
कोटा . सूखी खांसी को हलके में न लें। दो से चार सप्ताह तक यदि किसी मरीज को लगातार खांसी है तो वह घातक सिद्ध हो सकती है। लोग खांसी को टीबी, अस्थमा व दमा रोग से ही जोड़कर देखते हैं, लेकिन एक अध्ययन में सामने आया है कि कबूतर की फडफ़हाड़ट व बीट, सीलन, उमस व फैक्टियों के कैमिकल के कणों से भी लोगों में श्वास रोग हो रहा है। यह कहना है सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज बीकानेर के श्वास रोग विभाग के प्रोफेसर व हैड डॉ. गुंजन सोनी का।
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इनका हुआ सम्मान
कार्यक्रम में डॉ. पीके गुप्ता को लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित किया। डॉ. सुमन खंगारोत को डॉ. टीएन शर्मा अवार्ड, डॉ. नीरज गुप्ता को डॉ. एसएन जैन अवार्ड से सम्मानित किया।
अस्थमा का पक्का इलाज नहीं
जयपुर से आए डॉ. मनोहर गुप्ता ने बताया कि अस्थमा का स्थाई इलाज नहीं है। मेडिकल ट्रीटमेंट में कई नए तरीके इजाद हुए हैं, जो एक हद तक अटैक को रोक सकते हैं, लेकिन पूरी तरह खत्म नहीं कर सकते। मेपोलीजुमाब काफी हद तक अस्थमा अटैक को रोक सकता है।
दूसरा ट्रीटमेंट थर्मोप्लास्टी के जरीए दिया जाता है, लेकिन यह एपु्रव नहीं हुआ है। डॉ. विकास पिलानिया ने भी अस्थमा के बारे में बताया। इससे पहले कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्य अतिथि मेडिकल कॉलेज प्राचार्य डॉ. गिरीश वर्मा व विशिष्ट अतिथि डॉ. एचएल परिहार ने किया। संयोजक डॉ. अनिल सक्सेना, सचिव डॉ. राजेन्द्र ताखर ने बताया कि कांन्फे्रं स में प्रदेश भर के 250 चिकित्सक पहुंचे।
ये बोले एक्सपर्ट
2-3 दिन में डायग्नोस की जा सकती है टीबी
इंडियन चेस्ट सोसायटी के अध्यक्ष डॉ. एस.के. लुहाडिय़ा ने बताया कि टीबी के लंग्स (एमपीआरटीबी) के केस बढ़ रहे हैं। पहले 2 साल का कोर्स मरीज को लेना पड़ता था, लेकिन अभी 9 से 11 माह में उपचार संभव है।
80 फ ीसदी नहीं कराते स्वाइन फ्लू की जांच
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चेन्नई से आए डॉ. सुप्रीत बत्रा ने कहा, स्वाइन फ्लू का वायरस सर्दियों में प्रभाव ज्यादा छोड़ता है। 80 फीसदी लोग खांसी-जुखाम को साधारण मानते हैं, लेकिन स्वाइन फ्लू की जांच नहीं कराते। इसकी जांच करानी चाहिए।
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धुंआ कर सकता है बीमार
लखनऊ से कोटा आए डॉ. अजमल खान ने बताया कि धुंआ आपको बीमार कर सकता है। चाहे मॉस्किटो कॉइल हो या सिगरेट का धुंआ, यह खतरनाक हो सकता है। एक साल में 40 सिगरेट पीने से भी श्वास की बीमारी हो सकती है।
सोनी मेडिकल कॉलेज ऑडिटोरियम में शनिवार से आयोजित दो दिवसीय राज्य स्तरीय राजपूल्मोकॉन-2018 कान्फ्रेस को सम्बोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि श्वसन रोगियों और इनमें खासतौर पर इंटरस्टीटियल लंग डिजीज (आईएलडी) के मामले बढ़ रहे हैं। इन मामलों में कही न कही कबूतर की फडफ़हाड़ट व बीट, सीलन, उमस आदि भी जिम्मेदार हैं। नाखूनों का टेड़ा होना भी (कलबिंग) भी आईएलडी के लक्षण हैं। प्रदेश में कुछ क्षेत्रों में इस तरह के मामले सामने आए हैं।
Updated on:
18 Mar 2018, 11:25 AM IST
Published on:
18 Mar 2018, 11:11 AM IST
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