अंग्रेजी लोकतंत्र

सच पूछो तो भारत में तो प्रलयकाल आरम्भ हो गया है। चारों ओर अंधेरा सा व्याप्त होने लगा है। दिव्य शक्तियां सुप्त होती जा रही हैं तथा आसुरी व्यापार पांव पसारता जा रहा है। देव उठनी एकादशी भी आकर चली जाती है। देव जागते कहां हैं। सृष्टि पूर्व के महिषासुर और रक्तबीज फैलते जा रहे हैं। कृष्ण की आवश्यकता ही नहीं रह गई, क्योंकि देश से साधुओं का ही लोप हो गया। वे भी 'लोलुप' होते जा रहे हैं। किसका त्राण करेंगे?

By: Gulab Kothari

Updated: 29 Oct 2020, 05:40 PM IST

गुलाब कोठारी

सच पूछो तो भारत में तो प्रलयकाल आरम्भ हो गया है। चारों ओर अंधेरा सा व्याप्त होने लगा है। दिव्य शक्तियां सुप्त होती जा रही हैं तथा आसुरी व्यापार पांव पसारता जा रहा है। देव उठनी एकादशी भी आकर चली जाती है। देव जागते कहां हैं। सृष्टि पूर्व के महिषासुर और रक्तबीज फैलते जा रहे हैं। कृष्ण की आवश्यकता ही नहीं रह गई, क्योंकि देश से साधुओं का ही लोप हो गया। वे भी 'लोलुप' होते जा रहे हैं। किसका त्राण करेंगे?

इस देश को अंग्रेजों से मुक्त किया था, सुख और स्वतंत्र रूप से जीने के लिए। सोचा था हमारा संविधान (Constitution) होगा, हमारी संस्कृति (Culture) होगी। हम स्वयं अपने विकास को परिभाषित करेंगे। यही तो अर्थ है-धर्म संस्थापना-का, जिसके लिए कृष्ण अवतार लेते हैं। अर्थात्-जो कृष्ण सबके हृदय में रहते हैं, वे अपना स्वरूप हर प्राणी में प्रकट करेंगे। आज तो लगता है कि विकास की दौड़ ने और धन की तृष्णा ने उनको भी नींद की गोलियां देकर सुला दिया। कहने को हमने अंगे्रजों को देश से भगा दिया, किन्तु सचाई यह है कि हमने स्वयं अंग्रेज पैदा करने के नए कारखाने लगा लिए। देश में अंग्रेज हजार गुना हो गए। दोनों हाथ से समेट रहे हैं।

उनके संविधान, कानून, कार्यप्रणाली, भाषा तथा जीवनशैली तक भारतीय नहीं है। खान-पान, आचार-विचार-व्यवहार भी अंग्रेजी तर्ज पर हैं। इसी का नतीजा है कि आजादी के परिणाम आज तक भी देश को नहीं मिल पाए। आज पहले से ज्यादा लोग भूखे और बेरोजगार हैं। अपराध, माफिया जैसे कृत्य भी अधिकांशत: सरकारी संरक्षण में ही हो रहे हैं। इनको संरक्षण भी इन्हीं के काले धन का प्राप्त है। सरकारी मानसिकता आज भी लोकतंत्र की आड़ में देश को रौंद रही है। इतना तो न अंग्रेजों ने रौंदा था, न ही सामन्तों ने। भ्रष्टाचार और अंग्रेजी (विदेशी) मानसिकता ने लोकतंत्र (Democracy) को पैर जमाने ही नहीं दिए।

हाल ही में राजस्थान (Rajasthan) के मुख्यमंत्री की आर्थिक सुधार सलाहकार परिषद् की पहली बैठक हुई। आयोजना सचिव सिद्धार्थ महाजन ने बताया था कि राजस्थान में राजस्व से होने वाली आय की 108 प्रतिशत राशि वेतन, पेंशन और ब्याज जैसे प्रतिबद्ध खर्चों पर करनी पड़ रही है। यही लोकतंत्र में किए जाने वाले विकास का आईना है। यह सारा ही विकास हमारे देशवासी ही कर रहे हैं। इसी को रौंदना कहते हैं। राजस्व की तर्ज पर ही घूस और दलाली भी इनको चाहिए। क्या ये देश को लूट नहीं रहे? क्या आवश्यकता है ऐसी सरकारों की? देश को लूटने के लिए जनता क्यों खर्चा उठाए, इस मुद्दे पर नई पीढ़ी मौन रह गई, तो उन तक केवल कर्जा और ब्याज की किश्तें ही पहुंचेंगी। सारे बजट आज तक घाटे के बने, उधार कितना ले चुके और सारा राजस्व कैसे चौपट होता गया, सब सामने है।

