
डॉ. एन.के. सोमानी - अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार,
अमरीका-इजरायल व ईरान के बीच चल रही जंग के दौरान अमरीका के सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाए जाने की खबरें सुर्खियों में है। सऊदी अरब, यूएई, कतर, बहरीन और कुवैत यह वह देश हैं, जो रणनीतिक दृष्टि से अमरीका के लिए महत्वपूर्ण हैं और यहां अमरीका के सैनिक ठिकाने हैं। अमरीका और इजरायल के संयुक्त हमले के बाद जिस तरह से ईरान की इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर (आइआरजीसी) ने खाड़ी में अमरीकी सहयोगियों को निशाना बनाने की रणनीति शुरू की है उससे खाड़ी देशों (जीसीसी) में घबराहट का माहौल है। ईरान की मिसाइल व ड्रोन हमलों का निशाना बन रही यहां की इस्लामिक रिजिम और उसकी अवाम अब इस सवाल पर गंभीरतापूर्वक विचार करती दिख रही है कि अनचाहे युद्ध की कीमत उसे कब तक चुकानी पड़ेगी। ईरान के हमलों के बाद खाड़ी की स्थिति पर अमरीकी सहयोगियों के दिलों-दिमाग में यह प्रश्न रह-रहकर उठने लगा है कि युद्ध के बाद उनका भविष्य क्या होगा। ईरान के हमलों ने इस बार खाड़ी का विश्वास डगमगा दिया है।
जीसीसी देशों में इस बात को लेकर गहरी नाराजगी है कि ट्रंप प्रशासन ने उन्हें वक्त रहते हमले की सूचना नहीं दी। जिसका परिणाम यह हुआ कि गेहूं के साथ घुन भी पिसने लगा। खाड़ी सहयोगियों की नाराजगी का एक ओर कारण यह है कि अमरीका की सैन्य प्रतिक्रिया केवल इजरायल और अमरीकी सेनाओं की सुरक्षा पर केंद्रित रही है। दरअसल मध्यपूर्व के देशों में अमरीका ने सैन्य ठिकाने बनाने का सिलसिला उस वक्त शुरू किया जब इस्लामिक स्टेट (आइएस) व अल-कायदा की आतंकवादी गतिविधियां चरम पर थी। ईरान का इस्लामी गणतंत्र अमरीकी सुरक्षा तंत्र के लिए चुनौती बन रहा था। 9/11 के हमलों के बाद अमरीका और मुस्लिम जगत के बीच हुई हिंसक झड़पों ने मध्यपूर्व में अमरीका की दिलचस्पी को और बढ़ा दिया। ऐसी स्थिति में राजनीतिक प्रभुत्व, तेल परिवहन मार्गों की सुरक्षा और ईरान जैसे प्रतिद्वंद्वियों पर नजर रखने के लिए अमरीका ने यहां सैनिक चौकियां स्थापित करना शुरू किया।
सबसे पहले डी आइजनहावर ने 1958 में लेबनान संकट के दौरान सोवियत प्रभाव को रोकने के लिए बेरूत में अमरीकी मरीन भेजी। यह मध्यपूर्व में सैन्य हस्तक्षेप की शुरुआती घटनाओं में से एक थी। 'आइजनहावर डॉक्ट्रिन' के तहत 1996 में कतर का अल उदेद एयरबेस स्थापित किया गया। मध्यपूर्व में यह सबसे बड़ा अमरीकी बेस है। इससे पहले 1995 में बहरीन में यूएस नेवी की फिफ्थ फ्लीट (पांचवें बेड़े) का मुख्यालय स्थापित किया गया। हालांकि अमरीकी नौसेना की मिडिल ईस्ट फोर्स के रूप में बहरीन में 1940 के दशक से ही यह बैड़ा तैनात रहा लेकिन बाद में यह निष्क्रिय हो गया है और 1995 में इसे