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School Education- ओनली Grading, नो Marks इसलिए नो स्टडी

School Education-राज्य के अधिकांश स्कूलों में अब पढ़ाई नो माक्र्स तो नो स्टडी के आधार पर करवाई जा रही है। यानी जिन विषयों के नंबर परीक्षा परिणामों में नहीं जोड़े जाते उन विषयों की कक्षाएं अब स्कूलों में बेहद कम लग रही हैं। यहां बात हो रही है उन विषयों की, जिनकी मार्कशीट में केवल ग्रेडिंग दी जाती है, जबकि यह विषय बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए जरूरी हैं।

जयपुर

Published: October 17, 2021 12:24:10 am

पीछे छूट रहे कला शिक्षा, स्वास्थ्य और शारीरिक शिक्षा, जीवन कौशल जैसे सब्जेक्ट्स
कैसे होगा बच्चे का ओवरऑल डवलपमेंट ?
अपनी मर्जी से पीरियड निर्धारित कर रहे संस्था प्रधान
राखी हजेला
जयपुर।
राज्य के अधिकांश स्कूलों में अब पढ़ाई नो माक्र्स तो नो स्टडी के आधार पर करवाई जा रही है। यानी जिन विषयों के नंबर परीक्षा परिणामों में नहीं जोड़े जाते उन विषयों की कक्षाएं अब स्कूलों में बेहद कम लग रही हैं। यहां बात हो रही है उन विषयों की, जिनकी मार्कशीट में केवल ग्रेडिंग दी जाती है, जबकि यह विषय बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए जरूरी हैं।
इन विषयों पर फोकस कम
पहली से आठवीं तक कार्यानुभव, कला शिक्षा, स्वास्थ्य और शारीरिक शिक्षा विषय भी सिलेबस में शामिल हैं। वहीं नवीं और दसवीं में राजस्थान अध्ययन, स्वास्थ्य शिक्षा, कम्प्यूटर शिक्षा, एसयूपीडब्ल्यू, 11वीं में ऐच्छिक विषयों के साथ जीवन कौशल और 12वीं में ऐच्छिक विषयों के साथ राजस्थान अध्ययन भी कोर्स में शामिल हैं लेकिन स्कूलों में इन पर फोकस कम किया जा रहा है। अधिकांश स्कूलों में इन विषयों की कक्षाएं ही नहीं लगती यदि लगती भी हैं तो बेहद कम। जिसके चलते इनका सिलेबस पूरा नहीं हो पाता।
परीक्षा परिणाम पर नहीं पड़ता असर
गौरतलब है कि स्कूलों में इन सभी विषयों की परीक्षा तो होती है लेकिन इनके अंक मार्कशीट में नहीं जोड़े जाते केवल ग्रेडिंग दी जाती है जिसका उल्लेख मार्कशीट में किया जाता है। यानी यह विषय किसी भी विद्यार्थी के परीक्षा परिणाम को प्रभावित नहीं करते। ऐसे में स्कूल प्रशासन इनमें अपने स्तर पर ग्रेडिंग देता है, फिर भले ही सिलेबस पूरा हुआ हो अथवा नहीं। गौरतलब है कि यह वह विषय हैं जिनकी हर साल करोड़ों रुपए की किताब शिक्षा विभाग प्रकाशित करवाता है लेकिन उनका कोई उपयोग नहीं हो पा रहा। भले ही सरकारी स्कूलों में यह किताबें फ्री में बच्चों को उपलब्ध करवाई जाती हैं लेकिन निजी स्कूलों में इससे अभिभावकों पर आर्थिक भार पड़ता है।
अपनी मर्जी से कर रहे पीरियड का निर्धारण
