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तो यहां से शुरू हई थी श्राद्ध की परंपरा, जानें क्या है श्राद्ध की सही विधि

धर्म ग्रंथों के अनुसार पितरों की भक्ति से मनुष्य को पुष्टि, आयु, वीर्य और धन की प्राप्ति होती है। ब्रह्माजी, पुलस्त्य, वशिष्ठ, पुलह, अंगिरा, क्रतु और महर्षि कश्यप-ये सात ऋषि महान योगेश्वर और पितर माने गए हैं। 

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Widush Mishra

Sep 21, 2016

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सागर. इन दिनों पितृ मोक्ष पखवाड़ा चल रहा है। अपने पितरों का तर्पण (श्राद्ध) करने कोई गया जा रहा है तो कोई बनारस। लेकिन ज्यादातर लोग यह नहीं जानते कि श्राद्ध की परपंरा आखिर है क्या और यह कैसे शुरू हुर्ई। हांलाकि किताबों में इसके बारे में पढऩे मिल जाता है लेकिन इस पर भिन्न-भिन्न लेखकों की अलग-अलग राय है। आज पत्रिका आपको बताने जा रहा है श्राद्ध से जुड़ी वे बातें, जिनसे श्राद्ध आमजन तक पहुंचा।


यह है श्राद्ध की सही विधि...
धर्म ग्रंथों के अनुसार पितरों की भक्ति से मनुष्य को पुष्टि, आयु, वीर्य और धन की प्राप्ति होती है। ब्रह्माजी, पुलस्त्य, वशिष्ठ, पुलह, अंगिरा, क्रतु और महर्षि कश्यप-ये सात ऋषि महान योगेश्वर और पितर माने गए हैं। श्राद्ध पक्षों में श्रद्धालु अपने पूर्वजनों की श्राद्ध वाली तिथि के दिन सबसे पहले अपने पिता को पिंडदान करना चाहिए। इसके बाद दादा को और फिर परदादा को पिंड देना चाहिए। यही श्राद्ध सही विधि है। इस दौरान गायत्री मंत्र के जाप के साथ सोमाय पितृमते स्वाहा का उच्चारण करना भी लाभकारी होता है।


ऐसे होते हैं पूर्वज तृप्त
शास्त्रों के अनुसार रजस्वला स्त्री को श्राद्ध का भोजन तैयार करने में नहीं लगाना चाहिए। तर्पण करते समय पिता-पितामह आदि के नाम का स्पष्ट उच्चारण करना चाहिए। किसी नदी के किनारे पहुंचने पर पितरों का पिंडदान और तर्पण जरूर करना चाहिए। पहले अपने कुल के पितरों को जल से तृप्त करने के पश्चात मित्रों और संबंधियों को जलांजलि देनी चाहिए।


निमि ने किया श्राद्ध का आरंभ
श्राद्ध को लेकर विद्वानों के अलग-अलग मत हैं लेकिन जो सर्वविदित है, वह यह है कि महाभारत के अनुशासन पर्व में भी भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को श्राद्ध के संबंध में कई बातें बताई हैं। महाभारत के अनुसार प्रथम बार श्राद्ध का उपदेश महर्षि निमि को अत्रि मुनि ने दिया था। इस प्रकार पहले निमि ने श्राद्ध का आरंभ किया। फिर अन्य महर्षि भी श्राद्ध करने लगे। धीरे-धीरे चारों वर्णो के लोग श्राद्ध में पितरों को अन्न देने लगे।


श्राद्ध में सबसे पहले अग्नि का भाग
ऐसा कहा जाता है कि श्राद्ध का भोजन लगातार करने से पितरों का भोजन नहीं पच रहा था। फिर वे वे ब्रह्माजी के पास गए और उनसे कहा, श्राद्ध का अन्न खाते-खाते हमें अजीर्ण हो गया है। हे प्रभु हमारी रक्षा करें। यह सुनकर ब्रह्माजी ने कहा, ये अग्निदेव हैं। यही आपका कल्याण करेंगे। अग्निदेव बोले, अब हम श्राद्ध में एक साथ भोजन किया करेंगे। मेरे साथ रहने से आप लोगों का अजीर्ण दूर हो जाएगा। यह सुनकर देवता व पितर प्रसन्न हुए। इसलिए श्राद्ध में सबसे पहले अग्नि का भाग दिया जाता है।

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