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आज भी बुजुर्ग आंखों के सामने लहराता है लालकिले का वह तिरंगा

99 वर्षीय स्वरूप कुमारी बख्शी को याद है पहला गणतंत्र दिवस...
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लखनऊ

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Prashant Srivastava

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Updated: 23 Jan 2018, 2:28 PM IST

swaroop

लखनऊ. सच बताऊं मुझे वो दो तारीखें अपनी जिंदगी से ज्यादा प्यारी हैं... बात चाहे 15 अगस्त 1947 की कीजिए या 26 जनवरी 1950 की, लाल किले की प्राचीर पर लहराता तिरंगा मेरे शरीर में आत्मा की तरह बस चुका है। जिंदगी के 99 बसंत देखने के बाद भी यूं लगता है कि वो लम्हा ही मेरी जिंदगी का सबसे यादगार पल है। यह जज्बात है लखनऊ की 99 साल की स्वरूप कुमार बख्शी के, जो कि पहले स्वतंत्रता दिवस व गणतंत्र दिवस की साक्षी रह चुकी हैं। वह यूपी की पूर्व कैबिनेट मंत्री व कांग्रेस की वरिष्ठ नेता हैं।

उम्र 99 साल लेकिन हौसले किसी नौजवान से कम नहीं हैं। पत्रिका से बातचीत में स्वरूप कुमारी बख्शी ने उन दिनों को याद करते हुए तमाम किस्से साझा किए। उन्होंने बताया कि पहले गणतंत्र दिवस को लेकर देश भर में काफी उत्साह था। राजधानी में विधानसभा के पास हुए कार्यक्रम में हिस्सा लेने वो भी पहुंचीं थीं। इस दौरान वंदे मातरम के नारे और देश भक्ति के तराने लोग गा रहे थे। पंडित नेहरू, महात्मा गांधी जिंदाबाद के नारे लग रहे थे।

आजादी के लिए गईं थीं जेल

99 वर्षीय स्वरूप कुमारी बख्शी को कई पुराने किस्से याद हैं। वह साल 1920 में महज 11 साल की उम्र में अपने परिवार के साथ कांग्रेस में शामिल हुईं। साल 1929 में वह कांग्रेस के लाहौर सेशन में हिस्सा लेनें भी गईं थीं। इस दौरान पंडित नेहरू ने पूर्ण स्वराज की बात कही थी जिसके बाद से देश की सियासत में नेहरू का कद बढ़ गया। साल 1942 में कांग्रेस के बॉम्बे सेशन में भी हिस्सा लेने वह पहुंचीं थी। इसके बाद उन्होंने देश को आजादी दिलाने के लिए आंदोलन शुरू किया। उस दौरान लखनऊ में उनकी गिरफ्तारी भी हुईं। वह लगभग 21 दिन जेल में रहीं। साल 1947 में मिली आजादी के बाद स्वरूप कुमारी बख्शी का कांग्रेस में कद बढ़ गया।

नेहरू-गांधी परिवार की खास रही हैं

स्वरूप कुमारी बख्शी को नेहरू-गांधी परिवार का खास माना जाता रहा है। उनकी बेटी ऊषा मालवीय ने बताया कि इंदिरा के दौर में उनकी मां को यूपी में कई अहम जिम्मेदारियां मिली। वह लखनऊ पर्वी से चार बार विधायक बनीं। वहीं यूपी कैबिनेट में मंत्री भी रहीं। जब वह शिक्षा मंत्री थीं उसी दौरान राजधानी में भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी की नींव रखी गई। इंदिरा गांधी उन पर इतना भरोसा करती थीं कि रायबरेली-अमेठी में कांग्रेस को जिताने की जिम्मेदारी स्वरूप कुमारी बख्शी को ही दे रखी थी। इंदिरा के बाद जब राजीव गांधी चुनाव लड़ने आए अमेठी आए तो ऊषा मालवीय ने अपनी मां के साथ अमेठी में कई दिन बिताए। ऊषा ने बताया कि इस दौरान उन लोगों तिलोई समेत अमेठी के कई इलाकों में दिन-रात कैंपनिंग की।

कई किताबें भी लिख चुकी हैं

स्वरूप कुमारी बख्शी पेशे से लेखक भी हैं। वह अब तक 36 किताबें लिख चुकी हैं जिनमें अधिकतर फिक्शन हैं। आंखों की रोशनी कमजोर होने के काऱण वह अब लिख तो नहीं पातीं लेकिन उनका लिखा काफी मैटर अभी पब्लिश होने से बचा है। उनकी बेटी ऊषा मालवीय ने बताया जल्द ही उस मैटर को पब्लिश करवाया जाएगा।

यहां देखें वीडियो-