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Success Story : छात्र राजनीति से लोकसभा स्पीकर तक का सफर, जानें पूरी कहानी

Success Story

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Success Story of om om birla

Success Story : राजनीति में पांव जमाना हर किसी आम इंसान के बस की बात नहीं, और बात हो जब शिखर तक पहुँचने कि तो बहुत ही कम उदाहरण देखने को मिलते हैं। देश की राजनीति में खुद को अंगद की भांति जमाए ऐसे ही नेता की सफलता की कहानी आपसे साझा कर रहे हैं। देश की सबसे बड़ी पंचायत के होने वाले अध्यक्ष ओम बिरला ने 3 साल की उम्र में ही बिरला ने पिता को कह दिया था-बाऊजी, मैं तो नेता ही बनूंगा। राजग ने लोकसभा अध्यक्ष पद के लिए ओम बिरला को नॉमिनेट किया है।

ओम बिरला नौ बेटे-बेटियों में ओम पांचवें नम्बर के हैं। ओम पढ़ाई में बचपन से ही होशियार था, लेकिन पढ़ाई से ज्यादा उसकी रुचि नेता बनने की थी। तीन साल का था तब कह दिया कि नौकरी नहीं करूंगा..., नेता बनूंगा। लीडरशिप के गुण बचपन में दिखने लगे थे। पिता ने उनकी काबिलियत देख कभी रोका नहीं, बल्कि उनका हौसला बढ़ाया। राजेश (राजेश कृष्ण बिरला) को भी राजनीति में रुचि थी और ओम से पहले राजेश राजनीति में सक्रिय हो गया था। राजेश का मल्टीपरपज स्कूल में छात्र संघ अध्यक्ष बनने का नम्बर आया तो उसने ओम को आगे बढ़ा दिया। राजेश हमेशा ओम के राजनीतिक मार्गदर्शक की भूमिका में रहा और राजनीति में खुद पीछे हो गया। ओम की मां शुकुंतला ने हमेशा मनोबल बढ़ाया। ओम के साथी शाम को घर आ जाते थे तो शुकुंतला सबके लिए खीर-पुड़ी बनाती थी।


राजनीति में अपनी अलग पहचान रखने वाले कोटा-बूंदी सांसद ओम बिरला ने छात्र राजनीति से जो सफर शुरू किया था, आज एक बड़े पड़ाव पर पहुंच गया है। कामयाबी के शिखर पर पहुंचने वाले बिरला ने हमेशा जमीनी स्तर पर काम करने का ध्येय रखा। सबको साथ लेकर चलने की रणनीति ही बिरला की सफलता का राज मानी जाती है। बिरला की पहचान जितनी राजनेता के रूप में है, उससे कई ज्यादा सामाजिक कार्यों में मानी जाती है।

बिरला ने राजनीतिक जीवन की शुरुआत राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय गुमानपुरा (मल्टीपरपज स्कूल) से की थी। 1977 में पहली बार छात्रसंघ अध्यक्ष निर्वाचित हुए, इसके बाद बिरला लगातार राजनीति की सफलता के एक-एक पायदान चढ़ते गए। कॉमर्स कॉलेज में भी संयुक्त सचिव रहे।

बिरला के पिता श्रीकृष्ण बिरला सहकारी नेता थे और प्रदेश की सबसे पुरानी कोटा कर्मचारी सहकारी समिति (सभा नम्बर 108) के अर्से से अध्यक्ष हैं। पिता से ओम बिरला ने सहकारी संस्थाओं को कैसे सुव्यवस्थित संचालित करना है, यह सीखा। राज्य सरकार ने कोटा सहकारी उपभोक्ता होलसेल भण्डार को लगातार घाटे के चलते बंद करने का ऐलान कर दिया। बिरला 1985 में भण्डार के अध्यक्ष बने। उन्होंने अपने कुशल प्रबंधन से दो साल में घाटे में चल रहे भण्डार को लाभ में ला दिया, जो आज भी लाभ में संचालित है। बिरला के सहकारी कॉन्सेप्ट को प्रदेशभर में लागू किया गया। बिरला फिर राजस्थान सहकारी उपभोक्ता भण्डार के और फिर राष्ट्रीय सहकारी उपभोक्ता संघ नई दिल्ली के वाइस चेयरमैन बने।

बिरला युवा शक्ति की ऊर्जा को पहचानते हैं। युवा मोर्चा से लेकर आज भी बिरला युवाओं को हमेशा आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। युवा मोर्चा के कोटा के अध्यक्ष रहे। फिर युवा मोर्चा के लम्बे समय तक प्रदेशाध्यक्ष रहे। इसके बाद मोर्चा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहे। इस दौरान मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे। बिरला के साथ काम करने वाली युवा टीम के नेता आज सरकार और पार्टी में अहम पदों पर है।


2003 में ओम बिरला कांग्रेस के दिग्गज नेता शांति धारीवाल को चुनाव हराकर विधायक चुने गए थे। 2004 में संसदीय सचिव बने। संसदीय सचिव के रूप में जन अभाव अभियोग का प्रभार का दायित्व सौंपा गया। बिरला ने प्रदेशभर की जनता की समस्याओं का समाधान करवाकर अपनी पहचान बनाई। खुद बिरला शहरों से लेकर गांवों में जाकर समस्या निवारण शिविर लगाए थे। विपक्ष में विधायक के रूप में सरकार को घेरने में बिरला ने कोई कौर कसर नहीं छोड़ी। विधानसभा में सबसे अधिक सवाल लगाने वाले विधायक रहे।