
युद्ध शुरू करना तो हाथ में होता है, समाप्त करना नहीं। इजरायल-अमरीका और ईरान के बीच पिछले 21 दिन से जारी युद्ध ने इस पुरानी कहावत को एक बार फिर कड़वी सच्चाई के रूप में स्थापित कर दिया है। यह युद्ध ऐसी डरावनी स्थिति में पहुंच चुका है जहां से इसके खत्म होने का रास्ता नजर नहीं आ रहा। अमरीका का 'स्ट्रैटेजिक कैलकुलेशन' गलत साबित हुआ है। वह सीमित सैन्य कार्रवाई से ईरान को घुटनों के बल लाना चाहता था लेकिन हुआ इसका उल्टा। न तो वह ईरान में सत्ता परिवर्तन कराने में सफल हुआ और न ही अमरीका को युद्ध के आर्थिक प्रभाव से बचाने में। हद तो तब हो गई जब होर्मुज जलडमरूमध्य को खुलवाने के लिए उन्होंने रूस और चीन जैसे धुर विरोधी देशों से मदद मांगी। यह युद्ध सिर्फ इजराइल का गुप्त उद्देश्य पूरा कर रहा है, जो ईरान को पूरी तरह बर्बाद करना चाहता था। अमरीका का घोषित उद्देश्य ईरान को परमाणु हथियार विकसित करने से रोकना था। ट्रंप खुद यह दावा कर रहे हैं कि यह उद्देश्य पूरा हो चुका है। ऐसे में उन्हें तुरंत युद्ध से बाहर निकलना चाहिए था, पर वह ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। ऐसा लगता है कि ट्रंप आस-पास मौजूद इजरायल लॉबी के समक्ष लाचार हैं।
पश्चिम एशिया में मचे इस घमासान का असर सिर्फ युद्धरत देशों तक सीमित नहीं रहा, इसने पूरी दुनिया को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले खाड़ी देश हैं जो युद्ध में शामिल भी नहीं है। संयम बरतने की उनकी अपील वाशिंगटन और तेहरान दोनों ने अनसुनी कर दी गई है। पहले होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई। फिर दुनिया के सबसे बड़े गैस फील्ड के ईरानी हिस्से 'साउथ पार्स' पर इजरायली हमले और उसके बाद कतर, सऊदी अरब, कुवैत, यूएई सहित इजरायल पर ईरानी हमले ने दुनिया को आशंकित कर दिया है। भारत में 20 फीसदी प्राकृतिक गैस की आपूर्ति सिर्फ कतर से ही होती है। आपूर्ति शृंखला टूटने और गैस-तेल आपूर्ति ठप होने की आशंका में महंगाई बढ़ रही है और यदि युद्ध लंबा खिंचा तो भारत सहित पूरी दुनिया पर इसका गहरा आर्थिक प्रभाव होगा।
ऐसा लग रहा है कि दुनिया उल्टी दिशा में दौड़ पड़ी है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की विश्व-व्यवस्थाओं ने यह भरोसा देना शुरू कर दिया था कि हम एक ही धरती के निवासी हैं और हमारे हित आपस में इस तरह जुड़े हैं कि एक-दूसरे से लड़कर कोई देश कहीं नहीं पहुंच सकता। खासकर आर्थिक भूमंडलीकरण ने इस भरोसे को और मजबूत किया था। लेकिन, पिछले कुछ समय से जैसे उल्टी गंगा बह रही है। संयुक्त राष्ट्र की कोई नहीं सुन रहा। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद अप्रासंगिक हो गई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की कार्यप्रणाली पर गहरा संदेश है और विश्व व्यापार संगठन की किसी को परवाह नहीं रही। ऐसे में दुनिया का भविष्य एक गहरी अनिश्चितता की ओर बढ़ रहा है। यह किसी के लिए ठीक नहीं है।
Published on:
22 Mar 2026 01:22 pm
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