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इलेक्ट्रॉनिक कृत्रिम हाथ ने लौटाई जिंदगी की पकड़, नि:शुल्क शिविर में 70 दिव्यांगों के सपनों को मिले नए हाथ

-जिले में पहली बार दो दिवसीय शिविर, तकनीक के सहारे फिर से काम करने लगे वे हाथ जो कभी मजबूर हो गए थे। बैतूल। जिस हाथ से कभी रोज़ी-रोटी चलती थी, वही हाथ जब दुर्घटना या बीमारी में साथ छोड़ दे तो इंसान का हौसला भी डगमगा जाता है। बैतूल जिला चिकित्सालय में आयोजित नि:शुल्क […]

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-जिले में पहली बार दो दिवसीय शिविर, तकनीक के सहारे फिर से काम करने लगे वे हाथ जो कभी मजबूर हो गए थे।

बैतूल। जिस हाथ से कभी रोज़ी-रोटी चलती थी, वही हाथ जब दुर्घटना या बीमारी में साथ छोड़ दे तो इंसान का हौसला भी डगमगा जाता है। बैतूल जिला चिकित्सालय में आयोजित नि:शुल्क इलेक्ट्रॉनिक कृत्रिम हाथ वितरण शिविर ने ऐसे ही दर्जनों जरूरतमंदों की जिंदगी में नई उम्मीद जगा दी। आधुनिक तकनीक से बने इन कृत्रिम हाथों ने न सिर्फ उनका आत्मविश्वास लौटाया, बल्कि फिर से सामान्य जीवन की ओर कदम बढ़ाने का रास्ता भी खोला।
कलेक्टर नरेन्द्र कुमार सूर्यवंशी के मार्गदर्शन में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन मप्र और इनाली फाउंडेशन के सहयोग से जिले में पहली बार यह अनूठा प्रयास किया गया। जिला चिकित्सालय के क्रिटिकल केयर यूनिट में आयोजित दो दिवसीय शिविर का शुभारंभ शुक्रवार को अपर कलेक्टर वंदना जाट ने किया। उन्होंने फिटमेंट एरिया का निरीक्षण किया और जिन हितग्राहियों को इलेक्ट्रॉनिक कृत्रिम हाथ लगाए गए थे, उनसे बातचीत कर हाथ की कार्यप्रणाली का डेमो भी देखा। कृत्रिम हाथ को हिलता-डुलता देख कई हितग्राहियों की आंखों में खुशी साफ झलक रही थी। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. मनोज कुमार हुरमाड़े ने बताया कि 15 वर्ष से अधिक आयु के वे सभी व्यस्क, जिनका हाथ कोहनी के निचले हिस्से से नहीं है, उन्हें इस शिविर में नि:शुल्क प्रोस्टेटिक इलेक्ट्रिक हैंड प्रदान किया जा रहा है। इस हाथ में विशेष सॉकेट लगा होता है, जिससे यह इलेक्ट्रॉनिक तरीके से काम करता है और रोजमर्रा के कई कार्य संभव हो पाते हैं। उन्होंने बताया कि आरबीएसके दल, बीपीएम, बीसीएम, आशा कार्यकर्ताओं और एएनएम द्वारा गांव-गांव जाकर 126 हितग्राहियों को चिन्हित किया गया। आरबीएसके मैनेजर योगेन्द्र दवण्डे के अनुसार 16 जनवरी को आयोजित शिविर में कुल 70 हितग्राहियों को इलेक्ट्रॉनिक कृत्रिम हाथ लगाए गए। इलेक्ट्रॉनिक कृत्रिम हाथ पाकर जब हितग्राही पहली बार किसी वस्तु को पकड़ते नजर आए, तो यह शिविर केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि टूटे हौसलों को जोडऩे और आत्मनिर्भरता की ओर लौटाने का मानवीय प्रयास बन गया।

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