फिर से सक्रिय किया गया। अब यह फारस खाड़ी, लाल सागर और अरब सागर में अमरीकी नौसेना की कमान संभालता है और होर्मुज स्ट्रेट की निगरानी करता है। कतर की राजधानी दोहा के पास मौजूद अल उदैद एयरबेस मध्यपूर्व में अमरीकी सेंट्रल कमांड के एयर ऑपरेशंस का मुख्यालय है। मध्यपूर्व में यह अमरीका का सबसे बड़ा हवाई अड्डा हैं और यहां करीब 10 हजार अमरीकी सैनिक तैनात है। यूएई (अल धफरा एयरबेस), दुबई (जेबेल अली बंदरगाह), इराक (अल असद हवाई अड्डा), उत्तरी इराक (एरबिल हवाई अड्डा), सउदी अरब (प्रिंस सुल्तान हवाई अड्डा), जॉर्डन (मुवफ्फक अल साल्टी हवाई अड्डा) में अमरीका के अहम सैन्य ठिकाने हैं।
अमरीकी नौसेना के प्रमुख रणनीतिकार रियर एडमिरल अल्फ्रेड थेयर पहले विचारक थे, जिन्होंने पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका के इस क्षेत्र को मध्यपूर्व कहकर संबोधित किया। थेयर के अनुसार यह क्षेत्र अमरीका के 'निकट पूर्व' यानी यूरोप और 'सुदूर पूर्व' यानी भारत के बीच स्थित था। कालांतर में इस पूरे क्षेत्र के लिए मध्यपूर्व नाम प्रचलित हो गया। उत्तरी अफ्रीका से लेकर लेवांत, ईरान से लेकर अरब सागर तक फैला यह क्षेत्र पांच रणनीतिक वैश्विक समुद्री मार्गों को समाहित करता है। जिब्राल्टर जलडमरूमध्य, बोस्फोरस, स्वेज नहर, बाब अल-मंडाब और होर्मुज जलडमरूमध्य।
थेयर ने जिस वक्त इस क्षेत्र को मध्यपूर्व नाम दिया तब कहा तो यह जा रहा था कि क्षेत्र में अमरीकी सेना ईरान और उसके समर्थकों के लिए सुरक्षा तंत्र विकसित करेगी और खाड़ी सहयोगियों के लिए ढाल का काम करेगी। लेकिन ईरान-इराक युद्ध के बाद वैश्विक परिस्थितियों में जो बदलाव आया वह अब ईरान व अमरीका-इजरायल युद्ध के बाद पूरी से बदल गई। अमरीका के शक्तिशाली सैन्य संसाधनों की उपस्थिति के बावजूद तेहरान ने इजरायल और खाड़ी के दूसरे देशों पर इतिहास के सबसे बड़े मिसाइल हमलों को अंजाम दिया। इन हमलों के बाद जीसीसी देशों की मन:स्थिति में बड़ा परिवर्तन आता दिख रहा है। अब यह देश अपनी सुरक्षा के लिए केवल अमरीका पर निर्भर रहने की नीति पर पुनर्विचार कर रहे हैं। ईरानी हमलों की तीव्रता को देखने के बाद जीसीसी देशों को लगने लगा है कि अमरीकी सुरक्षा छाता उन्हें ईरानी हमलों से बचा सकने में नाकाफी है। इसलिए जीसीसी देश चीन और अन्य शक्तियों के साथ भी संबंध मजबूत करने की सोच रहे हैं। हमलों के बाद खाड़ी देशों ने अपने संयुक्त रक्षा तंत्र को सक्रिय करने का फैसला किया है। कुल मिलाकर कहें तो हर छोटे-बड़े संकट के वक्त हमेशा अमरीका की ओर देखने वाला मध्यपूर्व अब अपनी समस्याओं और सुरक्षा चिंताओं का समाधान स्वयं तैयार करने की नीति पर आगे बढ़ता हुआ दिखाई देगा।
Published on:
17 Mar 2026 01:42 pm
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