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पार्वती के पसीने से हुई थी इस वृक्ष की उत्पत्ति, हर भाग में देवियों का वास

बिल्व यानी बेल के वृक्ष का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है, यह अर्थ,धर्म और मोक्ष प्रदान करने वाला माना गया है। शिव और भगवती पूजन में इसकी पत्तियों और फलों का अर्पण किया जाता है।

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Ajay Khare

Sep 14, 2016

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जबलपुर। बिल्व यानी बेल के वृक्ष का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है, यह अर्थ,धर्म और मोक्ष प्रदान करने वाला माना गया है। शिव और भगवती पूजन में इसकी पत्तियों और फलों का अर्पण किया जाता है।

बेल वृक्ष की उत्पत्ति के संबंध में स्कंद पुराण में कहा गया है कि एक बार देवी पार्वती ने अपने ललाट से पसीना पोंछकर फेंका तो उसकी कुछ बूंदें मंदार पर्वत पर गिरीं, जिससे बेल वृक्ष उत्पन्न हुआ। इस वृक्ष की जड़ों में गिरिजा, तना में महेश्वरी, शाखाओं में दक्षयायनी, पत्तियों में पार्वती, फूलों में गौरी और फलों में कात्यायनी वास करती हैं। पूर्व में इसे ही श्रीफल कहा जाता था।

बिल्व पत्र का महत्व
बिल्व का पेड़ संपन्नता का प्रतीक, बहुत पवित्र तथा समृद्धि देने वाला है। बेल के पत्ते भगवान शंकर का आहार माने गए हैं, इसीलिए भक्त बड़ी श्रद्धा से इन्हें महादेव के ऊपर चढ़ाते हैं। तीन पत्तियों वाले बिल्व पत्र आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं, किंतु कुछ ऐसे बिल्व पत्र भी होते हैं जो दुर्लभ और चमत्कारिक होते हैं। श्रीमद् देवी भागवत में कहा गया है कि जो व्यक्ति मां भगवती को बिल्व पत्र अर्पित करता है वह कभी भी किसी भी परिस्थिति में दुखी नहीं होता। उसे हर तरह की सिद्धि प्राप्त होती है और कई जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है और वह भगवान भोले नाथ का प्रिय भक्त हो जाता है। उसकी सभी इच्छाएं पूरी होती हैं और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है।

श्रीफल माना जाता था बिल्व फल
नारियल से पहले बिल्व फल को श्रीफल माना जाता था। बिल्व वृक्ष लक्ष्मी जी का प्रिय वृक्ष माना जाता है। पहले लक्ष्मी पूजन में बिल्व फल को लक्ष्मी और सम्पत्ति का प्रतीक मान कर इसकी आहुति दी जाती थी जिसका स्थान अब नारियल ने ले लिया है। श्रीसूक्त में लक्ष्मी पूजन में इसके महत्व का उल्लेख है।

21 पत्तियों तक के होते हैं बिल्व पत्र
बिल्व पत्र चार प्रकार के होते हैं अखंड बिल्व पत्र, तीन पत्तियों के बिल्व पत्र, छ: से 21 पत्तियों तक के बिल्व पत्र और श्वेत बिल्व पत्र। इन सभी बिल्व पत्रों का अपना-अपना महत्व है। अखंड बिल्व पत्र अपने आप में लक्ष्मी सिद्ध है। एकमुखी रुद्राक्ष के समान ही इसका अपना विशेष महत्व है। यह वास्तुदोष का निवारण भी करता है। इसे गल्ले में रखकर नित्य पूजन करने से व्यापार में विकास होता है। तीन पत्तियों वाला बिल्व पत्र तीन गणों से युक्त होने के कारण भगवान शिव को प्रिय है। तीन पत्तियों वाले बिल्व पत्र में अखंड बिल्व पत्र भी प्राप्त हो जाते हैं। कभी-कभी एक ही वृक्ष पर चार, पांच, छह पत्तियों वाले बिल्व पत्र भी पाए जाते हैं। परंतु ये बहुत दुर्लभ हैं। छह से लेकर 21 पत्तियों वाले बिल्व पत्र मुख्यत: नेपाल में पाए जाते हैं। पर भारत में भी कहीं-कहीं मिलते हैं। जिस तरह रुद्राक्ष कई मुखों वाले होते हैं उसी तरह बिल्व पत्र भी कई पत्तियों वाले होते हैं। यह माना जाता है कि देवी महालक्ष्मी का भी बेल वृक्ष में वास है। जो व्यक्ति शिव-पार्वती की पूजा बेलपत्र अर्पित कर करते हैं, उन्हें महादेव और देवी पार्वती दोनों का आशीर्वाद मिलता है। 'शिवपुराणÓ में इसकी महिमा विस्तृत रूप में बतायी गयी है। औषधीय गुणों से परिपूर्ण बिल्व की पत्तियों मे टैनिन, लोह, कैल्शियम, पोटेशियम और मैग्नेशियम जैसे रसायन पाए जाते हैं।

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