
नई दिल्ली। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद भारत के संवैधानिक राष्ट्रपति तो 26 जनवरी 1950 को बने थे, लेकिन इससे पूर्व वे अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के भी राष्ट्रपति बन कर आजादी की लड़ाई के दौरान मुंबई में संपन्न कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन की अध्यक्षता कर चुके थे। आज की पीढ़ी के लिए अल्पज्ञात तथ्य है कि 26 जनवरी 1950 को स्वतंत्र भारत का संविधान लागू होने में पूर्व कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पदनाम भी राष्ट्रपति होता था।
बम्बई में आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में जब डॉ. राजेन्द्र प्रसाद राष्ट्रपति के रूप में अपना भाषण देने के लिए मंच की आरे जाने लगे, तब उनके सेवक ने आवाज लगाकर रुकने के लिए कहा कि आपका कुर्ता फटा हुआ है, मैं अभी दूसरा लाकर देता हूं।
इस पर राजेन्द्र बाबू ने अपनी घड़ी की ओर देखते हुए कहा कि नहीं, समय हो गया है। तब सेवक ने कहा बाबू यह अच्छा नहीं लगेगा, मैं दूसरा लाकर देता हूं। उसने जब दूसरा कुर्ता लाकर दिया, तो उसे पहनने के बाद पता चला कि वह तो उससे भी अधिक फटा हुआ है और उन्होंने अपने उसी फटे कुर्ते में अपना भाषण दिया।
राजेन्द्र बाबू किसी सामान्य अथवा निर्धन परिवार से नहीं थे। वे बिहार के एक संपन्न जमींदार परिवार से थे और कलकत्ता विश्वविद्यालय से उन्होंने एलएलबी की उपाधि प्राप्त की थी। उनकी परीक्षा की कॉपी में उनके परीक्षक ने यह लिखकर अपनी विशाल हृदयता का परिचय दिया था कि यह छात्र तो मुझसे अधिक ज्ञानी है। ऐसा अन्य उदाहरण इतिहास में अन्यत्र उपलब्ध नहीं हैं।
शिक्षा समाप्ति के बाद में वे पटना उच्च न्यायालय में वकालत शुरू करने के साथ ही कांग्रेस के आन्दोलनों में भी सक्रिय होने लग गए थे। एक बार महात्मा गांधी बिहार में पदयात्रा के दौरान रात्रि के समय उनके निवास स्थान पर आकर विश्राम करने वाले थे। पदयात्रा में विलंब हो गया और राजेन्द्र बाबू प्रतीक्षा करते-करते सो गए। गांधी जी जब उनके निवास स्थान पर पहुंचे, तो चौकीदार ने उन्हें बताया कि बाबू तो सो गए।
सुबह महात्मा गांधी जब फिर द्वार पर पहुंचे, तो राजेन्द्र बाबू ने पूछा कि बापू मैंने रात को आपका काफी इंतजार किया। आप आए ही नहीं। तब उनका उत्तर था मार्ग में ही देर हो गई। इसलिए आपके सोने के बाद यहां पहुंचा। दुखी स्वर में राजेन्द्र बाबू में पूछा कि फिर आप सोए कहां, तो उनका उत्तर था कि वह सामने जो कुआ है- उसके उसके पास जाकर सो गया।
इस घटना से राजेन्द्र बाबू को इतनी आत्मग्लानि का अनुभव हुआ कि उन्होंने अपने रईसी जीवन का परित्याग कर पटना के सदाकत आश्रम को अपना स्थाई आवास बना लिया, जो कांग्रेस का कार्यालय भी था और आज भी है।
राजेन्द्र बाबू जब देश के सर्वोच्च पद पर आसीन हुए, तो उन्होंने 320 कमरों वाले राष्ट्रपति भवन में अपने परिवार के लिए केवल तीन कमरे आवंटित कराए। वे राष्ट्रपति का कार्यकाल पूरा करके, जब पटना सदाकत आश्रम में लौटे, तब पंजाब नेशनल बैंक के उनके खाते में मात्र तीन हजार रुपए जमा थे।
सीताराम झालानी
(वरिष्ठ पत्रकार)
Published on:
03 Dec 2021 10:55 am
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