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आज देश में कुलिशजी जैसे निर्भीक पत्रकार की जरूरत

झालावाड़। राजस्थान पत्रिका के संस्थापक श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश के जन्म शती दिवस पर शुक्रवार को झालावाड़ के स्काउट-गाइड कार्यालय में अखिल भारतीय साहित्य परिषद इकाई के तत्वावधान में संगोष्ठी हुई। संगोष्ठी में जिले के प्रबुद्धजनों ने कुलिश जी के व्यक्तित्व व जीवन पर विचार व्यक्त किए। मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम […]

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गोष्ठी में मौजूद साहित्यकार


झालावाड़। राजस्थान पत्रिका के संस्थापक श्रद्धेय कर्पूर चन्द्र कुलिश के जन्म शती दिवस पर शुक्रवार को झालावाड़ के स्काउट-गाइड कार्यालय में अखिल भारतीय साहित्य परिषद इकाई के तत्वावधान में संगोष्ठी हुई। संगोष्ठी में जिले के प्रबुद्धजनों ने कुलिश जी के व्यक्तित्व व जीवन पर विचार व्यक्त किए। मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम की शुरुआत हुई।


इस मौके पर झालरापाटन सीबीईओ प्रकाश चन्द सोनी ने कहा कि कर्पूरचन्द्र कुलिश का अर्थ है—‘कर्पूर’ अर्थात उज्ज्वल और ‘कुलिश’ से कठोर। वे असहायों और बेबसों के लिए कर्पूर थे तो समाजकंटकों के लिए कुलिश थे। उनकी पत्रकारिता विश्वसनीय थी, जो आज भी लोकप्रियता के शिखर पर है।
अखिल भारतीय साहित्य परिषद के अध्यक्ष सुरेश निगम ने कहा कि कुलिशजी की पत्रकारिता सजगता, निर्भीकता और निष्पक्षता की थी, जिसकी पैठ आज भी राजस्थान पत्रिका में दिखाई देती है।


साहित्यकार राजेन्द्र प्रसाद शांतेय ने कहा कि कुलिश जी ने गांवों की संस्कृति को पत्रिका के माध्यम से देश में पहली बार जोड़ा। उन्होंने बताया कि 1997 में जयपुर में आयोजित प्रयाग हिन्दी साहित्य के 48वें सम्मेलन में कुलिश जी ने पत्रकारिता को साहित्य का पूरक और संस्कृति को उसका पोषक बताया था।
विकास समिति के संयोजक ओम पाठक ने कहा कि कुलिशजी ने आजादी के पश्चात देश की पत्रकारिता में प्रामाणिकता का महत्व बताया तथा अभिव्यक्ति की आजादी को सर्वोपरि रखा। आज ऐसे ही निर्भीक पत्रकारों की आवश्यकता है।

सामाजिक सरोकारों में पत्रिका आगे

इतिहासकार ललित शर्मा ने कहा कि पत्रिका ने ‘आओ गांव चलें’ स्तंभ के माध्यम से ग्रामीण जनजीवन की जानकारी दी। उन्होंने ‘अमृतम्-जलम्’ अभियान के माध्यम से कई बावड़ियों का जीर्णोद्धार करवाकर उन्हें पेयजल योग्य बनाया। झालरापाटन में गिन्दौर की बावड़ी का जीर्णोद्धार करवाकर उसका नाम ‘कुलिश जल बावड़ी’ रखा गया। कवि राकेश नय्यर ने कहा कि कुलिश जी ने हिन्दी साहित्य को मंच देकर हिन्दी का प्रचार-प्रसार किया। साहित्यकार मोहनलाल वर्मा ने कुलिश जी के पर्यावरण व पक्षी संरक्षण सहित विभिन्न क्षेत्रों पर प्रकाश डाला।
कवयित्री प्रतिमा पुलक ने कुलिश जी की पत्रकारिता में महिला सुरक्षा पर प्रकाश डालते हुए कविता सुनाई। कवि व गीतकार प्रवीण भाटिया ने कुलिशजी को विदेशी मंचों पर भारतीय संस्कृति और संस्कार की ठोस प्रस्तुति देने वाला महान व्यक्तित्व बताया।


1975 के आपातकाल पर की चर्चा


साहित्यकार तुलसीराम तुलसी ने कुलिश जी द्वारा 1975 के आपातकाल के दौर में की गई निर्भीक पत्रकारिता पर चर्चा की। उन्होंने बताया कि कुलिश जी ने तत्कालीन प्रधानमंत्री से इस्तीफे की मांग तक कर दी थी। तुलसी ने राजस्थान पत्रिका पर स्वरचित एक गीत भी सुनाया।
कवयित्री रेखा सक्सेना ने ‘जैसा खाएं अन्न, वैसा होए मन’ के माध्यम से बताया कि कुलिश जी शुद्ध व सात्विक भोजन के पक्षधर थे। साहित्यकार नरेन्द्र चतुर्वेदी ने कहा कि कुलिश जी ने ‘पोलमपोल’ स्तंभ के माध्यम से रिश्वतखोरी और ठगी का विरोध किया। कवि वीरेन्द्र श्रंगी ने कहा कि कुलिश जी के त्याग व समर्पण के कारण भारत सरकार ने उन पर डाक टिकट जारी किया।
संचालन कवि योगेन्द्र शाक्यवाल ने किया।