
योग की सॉफ्ट पावर के विस्तार के लिए अभी बहुत काम बाकी
ऋषभ मिश्रा
असिस्टेंट प्रोफेसर, कानपुर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी
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वैसे तो योग जीवन का एक अहम हिस्सा होना ही चाहिए, किन्तु जब हम किसी दिन को योग दिवस के रूप में मनाते हैं तो उसका मकसद योग के आध्यात्मिक और शारीरिक अभ्यास के लाभों के बारे में लोगों को जागरूक करना है।
इस बार के अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का थीम ‘योग: वसुधैव कुटुम्बकम् के लिए’ है। इसके विपरीत देखा जाए तो योग हमारे देश की ऐसी ‘सॉफ्ट पॉवर’ है, जिसका लाभ हम कभी पूरी तरह उठा ही नहीं पाए। जबकि पश्चिमी देशों में अब इसी योग को कभी ‘माइंडफुलनेस’ के नाम से तो कभी ‘वैलनेस’ के नाम से बेचा जा रहा है। हर देश आज किसी न किसी वस्तु एवं सेवा का निर्यात करता है। जैसे रूस और यूक्रेन जैसे देश पूरी दुनिया में अनाज का निर्यात करते हैं। सऊदी अरब और यूएई कच्चे तेल का निर्यात करते हैं तो अमरीका हथियारों का। पर भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जिसने दुनिया को योग निर्यात किया है, योग के जरिए जीवन जीने की पद्धति बताई है। पर एक कड़वा सच यह भी है कि हमारा देश आजादी के बाद से योग की इस सॉफ्ट पावर वैसे विस्तार नहीं कर पाया जैसे दक्षिण कोरिया ने कोरियन पॉप (के-पॉप) को अपनी ताकत बनाया। अमरीका ने हॉलीवुड फिल्मों के जरिए सुपर पावर के रूप में पहचान बनाई।
हमारे यहां आज नहीं, बल्कि योग शब्द का उल्लेख ऋग्वेद में ही मिलता है। द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में योग के महत्व की व्याख्या करते हुए इसे आत्मा से परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग बताया था। हिन्दू मान्यताओं में तो भगवान शिव को सबसे बड़ा योगी कहा गया है। कुछ वर्ष पहले ‘अमरीकन इंस्टीट्यूट ऑफ वैदिक स्टडीज’ ने भगवान शिव को योग का ग्रैंड-मास्टर बताया था। इसी अध्ययन में यह भी कहा गया कि भगवान शिव के ‘नटराज अवतार’ की अलग-अलग नृत्य मुद्राएं अलग-अलग योगासनों को इंगित करती है। सूर्य नमस्कार में तो बारह अलग-अलग तरह के आसन एक साथ किए जाते हैं। यह तथ्य अचरज भरा हो सकता है कि 30 मिनट तक सूर्य नमस्कार करने से लगभग साढ़े चार सौ कैलोरी बर्न होती है। जबकि किसी जिम में 30 मिनट तक वेट-लिफ्टिंग करने या व्यायाम करने से 199 कैलोरी और 30 मिनट तक दौडऩे से लगभग 414 कैलोरी बर्न होती है। यानी जो लोग कैलोरी बर्न करने को फिटनेस का पैमाना मानते हैं उनके लिए भी योग सबसे अच्छा व्यायाम साबित हो सकता है।
महर्षि पतंजलि को योग का जनक कहा जाता है। पश्चिमी देशों में योग का प्रचार-प्रसार करने का श्रेय स्वामी विवेकानंद को जाता है। वर्ष 1893 में शिकागो में विश्व धर्म संसद को सम्बोधित करने के दौरान उन्होंने पश्चिमी देशों का योग से परिचय भी कराया था। अमरीका, ब्रिटेन और बाकी पश्चिमी देशों में भारत के इस योग और अध्यात्म को अलग-अलग नामों से जाना भी जाता है और बेचा भी जाता है। अमरीका में अध्यात्म के लिए ‘माइंडफुलनेस’ शब्द का इस्तेमाल होता है। इसी तरह ब्रिटेन में योग और अध्यात्म के लिए ‘वैलनेस’ और ‘मेडिटेशन’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल होता है, और इसके जरिए बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियां वैलनेस के नाम पर योग का सहारा लेकर आज हजारों करोड़ रुपए कमा रही हैं। अकेले अमरीका में ही योग का कारोबार 1 लाख 20 हजार करोड़ रुपए से भी ज्यादा का है। ब्रिटेन में 7 हजार 920 करोड़ रुपए, चीन में लगभग 27 हजार करोड़ रुपए और ऑस्ट्रेलिया में योग का कारोबार 4700 करोड़ रुपए का है। इन तमाम देशों में यह कारोबार योग की बजाय ‘वैलनेस इंडस्ट्री’ के नाम पर होता है।
चिंता इस बात की है कि भारत ने दुनिया को योग, आयुर्वेद और अध्यात्म दिया, लेकिन हम इन्हें भारतीय ब्रांड के रूप में स्थापित नहीं कर पाए। जबकि पश्चिमी देशों ने हमारे इस मूल ज्ञान का पूरा फायदा उठाया। अमरीका के कैनसस सिटी के एक कैथोलिक कॉलेज में वर्ष 2017 के पहले तक छात्रों को योग की शिक्षा दी जाती थी। 2017 में कुछ कट्टरपंथियों ने योग को हिन्दू धर्म का प्रचार-प्रसार बताते हुए रोक लगाने की मांग की। इस विवाद के बाद इस कॉलेज ने योग की क्लास तो बंद नहीं की बल्कि इसका नाम बदलकर ‘लाइफस्टाइल व फिटनेस’ रख दिया। पश्चिमी देशों में योग के दौरान धर्म से जुड़ी प्रार्थनाएं और मंत्रों का उच्चारण होता है तो इसे योग नहीं बल्कि ‘पीट्रा फिटनेस’ कहते हैं। जाहिर है दुनिया के दूसरे देश योग को अलग-अलग रूप में अपना रहे हैं जबकि योग के जनक कहे जाने वाले भारत में अभी इस दिशा में काफी कुछ करना बाकी है।
Published on:
21 Jun 2023 10:36 pm

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