बुजुर्गों को पेंशन नहीं मिल पाई। आधार, राशन और स्वास्थ्य सेवाओं तक के कार्ड बनाने के नाम पर बिचौलिए तैयार हो गए हैं। मनमाना रुपया ऐंठ लिया जाता है। नयागांव में आकर लगा कि न गांव वाले सहमत न व्यापारी, फिर न जाने क्यों और कैसे गांव को कैशलेस करार दे दिया गया।
नयागांव ऐसी प्रयोगशाला है जहां अब प्रयोगधर्मी प्रशासन भी झांकना पसंद नहीं कर रहा। क्योंकि वो वहां झांकेंगे तो जिस दीवार पर नयागांव-कैशलेस गांव लिखकर आए हैं वो दीवार ही सिस्टम की हकीकत का आईना बन जाएगी।
मशीनों पर चार्ज लग रहा है, ऊपर के अधिकारियों को अवगत करवा दिया है। मशीनें एक साल ही निशुल्क थी, चार्ज भी नहीं था। नोटबंदी के बाद से अब तक नियम बदले हैं इसीलिए समस्या है। कार्ड स्वैपिंग का अब चार्ज तो लगेगा। सुविधा दी है, गांव वाले इस्तेमाल करें। गांव में एटीएम खुलने के बारे में अधिकारियों के ध्यान में बात है।
विक्रांत मीणा, बैंक ऑफ बड़ौदा, हरमाड़ा (अजमेर)
Published on:
18 Oct 2018 08:00 am

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