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विष्णु हैं लक्ष्मी के जनक

Gulab Kothari Article Sharir Hi Brahmand: 'शरीर ही ब्रह्माण्ड' शृंखला में पढ़ें पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी का यह विशेष लेख - विष्णु हैं लक्ष्मी के जनक

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सृष्टि का अस्तित्व ब्रह्म पर आधारित है। माया ब्रह्म की कामना है। कामना के बिना सृष्टि नहीं होती। ब्रह्म ज्ञान है, प्रकाश है। निरन्तर विस्तार पाने वाला, गतिशील, स्पन्दन रूप, अमृत तत्त्व है। माया नश्वर है-मृत्यु है, अज्ञान है, संकोच है। स्पन्दन ही विस्तार-संकोच है, प्रकाश-विमर्श है, ब्रह्म-माया है। सृष्टि सात लोकों में फैली है। सूक्ष्म ब्रह्म इन सात लोकों को पार करता हुआ, सूक्ष्म से स्थूल होता हुआ आगे बढ़ता है। पृथ्वी इसका स्थूलतम आश्रय है। चूंकि सोम की आहुति से ब्रह्माण्ड बनता है, अत: ब्रह्माण्ड को विष्णु का शरीर कहा है। लक्ष्मी विष्णु-पाद है- सोम निर्मित विष्णु पत्नी है। स्थूल सृष्टि अर्थ सृष्टि कहलाती है, अचेतन है, पदार्थ रूप है।

सृष्टि पूर्व में अंधकार है, असुर है, सोम है, वरुण है। सोम को सलिल कह रहे हैं। इसी अंधकार में स्थान-स्थान पर ब्रह्म के स्पन्दन भी चल रहे हैं। ये ही आगे चलकर ब्रह्माण्ड का रूप लेते हैं। आकाश से पृथ्वी तक सभी महाभूतों का निर्माण सात स्तरों पर होता है। अन्त में जल से पृथ्वी भी बुद्बुद्, फेन, मृदा, सिकता, शर्करा, अश्मा, अयस् इन सात स्तरों पर निर्मित होती है। मनुष्य, पशु-पक्षी, पेड़-पौधों आदि प्रत्येक के निर्माण के भी सात-सात स्तर होते हैं। जल सोम का घन रूप है। सोम के अधिष्ठाता विष्णु प्राण हैं। सोम से ही पृथ्वी का निर्माण होता है- जो 'लक्ष्मी' नाम से जानी जाती है।

विष्णु गोलोक के अधिष्ठाता हैं। गोलोक का वैदिक नाम परमेष्ठी लोक है, सोम लोक है। विष्णु के अवतार कृष्ण (गोलोक) सोमवंशी हैं। परमेष्ठी लोक के तीन मनोता हैं-भृगु, अंगिरा और अत्रि। भृगु सोम होने से पदार्थ-वाचक है तथा अंगिरा अग्नि वाचक। इन्हीं को विष्णु की दो पत्नियां कहा गया है। ये ही सृष्टि की दो धाराएं हैं। भृगु लक्ष्मी रूप में अर्थ सृष्टि की रचना करती है। अंगिरा सरस्वती रूप में वाक् सृष्टि (नाद) की रचना करती है। लक्ष्मी भोग्या है, अत: अन्न रूप कही जाती है। अन्न ब्रह्म है, सरस्वती वाग् ब्रह्म (नाद ब्रह्म) है। श्रुति में वर्णित है कि शब्द और अर्थ एक ही ब्रह्म के दो विवर्त हैं। जो शब्द ब्रह्म को जान लेता है, वह परब्रह्म को जान लेता है।

द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे शब्द ब्रह्म परं च यत्।
शब्दे ब्रह्मणि निष्णात: परं ब्रह्मधिगच्छति।। (श्रुति)।।

शब्द और अर्थ की समन्वित अवस्था का नाम पदार्थ हैं, जो असंख्य है। शब्द के द्वारा ग्रहण करने योग्य वस्तु ही अर्थ कहलाती है। स्वर्ण, रजत, ताम्र, लौह, पृथ्वी, वायु, मनुष्य, ऋषि, पितर आदि ईश्वरीय सृष्टि के पदार्थ ही हैं, जो शब्द और अर्थ दोनों सम्पत्तियों से युक्त हैं। शब्द और अर्थ दोनों के मूल देवता शास्त्रों में श्री और लक्ष्मी हैं। इनका तात्त्विक नाम सरस्वती और आम्भ्रणी है। इनका मूल उद्भव आपोमय परमेष्ठी लोक (विष्णु लोक) है। परमेष्ठी के दो विवर्त हो जाते हैं-आप: रूप अथवा पितर प्राण रूप और अग्नि रूप अथवा ऋषि प्राण रूप, क्योंकि ब्रह्मा अपने वाक् भाग से परमेष्ठी को उत्पन्न करके उसी में प्रवेश कर जाते हैं-तत्स्रष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्। ऋषि प्राणात्मक गति भाव शब्द सृष्टि का और पितर प्राणात्मक स्थिति भाव अर्थसृष्टि का आधार बना। गति रूप सरस्वती पर प्रतिष्ठित होकर ही आम्भ्रणी अर्थ सृष्टि में समर्थ होती है अत: सरस्वती ही ऐश्वर्य कही जाती है। अंगिरा का स्वभाव विकास है तथा भृगु का स्वभाव संकोच है। जो राष्ट्र केवल अर्थ के आसक्त बनकर सरस्वती की उपेक्षा करता है, ऐस प्रज्ञाशून्य राष्ट्र की अर्थशक्ति कालान्तर में विलीन हो जाती है।