शिक्षा विभाग के नियमों के मुताबिक स्कूलों में कक्षा शिक्षण का चक्र 8 पीरियड का होता है लेकिन अधिकांश स्कूलों में आठ के स्थान पर केवल छह पीरियड ही लगाए जा रहे हैं। नियमों के मुताबिक स्कूल में पहली व दूसरी में हिंदी के 12- 12, अंग्रेजी के 6-6, गणित के 12,पर्यावरण के 6, कार्यनुभव, कला शिक्षा के तीन-तीन,स्वास्थ्य व शारीरिक शिक्षा के 6 पीरियड निर्धारित हैं। इसी प्रकार तीसरी से पांचवीं तक हिंदी के 12, अंग्रेजी के 6, गणित के 9, पर्यावरण के 9, कार्यानुभव, कला शिक्षा और स्वास्थ्य व शारीरिक शिक्षा के 4-4 पीरियड निर्धारित हैं। इसी तरह से अन्य कक्षाओं में भी पीरियड फिक्स होते हैं लेकिन कार्यानुभव, कला शिक्षा आदि की कक्षाएं नहीं लगाई जाती।
जिसका नुकसान भी विद्यार्थियों को उठाना पड़ता है। पढ़ाई होती नहीं और जब बारी टेस्ट लेने की आती है तो बच्चों को एक साथ कइ चैप्टर की तैयारी करनी होती है वह भी बिना स्कूल में पढ़े हुए। अभिभावकों का भी कहना है कि शिक्षा विभाग की ओर से संचालित विषयों जीवन कौशल, पर्यावरण शिक्षा, कला शिक्षा, स्वास्थ्य शिक्षा आदि को स्कूलों में महत्वपूर्ण नहीं माना जाता। ऐसे में बच्चे का सर्वागीण विकास कैसे हो सकेगा।
School Education-  ओनली Grading, नो Marks इसलिए नो स्टडी
School Education- ओनली Grading, नो Marks इसलिए नो स्टडी
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इनका कहना है,
आर्ट एंड क्राफ्ट हो या फिर फिजिकल एजुकेशन, हर विषय की अपनी महत्ता है। हिंदी, अंग्रेजी या अन्य विषयों के समान कई अन्य विषय भी ऐसे हैं जो बच्चों के ओवरऑल डवलपमेंट के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। इनसे बच्चे टीम वर्क करना सीखते हैं साथ ही शेयरिंग की भावना विकसित होती है। उसके चरित्र का विकास होता है। अगर हम केवल उनके मुख्य विषयों पर ही फोकस करते रहेंगे तो कहीं कही ना हम उनके विकास में बाधा पैदा कर रहे है।
डॉ. अखिलेश जैन, मनोरोग विभागाध्यक्ष
ईएसआई मॉडल हॉस्पिटल।
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मेरे दो बच्चे हैं दोनों स्कूल में हैं। एक समय था स्कूल में फिजिकल एजुकेशन पर फोकस होता था। मैं जब स्कूल में थी तो एसयूपीडब्ल्यू कैम्प लगाए जाते हैं लेकिन अब स्कूलों में धीरे धीरे यह सब कम हो रहा है। स्कूलों का पूरा ध्यान सिर्फ पढ़ाई पर हो गया है जो सही नहीं हैं। मुझे लगता है कि इससे बच्चों की ग्रोथ अच्छे से नहीं होगी। जरूरत है कि गेम्स, आर्ट क्राफ्ट, हेल्थ रिलेटेड इश्यू पर भी फोकस किया जाए।
प्रीति चौरसियां, अभिभावक
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कक्षाओं में मुख्य विषय तो छह होते हैं, लेकिन इनके अलावा भी कई विषय हैं, समय समय पर इनकी कक्षाएं भी लगाई जाती हैं।
धर्मवीर रुलानियां, संस्था प्रधान
राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, गोपालपुरा देवरी।
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विभाग ने स्कूलों में आठ कालांश निर्धारित किए हैं। जिसमें सभी विषयों की पढ़ाई करवाई जानी चाहिए। यदि ऐसा नहीं हो रहा, कालांश कम लिए जा रहे हैं तो हम इसकी जांच करवाएंगे।
जेपी मीणा, जिला शिक्षा अधिकारी प्रारंभिक मुख्यालय,जयपुर।

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