scriptItalian fresco mural painting workshop concludes | डॉ वंदना सहगल ने कलाकारों को किया सम्मानित और समझाई बारीकियां | Patrika News

डॉ वंदना सहगल ने कलाकारों को किया सम्मानित और समझाई बारीकियां

आज जो कार्य मैं यहाँ कर रहा हूँ यह मेरे पिता की दिली तमन्ना थी कि इस विधा को आगे बढ़ाया जाए। कार्यक्रम में चर्चा करते हुए अजित वर्मा ने कहा मुझे आज बड़ी ख़ुशी हो रही है कि इस काम के प्रेरणा मेरे पिता ग्यारसी लाल वर्मा (जो आज भले ही शारिरिक रूप में नहीं हैं ) हैं। आज उनकी आत्मा को बड़ी खुशी हो रही होगी।

लखनऊ

Published: January 28, 2022 07:28:48 pm

लखनऊ, प्रदेश में स्थित वास्तुकला एवं योजना संकाय,अब्दुल कलाम प्राविधिक विश्वविद्यालय,टैगोर मार्ग कैंपस लखनऊ के तत्वावधान में 24 जनवरी से चल रहे चार दिवसीय इटैलियन फ्रेस्को पेंटिंग म्यूरल कार्यशाला का समापन हुआ। इस अवसर पर वडोदरा गुजरात से आये आमंत्रित म्यूरल विशेषज्ञ अजित वर्मा को संकाय की डीन डॉ वंदना सहगल द्वारा अंगवस्त्र से सम्मानित किया गया। इस अवसर पर इंटैक की डायरेक्टर डॉ ममता मिश्रा एवं उनकी टीम मौजूद रही। अजीत वर्मा म्यूरल विशेषज्ञ सानिध्य मे वास्तुकला संकाय एवं कला महाविद्यालय, इंटैक लखनऊ के गणमान्य कलाकार,कला प्रेमी एवं विज्ञान नेताओं ने उत्साहपूर्वक भागीदारी की।
डॉ वंदना सहगल  ने कलाकारों को किया सम्मानित और समझाई बारीकियां
डॉ वंदना सहगल ने कलाकारों को किया सम्मानित और समझाई बारीकियां
कार्यशाला के समन्वयक गिरीश पांडेय एवं भूपेंद्र अस्थाना ने बताया की इस प्रकार के चित्र अजंता के गुफाओं मे देखने को मिलते है। यह चित्रण एक विशेष प्रकार की सतह बना कर की जाती है। जिससे यह चित्र दीर्घकालीन सुरक्षित रहते है। इसे ‘भित्ति चित्रण की ‘गीली चित्रण पद्धति’ (wet process of Mural पेंटिंग) भी कहा जाता है। इसमे बनायी गयी सतह जब तक गीली रहती है तभी तक चित्रकारी की जाती है। यह काफी पुरानी एवं पूर्ण देशी पद्धति है। इसमे प्राकृतिक रंग का निर्माण पत्थरों तथा वनस्पतियों से स्वयं ही किया जाता है। नर्म रंगीन पत्थरों को कठोर पत्थर पर घिस कर रंग तैयार किए जाते हैं। सतह के निर्माण मे चूना तथा संगमरमर के महीन और कुछ मोटे दाने के आनुपातिक मिश्रण को देशी चक्की मे पिसाई करके तैयार कर दीवार पर प्लास्टर के लिए प्रयोग किया जाता है।
यह रंग एवं घोल जीतने पुराने होंगे वो उतने ही अच्छे होते हैं। कलाकार अजीत वर्मा जी ने बताया कार्यशाला मे जिस रंग एवं प्लास्टर का प्रयोग किया जा रहा है यह 16 साल पुराना है। संप्रति इस विधा मे काम करने वाले कलाकारों की संख्या बहुत ही कम है। अजीत वर्मा ने इस विधा को अपने साथ जीवित रखा है।अजीत वर्मा जी को यह विधा अपने गुरु के. जी. सुब्रमानियम (भारत के सुप्रसिद्ध कलाकार) एवं अपने पिता श्री गयारसि लाल वर्मा ( जो एम0 एस० युनिवर्सिटी, बरोडा के शिक्षक थे) उनसे मिला है।
भूपेंद्र अस्थाना ने बताया की कार्यशाला के दौरान अजित वर्मा ने बड़े ही भाउकता से कहा की यह भावुक पल है अपने पिता जी श्री गयारसि लाल वर्मा को याद करते हुए एक महत्वपूर्ण बात साझा की। उन्होंने कहा कि आज जो कार्य मैं यहाँ कर रहा हूँ यह मेरे पिता की दिली तमन्ना थी कि इस विधा को आगे बढ़ाया जाए। कार्यक्रम में चर्चा करते हुए अजित वर्मा ने कहा मुझे आज बड़ी ख़ुशी हो रही है कि इस काम के प्रेरणा मेरे पिता ग्यारसी लाल वर्मा (जो आज भले ही शारिरिक रूप में नहीं हैं ) हैं। आज उनकी आत्मा को बड़ी खुशी हो रही होगी।
लखनऊ में यह फ्रेस्को वर्क उनकी स्मृति स्वरूप रहेगी है। बताना चाहेंगे कि लखनऊ के रवींद्रालय पर बनी टेराकोटा ग्लेज्ड म्यूरल तैयार करने में कलाऋषि गुरु के. जी. सुब्रमण्यम के साथ मेरे पिता भी सहयोगी रहे और आज लखनऊ में आकर इस वास्तुकला संकाय में इस काम करते हुए मुझे अत्यंत प्रसन्नता हो रही है। वास्तुकला एवं योजना संकाय के प्राचार्य एवं डीन तथा इस कार्यशाला की मुख्य संरक्षक डा.वंदना सहगल ने कलाकार का सम्मान कर अपने अनुभव साझा करते हुए कहा की की यह बहुत ही श्रमसाध्य एवं खूबसूरत कला शैली है। इसके रंग अत्यंत आकर्षक होते हैं।

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