सूर्य सरस्वती मण्डल है, पृथ्वी लक्ष्मी मण्डल है। पृथ्वी को कमला कहा जाता है। जैसे सूर्य के आधार पर पृथ्वी का स्वरूप सुरक्षित है, उसी तरह सरस्वती के आधार पर लक्ष्मी की प्रतिष्ठा है। बिना सरस्वती को आधार बनाए लक्ष्मी की प्रतिष्ठा नहीं हो सकती। दोनों मिलकर ही सृष्टि का निर्माण करती हैं। सरस्वती (अंगिरा) बसन्त ऋतु है। सौम्या लक्ष्मी वर्षा ऋतु है। पंचपर्वा विश्व में ब्रह्म पंचाग्नि के माध्यम से सूक्ष्म से स्थूल रूप में अवतरित होता है। विश्व के पांच पर्व-स्वयंभू, परमेष्ठी, सूर्य, पृथ्वी और चन्द्रमा ही अर्थ सृष्टि (सूक्ष्म से स्थूल) के निर्माण का मार्ग है। प्रत्येक सृष्टि का आधार अग्नि-सोम हैं। अग्नि में सोम की आहुति से निर्मित यज्ञ ही निर्माण का माध्यम है। यहां सोम रेत (बीज) रूप है और अग्नि यजुराग्नि है। सोम ही विष्णु है, अत: सृष्टि के सभी बीज सोम रूप- विष्णु ही हैं। वे ही जनक हैं। पोषक हैं। सम्पूर्ण अर्थ-सृष्टि इसी विष्णु से उत्पन्न होती है।
परमेष्ठी लोक का सोम मह:लोक की अग्नि में आहूत होता है। यही जीव-अजीव की प्रथम सृष्टि है। यही बीज बादल रूप में नीचे उतरता है और बिजली की अग्नि में आहूत होता है। वर्षा के जल के साथ पृथ्वी पर बरसता है। औषध-वनस्पति-प्राणी के रूप में पैदा होता है। यही अन्न रूप में प्राणियों द्वारा भोगा जाता है अर्थात्-बीज रूप में जठराग्नि में आहूत होता है। आहूत बीज (अन्न) शरीरों के सप्त धातुओं का निर्माण करता है। प्राणियों में इसकी अंतिम स्थिति रेत (बीज) बनती है। मानव में अन्न से रस-रक्त-मांस-मेद-अस्थि-मज्जा-रेत (शुक्र) बनता है। पेड़-पौधों में बीज भी इसी प्रक्रिया से तैयार होता है। बीज से अंकुर-नवोद्भिद-पादप-वृक्ष-पुष्प-फल एवं बीज प्राप्त होता है। यही बीज पुन: आगे की सृष्टि-निर्माण का हेतु बन जाता है। इस प्रकार समस्त सृष्टि विष्णु से ही उत्पन्न हुई है। कृष्ण स्वयं कह रहे हैं कि हे कुन्तीनन्दन, सम्पूर्ण योनियों में प्राणियों के जितने शरीर पैदा होते हैं, उन सबकी मूल प्रकृति तो माता है और मैं बीजस्थापन करने वाला पिता हूं-

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तय: सम्भवन्ति या:।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रद: पिता।। (गीता 14.4)

सृष्टि का रहस्य सरस्वती और लक्ष्मी से जुड़ा रहता है। जीवो ब्रह्मैव नापरो अर्थात् जीव ब्रह्म ही है इस आधार पर प्रत्येक प्राणी पुन: ब्रह्म के साथ तादात्मय स्थापित करना चाहता है। इसके लिए ऐश्वर्य, यश, धर्म, श्री, ज्ञान और वैराग्य में प्रवृत्त होना आवश्यक होता है। इन ६ भगों का सम्बन्ध सरस्वती से है। सरस्वती (अग्नि) की साधना से लक्ष्मी (सोम) पर विजय प्राप्त की जा सकती है।

सोम की शक्ति लक्ष्मी जगत् में अर्थवाक् की सृष्टि है। सारे प्राणियों और पदार्थों का निर्माण सोम के योग से ही होता है। यही सोम चन्द्रमा पर आ रहा है। चन्द्रमा हमारे मन को पोषित कर रहा है। सोम के द्वारा यह पोषण हो रहा है। लक्ष्मी चंचल है, अत: हमारा मन भी चंचल है। जैसे-जैसे लक्ष्मी का प्रादुर्भाव होता जाता है, लोभ-मोह-तृष्णा का साम्राज्य बढ़ता जाता है। अहंकार बढ़ता जाता है। अग्नि मूल में तो ऋषि प्राणरूप है। यह सत्यलोक से आती है। किन्तु जो अअग्नि हमें प्राप्त है, उसका अधिष्ठाता सूर्य अक्षर संस्था है। ये प्राणों का, देवों का लोक है। हमारी वर्णमाला का हर अक्षर किसी न किसी देवता का बीजमंत्र ही है। अत:, बुद्धि या ज्ञान सूर्य से प्राप्त होता है। ज्ञान अग्नि प्रधान होता है। ज्ञान के द्वारा असत् शरीर में रहते हुए नित्य सत्य को पकड़ा जा सकता है। ज्ञान ही बुद्धि को प्रज्ञा में बदल सकता है। 'ऋतंभरा तत्र प्रज्ञाÓ-ऋत् भाव को, प्राणों को, समझने की शक्ति प्रज्ञा में होती है। मूल मन तक, श्वोवसीयस मन तक, प्रज्ञा ही पहुंचाती है। फिर वहां लक्ष्मी शुद्ध विज्ञान और आनन्द भाव के कारण मन को चंचल नहीं कर सकती। जब तक अज्ञान का अंधकार रहता है, तब तक ही चंचलता का नृत्य चल सकता है।
क्रमश:

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