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84 महादेव सीरीज: पितरों को प्रसन्न करती है श्री जटेश्वर महादेव की कथा

चौरासी महादेवों की शृंखला में 28वें क्रम पर श्री जटेश्वर महादेव का मंदिर आता है। इनके दर्शन-पूजन करने से मनुष्य सब पापों से छूटकर मुक्ति पाता है और श्राद्ध पक्ष में पितृ प्रसन्न होते हैं। 

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Lalit Saxena

Aug 31, 2016

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उज्जैन. चौरासी महादेवों की शृंखला में 28वें क्रम पर श्री जटेश्वर महादेव का मंदिर आता है। इनके दर्शन-पूजन करने से मनुष्य सब पापों से छूटकर मुक्ति पाता है और श्राद्ध पक्ष में पितृ प्रसन्न होते हैं। श्रावण-भादौ मास में पत्रिका डॉट कॉम के जरिए आप 84 महादेव की यात्रा का लाभ ले रहे हैं।
जटेश्वर महादेव की कथा
राजा वीरधन्वा और उनके द्वारा वन में किए गए दोषों के निवारण से जुड़ी हुई है जटेश्वर महादेव की कथा जो ऋषि-मुनियों की महत्ता दर्शाती है। मुनि द्वारा बताए मार्ग पर चलकर ही राजा को शांति प्राप्त हो सकी। एक बार राजा शिकार करने वन में गए। उन्होंने मृग रूपी आकृति देख बाण चला दिए। जहां बाण चलाए वे वास्तविकता में संवर्त ब्राम्हण के पांच पुत्र थे, जो मृगरूप में विचर रहे थे।

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वे मृग रूप में क्यों थे
वे मृग रूप में क्यों थे, यह एक शाप के कारण हुआ था। उसकी कथा यह है कि एक बार उन ब्राम्हण पुत्रों द्वारा हिरन के पांच छोटे बच्चों का वध हो गया था। घर जाकर बालकों ने अपने पिता को सारा वृत्तांत सुनाया और प्रायश्चित का मार्ग पूछा। तभी वहां भृगु ऋषि, अत्रि और अभि ऋषि आ गए। सारी बातें जानने पर वे बोले कि प्रायश्चित हेतु तुम पांचों बच्चे पांच वर्ष तक मृग चर्म ओढ़ कर वन में रहो। इस प्रकार वे पांचों वन में भटक रहे थे और एक वर्ष के पश्चात राजा वीरधन्वा ने उन्हें मृग समझ मार डाला।

एषते कथितो देवि प्रभाव: पापनाशन:।
जटेश्वरस्य देवस्य श्रृणु रामेश्वरम शिवम।।

जब राजा को ज्ञात हुआ
जब राजा को यह ज्ञात हुआ कि वे ब्राह्मण पुत्र थे तो वे अत्यंत दुखी हुए। भय से कांपते हुए वे देवरात मुनि के पास पहुंचे एवं उन्हें सारी बातें कहीं। मुनि ने उन्हें शांत रहने को कहा और कहा कि भगवान जनार्दन की कृपा से तुम्हारा पाप दूर हो जाएगा। मुनि की अप्रभावी बात सुनकर राजा को क्रोध आ गया और उसने तलवार से मुनि की हत्या कर दी। इस हत्या के बाद वे और ज्यादा क्रोधित हुए, संतुलन खोते हुए वन में भटकने लगे और वहीं उन्होंने गालव ऋषि की कपिल गाय का भी वध कर दिया। जड़ भूत बुद्धि से वे निर्दिशा होकर वन में भटकते रहे।


राजा को वन में भटकते देखा
राजा को वन में भटकते हुए एक बार मुनि वामदेव ने देखा। राजा को देखते ही वे सारा अतीत जान गए। राजा उनसे कहने लगा कि उसने ब्राम्हण हत्या की है, गौ हत्या की है, वह इस दोष से अत्याधिक दुखी है। तब मुनि राजा से बोले कि आपकी बुद्धि पूर्व काल के कुछ कर्मों के कारण जड़ हुई है और इसी वजह से आपको ब्रम्ह हत्या का दोष लगा है। आप तुरंत महाकाल वन जाइए। वहां अनरकेश्वर के उत्तर में स्थित दिव्य लिंग का दर्शन करें। उनके दर्शन से ही उद्धार हो सकता है। मुनि के कहे अनुसार राजा महाकाल वन पहुंचे और वहां उन्होंने मुनि वामदेव द्वारा बताए शिव लिंग का पूजन किया। पूजा के फलस्वरूप उस लिंग में से जटाधारी शिव प्रकट हुए और राजा को ब्रम्ह हत्या के दोष से मुक्त कर उनकी जड़ीभूत बुद्धि निर्मल करने का वरदान दिया। तभी से वह लिंग जटेश्वर कहलाया।

दर्शन से पाप, दोष नष्ट होते हैं
श्री जटेश्वर महादेव के दर्शन से पाप, दोष नष्ट होते हैं। भ्रष्ट बुद्धि वाले मनुष्यों की स्थिति सुधर जाती है। कहा जाता है कि श्राद्ध के समय जो जटेश्वर की कथा को पढ़ता या सुनता है, उसका श्राद्ध पितरों को प्रसन्न करता है। श्री जटेश्वर महादेव का मंदिर गया कोठा में है।

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