जनता मूर्ख बनती जा रही है। कोई धर्म-जाति के नाम पर, कोई वंश या क्षेत्र के नाम पर। आज लगभग आधे अपराधी सांसद जनता के प्रतिनिधि बने बैठे हैं। क्यों? कौन रोकेगा इनको? चुनाव आयुक्त भी सरकार का ही होता है। उसका कहना धर्म संगत नहीं, सरकार संगत है। 'कोर्ट सजा देगा, तब हम उनको चुनाव लडऩे से रोक सकते हैं।' धर्म कहता है कि 'कोर्ट बरी कर दे, तब चुनाव लड़ सकते हैं।' जनता पेट के आगे छोटी पड़ जाती है। अभी बिहार के चुनावों में भी लगभग एक तिहाई प्रत्याशी अपराधी हैं। चुनाव आयोग की बला से।

न्यायपालिका भी मूक हो जाती है, इस तरह के मामलों में। चुनाव के मुद्दे ही पांच साल तक अनिर्णित रहना आम बात है। जनप्रतिनिधियों के आपराधिक मामले तो जनहित में समयबद्ध ढंग से शीघ्र निपटाने चाहिए। यही हाल कार्यपालिका के भ्रष्ट मामलों का है। सरकार कोई भी हो, मुख्यमंत्री स्वयं सारे मामले रफा-दफा करवा देते हैं।

दूसरी ओर जहां आधा देश भुखमरी से जूझ रहा है, अफसरों के वेतन-भत्ते अमरीका की तरह (डालर के समकक्ष) भारी भरकम हैं। जबकि हमारा देश विकासशील है और अमरीका विकसित। प्रश्न यह है कि देश के प्रति दर्द कहां है? सरकारी आंकड़ों के अनुसार केवल वेतन-पेंशन में कुल राजस्व का 44 प्रतिशत खर्च हो रहा है। जबकि नीचे की सारी भर्तियां वर्षों से बन्द पड़ी हैं। सन् 2019-2020 में ब्याज की देनदारी 22,188 करोड़ रुपए की है। यह तो मात्र एक प्रदेश राजस्थान की कहानी है। सभी प्रदेशों को एक साथ रखकर देखें। केन्द्र सरकार के आंकड़े साथ जोडें, तो पता लग जाएगा कि देश कहां जा रहा है। ये सब 'आज के' शहीद भगत सिंह और हरिसिंह ही कर रहे हैं। इस विकास के लिए इन्हें बड़े-बड़े तमगे दिए जाते हैं। चारों ओर इनकी और इनकी औलादों की दहाड़ें ही सुनाई पड़ती हैं।

क्या सर्वोच्च न्यायालय को देश के इन हालात पर विचार नहीं करना चाहिए? राजस्व, विकास के लिए एकत्र किया जाता है। आज केवल ऋण से विकास हो रहा है। देश क्या बेचेगा चुकाने के लिए? क्या देश पुन: बिक जाने की प्रतीक्षा कर रहा है? जनता केवल अंधी होकर लंगड़े के कंधे पर बैठी रहेगी? अथवा किसी अन्य बर्बर, रौंदने वाले को अवसर देना चाहेगी, जो किसी का लिहाज नहीं करेगा।

उत्तर प्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, महाराष्ट्र जैसे राज्य हमारे विकास और भ्रष्टाचार के मोटे-मोटे प्रमाण हैं। देशभक्तों के विदेशी खाते राजस्व के बहाव का मार्ग बता रहे हैं। राष्ट्रमण्डल खेलों के सामान किराए की दरें, कोल-ब्लॉक घोटाला, बीमा कम्पनियों के फसल बीमा के मामले, फर्जी बिल, फर्जी मुकदमे, फर्जी इलाज, वंशवाद जैसे कितने घाव हैं कि राणा सांगा छोटे जान पड़ते हैं। और आज भी हम उच्च शिक्षा के नाम पर राष्ट्रहित के विरूद्ध कार्य करने वाले शहजादे ही तैयार कर रहे हैं। वह दिन कब आएंगे जब भारतीय पैदा करेंगे, भारत के लिए मर मिटने को तत्पर होंगे। आज तो भारत को जीना भी नहीं चाहते।

Gulab Kothari
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