
'जब हम महान योद्धा लचित बरफुकन की 400वी जयंती मना रहे हैं, हमें इतिहास में वापस जाना चाहिए कि कैसे लचित ने राष्ट्रवाद की लौ जलाई।'
सर्बानंद सोनोवाल
केंद्रीय पत्तन, पोत परिवहन, जलमार्ग और आयुष मंत्री
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महावीर लचित बरफुकन मां भारती के उन महान सपूतों में से एक हैं, जिन्होंने अपने पराक्रम के बल पर मुगलों से लड़ाई लड़ी। वे असम के महान सेनापति के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उनकी गाथा देशभक्ति, समर्पण और वीरता की एक ऐसी कहानी है, जिसकी बराबरी बहुत कम लोग कर सकते हैं। लचित बरफुकन ने उस समय राष्ट्रवाद का परचम लहराया, जब भारत पर विदेशी आक्रमणकारियों का शासन था।
विजयी योद्धा, उत्कृष्ट सैन्य रणनीतिकार, चतुर राजनयिक, लचित बरफुकन महान अहोम सेना के सेनापति थे। उन्होंने एक ऐसा गठबंधन बनाया, जिसने 1671 में सरायघाट की लड़ाई में मुगलों को आक्रमण को विफल कर दिया था। यही वजह रही कि मुगल कभी असम और उत्तर-पूर्व में फिर से पैर जमाने की हिम्मत तक नहीं कर सके। 24 नवंबर, 1622 को एक प्रसिद्ध प्रशासक और अहोम स्वर्गदेव (राजा) के सेनापति, मोमाई तमुली बरबरुआ के यहां पैदा हुए, लाचित कम उम्र से ही राजकीय कला, युद्ध कला और शास्त्रों में पारंगत थे। जब बंगाल के गवर्नर मीर जुमला ने असम पर आक्रमण किया, तो उसने गुवाहाटी पर कब्जा कर लिया और इसे एक फौजदार के अधीन कर दिया। स्वर्गदेव चक्रध्वज सिंघा ने गुवाहाटी शहर को वापस लेने के लिए, एक बड़ी सेना गठित की। इस सेना का नेतृत्व करने का जिम्मा लचित बरफुकन को दिया गया। इस घटना ने असम और उत्तर-पूर्व की नियति को हमेशा के लिए बदल दी। जब हम इस महान योद्धा की 400वी जयंती मना रहे हैं, हमें इतिहास में वापस जाना चाहिए कि कैसे लचित ने राष्ट्रवाद की लौ जलाई। उन्होंने अपने साहस से निराश सैनिकों को जगाया और हमारे सामने एक ऐसी गाथा प्रस्तुत की, जिससे पूरे देश को प्रेरणा मिलनी चाहिए।
लचित बरफुकन के सबसे प्रसिद्ध शब्द हैं, ‘मेरे मामा मेरे देश से बड़े नहीं हैं’। असल में उन्होंने मुगल हमले को रोकने की तैयारी के दौरान गुवाहाटी में किलेबंदी के निर्माण में सुस्त पाए गए अपने मामा का सिर कलम कर दिया था। लचित बरफुकन के शब्दों ने सैनिकों में उत्साह पैदा किया। कई साल बीत चुके हैं, लेकिन ये शब्द अब भी मातृभूमि के प्रति असमिया उद्बोधन हैं। लचित की तरह, ‘राष्ट्र प्रथम’ का आदर्श सभी राष्ट्रवादी असमियों के लिए एक जीवंत मंत्र है।
1667 में, अहोमों ने गुवाहाटी पर सफलतापूर्वक कब्जा कर लिया था और आक्रमणकारियों के साथ अपनी पुरानी सीमा स्थापित कर ली थी। इस हार के बारे में सुनकर, मुगल सम्राट औरंगजेब की सेना ने असम पर हमला कर दिया। 1669 में 40 युद्ध नौकाओं के साथ लगभग एक लाख सैनिकों की एक सेना गुवाहाटी के बाहरी इलाके में पहुंची। अगले दो वर्षों में जो हुआ वह भारत के इतिहास में अविस्मरणीय अध्यायों के रूप में दर्ज है। गुवाहाटी के पास अलाबोई में 10,000 से अधिक असमिया सैनिकों को मार दिया गया। इस घटना ने लचित बरफुकन को विचलित कर दिया और मुगलों को बाहर करने के लिए नए सिरे से दृढ़ संकल्प के साथ जगाया।
असमिया सेना ने रणनीति बदली। चतुर कूटनीति और शानदार सैन्य कौशल का प्रदर्शन करते हुए, लचित बरफुकन ने मुगलों को ब्रह्मपुत्र नदी पर एक नौसैनिक लड़ाई में खींचा, एक ऐसी लड़ाई जो असमियों के लिए निर्णायक साबित हुई। सरायघाट की लड़ाई असम और उत्तर-पूर्व के इतिहास में एक ऐतिहासिक क्षण था, क्योंकि उसके बाद मुगल भारत के इस हिस्से पर कभी दावा नहीं कर पाए। यह दुनिया की सबसे बड़ी नौसैनिक लड़ाइयों में से एक थी। लचित बरफुकन का नाम इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों में लिखा गया।
लचित बरफुकन की कहानी सैन्य पराक्रम में आत्मानिर्भरता की कहानी भी है। लचित बरफुकन ने असमिया सेना बनाने के लिए विभिन्न राज्यों के सरदारों को एक साथ मिला लिया, जो एक साथ मातृभूमि के लिए लड़े। पानी के जहाजों को स्वदेशी रूप से विकसित किया गया था। ऐसी रणनीति बनाई थी कि मुगल साम्राज्य जैसी बड़ी सेना भी पस्त हो गई।
सैन्य शक्ति में आत्मनिर्भरता का उनका प्रदर्शन वर्तमान पीढ़ी के लिए भी एक संदेश है कि दृढ़ संकल्प और कौशल के उपयोग से असंभव प्रतीत होने वाली चीज को भी प्राप्त किया जा सकता है। लचित बरफुकन अपनी सेना के बीच लंबे समय तक खड़े रहे। उन्होंने असम और उत्तर-पूर्व के लोगों के खून से राष्ट्रवाद की नींव रखी। वह इस क्षेत्र के लोगों की अत्यधिक बहादुरी, दृढ़ता और दृढ़ संकल्प का प्रतिनिधित्व करते रहे, जिसे कठिन से कठिन समय में भी नहीं तोड़ा जा सका। लचित बरफुकन के जीवन से हर भारतीय को अपनी अंतिम सांस तक मातृभूमि की सेवा करने का प्रेरणा लेनी चाहिए।
Published on:
25 Nov 2022 05:53 pm

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