व्यंग्य राही की कलम से
जब से हमारे शहर में बड़े हकीम साहब आए वे बार-बार एक ही बात सभी से कहते रहते थे- तुम सब लोग बीमार हो। तुम्हारी बीमारी बड़ी पुरानी है। हालांकि खुद हकीम साहब की उम्र सत्तर साल नहीं थी, बावजूद इसके वे एक ही बात कहते कि सारे के सारे सत्तर साल से बीमार हो। हकीम साहब की बात सुन सारा शहर आश्चर्य में पड़ गया। सोचने लगे क्या सचमुच हम बीमार हैं? क्या सचमुच सारा समाज बीमार है?
क्या सारे समाज में अस्वस्थ लोग ही बसते हैं? अगर सब बीमार हैं तो फिर समाज चल कैसे रहा है? जैसे ही उनके मन में अपनी बीमारी को लेकर कुछ ख्यालात पैदा होते, हकीम साहब कभी रेडियो पर तो कभी टीवी पर कहते नजर आते कि मर्ज बड़ा पुराना है। इसका एक मात्र इलाज है 'कैशलेस सोसायटी'यानी आपको सिर्फ अहसास होगा कि आपके पास पैसा है पर आप कभी उसे देख नहीं पाएंगे।
कुछ स्यानों के मन में विचार आया कि हकीम साहब को आए अभी जुम्मा-जुम्मा तीन साल भी नहीं हुए, पर ये तो सब कुछ जानते हैं। इन्हें लगता है कि उनके आने से पहले तक सारा देश ही बीमार था। अगर सब बीमार थे तो इतनी तरक्की कैसे कर गए? क्या सब कुछ सिर्फ तीन साल में ही बना है।
हकीम साहब भी कम नहीं। उन्होंने अपने मन की बात में चाय वाली शादी का जिक्र तो कर दिया लेकिन उनकी नाक के नीचे हुई तीन सौ करोड़ की शादी पर एक लफ्ज तक नहीं कहा बहरहाल हम हकीम साहब से निवेदन करते हैं कि सरकार! न शहर बीमार है, न देश बीमार है। बीमार हैं तो हमारे नेता। बीमार है राजनीतिक व्यवस्था! बीमार हैं पार्टियां! बीमार हैं सत्ता के दलाल। जो सत्तर साल से जोंक बन कर देश का खून चूस गए। लेकिन आपके नीम हकीमी इलाज से तो सारा देश हाय-हाय कर रहा है। इसका तो कोई उपाय करें।