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महिला आरक्षण का नया विमर्श: स्थानीय से राष्ट्रीय नेतृत्व की ओर

1990 में सिंथिया एनलो ने अपनी पुस्तक 'बनानाज, बीचेज एंड बेसिस: मेकिंग फेमिनिस्ट सेंस ऑफ इंटरनेशनल पॉलिटिक्स' में लिखा था कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति की पारंपरिक व्याख्याएं लंबे समय तक पुरुष-केंद्रित रही हैं। उनके अनुसार वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और कूटनीति जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की भूमिकाएं अक्सर अदृश्य बना दी जाती हैं, जिसके कारण सत्ता और निर्णय-निर्माण की संरचनाओं में उनकी उपस्थिति सीमित रह जाती है।

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जयपुर

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Opinion Desk

Mar 16, 2026

डॉ. ऋतु सारस्वत - समाजशास्त्री एवं स्तंभकार,

भारतीय राजनीति में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार महिला आरक्षण के प्रावधान को शीघ्र लागू करने की दिशा में पहल करती दिखाई दे रही है। हालिया चर्चाओं के अनुसार सरकार 'परिसीमन के बाद' की शर्त को हटाने के लिए संवैधानिक संशोधन पर विचार कर रही है, ताकि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को वर्ष 2029 से लागू किया जा सके। उल्लेखनीय है कि 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' के अंतर्गत संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया था, किंतु इसे जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद लागू करने की व्यवस्था की गई थी।

वर्तमान में सरकार के इस शर्त को हटाने की संभावना पर विचार किए जाने से यह प्रश्न पुन: चर्चा के केंद्र में आ गया है कि भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी क्यों महत्ती है। यदि भारत की स्थिति को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो राजनीति में महिलाओं की भागीदारी के संदर्भ में भी स्थिति बहुत संतोषजनक नहीं कही जा सकती। विश्व आर्थिक मंच की 'ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2024' के अनुसार 146 देशों में राजनीतिक सशक्तीकरण के सूचकांक में भारत का स्थान 65वां है। यह स्थिति इस तथ्य को रेखांकित करती है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के प्रयासों के बावजूद निर्णय-निर्माण की संस्थाओं में उनका प्रतिनिधित्व अब भी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाया है।

हालांकि यह स्थिति केवल भारत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि विश्व के अनेक देशों की है। राजनीति में महिलाओं की सीमित उपस्थिति केवल अवसरों की कमी का परिणाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहराई से निहित सामाजिक और संरचनात्मक कारण भी कार्य करते हैं। 1990 में सिंथिया एनलो ने अपनी पुस्तक 'बनानाज, बीचेज एंड बेसिस: मेकिंग फेमिनिस्ट सेंस ऑफ इंटरनेशनल पॉलिटिक्स' में लिखा था कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति की पारंपरिक व्याख्याएं लंबे समय तक पुरुष-केंद्रित रही हैं। उनके अनुसार वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और कूटनीति जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की भूमिकाएं अक्सर अदृश्य बना दी जाती हैं, जिसके कारण सत्ता और निर्णय-निर्माण की संरचनाओं में उनकी उपस्थिति सीमित रह जाती है।

भारत में पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए न्यूनतम 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया है, जिसे अनेक राज्यों में बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक कर दिया गया है। स्थानीय शासन की इन संस्थाओं में सक्रिय भागीदारी के माध्यम से महिलाओं ने न सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रियाओं को समझा है, बल्कि विकास से जुड़े अनेक मुद्दों पर नेतृत्वकारी भूमिका भी निभाई है। स्थानीय शासन के अनुभव यह स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि यदि महिलाओं को संस्थागत अवसर प्रदान किए जाएं तो वे नेतृत्वकारी भूमिकाओं में अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज करा सकती हैं। विश्व के अनेक देशों के अनुभव यह स्पष्ट करते हैं कि महिलाओं के लिए आरक्षण अथवा जेंडर कोटा लागू करने से राजनीतिक प्रतिनिधित्व में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है। रवांडा में संविधान में महिलाओं के लिए न्यूनतम 30 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किए जाने के बाद संसद में उनकी भागीदारी 60 प्रतिशत से अधिक तक पहुंच गई।

इसी प्रकार फ्रांस में 'पैरिटी कानून' के माध्यम से राजनीतिक दलों को चुनावों में पुरुषों और महिलाओं को लगभग समान संख्या में उम्मीदवार बनाने के लिए बाध्य किया गया है, जिसके परिणामस्वरूप वहां की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी में वृद्धि हुई है। जब राजनीतिक संरचनाओं में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए संस्थागत उपाय किए जाते हैं, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की प्रकृति और निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया अधिक समावेशी बनती है। ऐसे में भारत में महिलाओं के लिए आरक्षण का प्रावधान किए जाने के बाद यदि इसे परिसीमन की प्रक्रिया की प्रतीक्षा किए बिना शीघ्र लागू करने की दिशा में पहल की जाती है और आगामी आम चुनावों में ही इसका क्रियान्वयन संभव हो पाता है, तो इसका प्रभाव महिलाओं की भागीदारी को सुदृढ़ करने के रूप में व्यापक और सकारात्मक रूप में दिखाई दे सकता है।