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पीढ़ियों की जानलेवा बीमारी, इससे गई थी ब्रिटेन के प्रिंस की जान, अब रामबाण बना ये इंजेक्शन

World Haemophilia Day: एक अध्ययन के मुताबिक करीब 60 प्रतिशत मामलों में हिमोफिलिया बीमारी आनुवांशिक होती है, इस बीमारी का बड़ा कारण यह है कि क्लॉट बनाने वाले प्रोटीन की शरीर में कमी होती है

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World Haemophilia Day: हिमोफिलिया एक ऐसी बीमारी है, जिसकी वजह से ब्रिटेन के प्रिंस की जान चली गई। कई सालों तक इसका पुख्ता इलाज नहीं था और लोग काफी परेशान होते थे। इस वंशानुगत बीमारी में चोट लगने पर काफी मात्रा में रक्त का स्राव होता था और इसके बाद महीने में एक या दो बार रक्त चढ़ाने की जरूरत भी पड़ती थी। एक आंकलन के अनुसार हर 10 हजार में से एक व्यक्ति को यह बीमारी हो सकती है। आज वर्ल्ड हिमोफिलिया डे पर इस बीमारी की गंभीरता से जुड़ी कुछ बातें।

केस - 1 : शहर के सोजती गेट क्षेत्र में रहने वाले 9 साल के एक बालक को करीब 4-5 साल की उम्र में पता चला कि उन्हें हिमोफिलिया बीमारी है। साल में दो से तीन बार खून चढ़ाने की जरूरत पड़ जाती थी, लेकिन पिछले दो साल में इंजेक्शन से काफी राहत है।
केस - 2 : 16 साल की एक बालिका जो कि भीतरी शहर में रहती है, उसे 10 साल पहले इस बीमारी से ग्रसित होने की जानकारी मिली। कई सालों तक रक्त चढ़ाने की जरूरत रही, लेकिन पिछले तीन साल में फेक्टर - 8 से काफी राहत है।

फ्री सप्लाई में शुरू हुआ फेक्टर-8 इंजेक्शन

राजस्थान सरकार की ओर से फेक्टर-8 इंजेक्शन को नि:शुल्क दवा वितरण में शामिल कर लिया गया है। इसके बाद से ही इसमें बदलाव आया है। इसी इंजेक्शन के कारण अब 95 प्रतिशत मामलों में इन मरीजों को रक्त चढ़ाने की जरूरत नहीं होती। जोधपुर में 100 से ज्यादा हिमोफिलिया के मरीज हैं, लेकिन अधिकांश मरीज डे केयर यूनिट में सिर्फ फेक्ट- 8 के इंजेक्शन लगवाने आते हैं। एमजीएच अस्पताल में इम्युनोहेमेटोलॉजी एंड ट्रांसफ्यूशन मेडिसिन विभाग की सीनियर प्रो. डॉ राजश्री बेहरा बताती हैं कि पिछले दो साल में किसी मरीज को यहां रक्त चढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ी है।

क्लॉट बनाने वाले प्रोटीन की कमी

इस बीमारी का बड़ा कारण यह है कि क्लॉट बनाने वाले प्रोटीन की शरीर में कमी होती है। एक अध्ययन के मुताबिक करीब 60 प्रतिशत मामलों में यह बीमारी आनुवांशिक होती है। एमडीएम अस्पताल के अधीक्षक डॉ. नवीन किशोरिया बताते हैं कि हमारे यहां मरीज आते हैं और इनकी डे-केयर यूनिट भी है। लेकिन अधिकांश मरीजों को अब खून चढ़ाने की जरूरत नहीं है।

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