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66 दिन लग गए थे शहीद मंगेज सिंह को तलाशने में, पत्नी ने नहीं लिया अन्न का दाना

-करगिल विजय दिवस पर विशेषनागौर. देश पर जान न्योछावर करने वाले शहीद अब यादों में ही बसे हैं। कहीं उनकी मूर्ति को सेल्यूट मारा जा रहा है तो कहीं उनके नाम से स्कूल देखकर आंख में उनके त्याग की तस्वीर नजर आ जाती है। करगिल युद्ध में जब दुश्मन देश से ये लोहा ले रहे थे, तब किसने सोचा था कि अब वो लौट के घर ना आएंगे। शहीद हुए हरनावां के मंगेज सिंह की पार्थिव देह को घर आने में एक महीने से अधिक समय तक लगा, तब तक वीरांगना संतोष कंवर ने अन्न तक ग्रहण नहीं किया था।

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करगिल में शहादत

जायल तहसील के कठौती के मूलाराम, हुडील नावां के सुरेंद्र सिंह, डीडवाना के सूबेदार भंवरलाल, लाडनूं के हवलदार कानसिंह समेत करीब दस जवानों ने करगिल में शहादत दी। हर वर्ष मनाए जाने वाले करगिल विजय दिवस पर उन्हें श्रद्धासुुमन अर्पित किए जाते हैं।

जायल तहसील के कठौती के मूलाराम, हुडील नावां के सुरेंद्र सिंह, डीडवाना के सूबेदार भंवरलाल, लाडनूं के हवलदार कानसिंह समेत करीब दस जवानों ने करगिल में शहादत दी। हर वर्ष मनाए जाने वाले करगिल विजय दिवस पर उन्हें श्रद्धासुुमन अर्पित किए जाते हैं। परिवार ही नहीं गांव-मोहल्ले में इनके जाने से हुआ सूनापन अभी तक दूर नहीं हो पाया है। सरकार की ओर से सम्मान मिला तो आमजन ने भी भरपूर स्नेह से शहीद परिवारों का साथ दिया।

पार्थिव देह आने तक अन्न का दाना नहीं लिया वीरांगना ने

परबतसर के हरनावां पट्टी के सूबेदार मंगेज सिंह वर्ष 1977 में सेना में भर्ती हुए थे। करगिल युद्ध के दौरान अपने साथियों के साथ पेट्रोलिंग पर निकले और छह जून 1999 को वे शहीद हो गए। घर तक खबर पहुंची तो करुण-कंद्रन और विलाप के अलावा कुछ नहीं बचा था। गांव ही नहीं तहसील तो क्या पूरे जिले/राजस्थान तक मंगेज सिंह की शहादत के जयकारे लगे। उनके तीन पुत्र विक्रम सिंह, गिरवर सिंह और जितेंद्र सिंह छोटी-छोटी उम्र में थे तो वीरांगना संतोष कंवर का हाल ऐसा कि खुद संभले कि बच्चों को संभाले। उस दौरान परिवार के साथ गांव के लोग दिन-रात खड़े रहे, अब शुरू हुआ मंगेज सिंह की पार्थिव देह आने का इंतजार। इस दौरान संतोष कंवर को सांत्वना देते रहे, लोग कुछ खाने को कहते रहे पर संतोष कंवर ने कसम खा ली थी कि जब तक उनका मुंह नहीं देखेंगी कुछ नहीं लेंगी। आठ अगस्त को गांव आई देह के सम्मान में पूरा गांव रोया। सैन्य सम्मान के साथ उनकी अंत्येष्टि हुई। वीरांगना संतोष कंवर का कहना है कि उनका देश पर किया गया बलिदान हमारी हिम्मत और प्रेरणा बना। शहीद मंगेज सिंह राजपूताना राइफल्स की बटालियन में सूबेदार पद पर तैनात थे।

ऐसे हुए थे शहीद

मंगेज सिंह को 6 जून 1999 को 10 सैनिकों के साथ पाकिस्तान सीमा क्षेत्र में भेजा गया। जब मंगेज सिंह अपने सैनिकों के साथ वहां पहुंचे तब उन्हें पता चला कि वहां सैकड़ों पाकिस्तान सैनिक हथियारों से लैस हैं। मंगेज सिंह अपनी एलएमडी व मीडियम गन संभालते हुए टारगेट से 50 मीटर ही दूर ही थे कि उनकी टुकडी पर ऑटोमेटिक हथियारों से अचानक फ ायरिंग हुई, जिसमें 6 सैनिक घायल हो गए और एक गोली मंगेज सिंह को भी लग गई। जांबाज मंगेज सिंह ने बाकी बचे सैनिकों को तुरंत घायल सैनिकों को वहां से ले जाने को कहा। साथी सैनिक घायल मंगेज सिंह को अकेला छोडऩे को तैयार नहीं थे। इस पर मंगेज सिंह गुस्सा हुए, उन्होंने कहा यह मेरा आर्डर है तुम तुरंत घायल साथियों को लेकर चले जाओ और साथी सैनिकों को पीछे हटाया और खुद घायल अवस्था में ही आगे बढ़े । बंकर के पीछे पाकिस्तान सैनिकों पर कई राउंड फ ायरिंग कर पाकिस्तान के 7 सैनिक ढेर कर दिए।

शव ढूंढने में लगे थे 66 दिन

शहीद मंगेज सिंह का शव नहीं मिलने पर उच्च स्तर बैठक में सेना अध्यक्ष ने शव ढूंढने के लिए मंगेज आपरेशन चलाया। करीब 66 दिन तक चले सर्च ऑपरेशन के बाद 5 अगस्त 1999 को शहीद मंगेज सिंह का शव मिला । उधर, पति का शव नहीं मिलने पर वीरांगना संतोष कंवर के उपवास की जानकारी मिलने के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत व विदेश मंत्री वसुंधरा राजे खुद हरनावां पहुंचे।

52 साल बाद भी यह हाल

वर्ष 1971 में भारत-पाक युद्ध में शहीद होने वाले नागौर के अस्सी फीसदी जाबाजों की न मूर्ति लगी न कोई स्मारक बन पाया। तेरह दिन चले इस युद्ध में नागौर जिले के 32 जवान शहीद हुए थे, जबकि दस वीरता पदक से सम्मानित हुए थे। शहीदों में से मात्र पांच की ही मूर्ति लग पाई। डीडवाना के 25 तो नागौर के सात जवान इस युद्ध में शहीद हुए थे। नागौर में सात में से सिर्फ एक शहीद महावीर चक्र विजेता सुगन सिंह की मूर्ति ही लगी। शेष छह की मूर्ति ही नहीं लगी।

यहां इतने साल बाद भी निराशा

नागौर के चेनार तहसील के फागली गांव निवासी महफूल खां भी वर्ष 1971 के इस युद्ध में शहीद हुए थे। संतान थी नहीं बाद में इनकी पत्नी का भी निधन हो गया। इनका भतीजा कासम खां लोङ्क्षडग टेम्पो चलाता है। उसका कहना है कि बरसों से वो भी उनकी प्रतिमा लगाने के लिए प्रयास कर रहा है। सांसद के साथ सैनिक कल्याण मंत्री को भी कई बार पत्र लिखा पर कुछ हुआ नहीं।