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बच्चों को ओलंपिक जरूर दिखाएं

ओलंपिक खेलों में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी देते हैं प्रेरणा और सपनों को आकार। ओलंपिक हमें सिखाते हैं कि कैसे इंसानी क्षमताओं से आगे जाकर कुछ बड़ा हासिल किया जा सकता है।

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बच्चों को ओलंपिक जरूर दिखाएं

बच्चों को ओलंपिक जरूर दिखाएं

सिद्धार्थ कोठारी (टोक्यो से ओलंपिक स्पेशल)

ओलंपिक सिर्फ खेल का मैदान नहीं है। यहां हमारे सपनों की उड़ान भी है। विभिन्न स्पर्धाओं में प्रदर्शन करने वाले दुनिया के सर्वश्रष्ठ खिलाड़ी यहां जुटते हैं। वर्ल्ड क्लास खिलाड़ी बनना ही इनकी महत्वाकांक्षा होती है। ये सब हमें जीवन में आगेबढऩे की प्रेरणा देते हैं। जरा अपने आसपास नजर घुमाकर देखिए। हममें से कितने लोग हैं जो अपने-अपने कार्यक्षेत्र या प्रोफेशन में दुनिया में सर्वश्रेष्ठ बनने की सोचते हैं। ओलंपिक आपके जीवन की दिशा बदल सकते हैं। यहां आने वाले खिलाडिय़ों की सोच में रचा बसा है कि मेरा प्रदर्शन ही दुनिया के लिए सर्वश्रेष्ठ का उदाहरण बने।

ओलंपिक ने हमें अवसर दिया है कि इस सोच को हकीकत में बदलने वालों को देखें, उनके बारे में जानें, उनके संघर्ष और सफलता को महसूस करें। वेटलिफ्टर मीराबाई चानू साधारण परिवार से हैं। पिता सरकारी संविदाकर्मी रहे। मां फेरी लगाती थीं। लेकिन ओलंपिक ने ही हमें चानू दी हैं। ओलंपिक में वेटलिफ्टर कुंजरानी देवी को देखकर ही चानू इस खेल से जुड़ीं। परिवार का खेलों से दूर-दूर तक नाता नहीं।

संसाधनों का अभाव झेला लेकिन सोच के साथ सफर शुरू किया। मुकाम आज सामने है। रियो ओलंपिक में कुश्ती में कांस्य पदक विजेता साक्षी मलिक के पिता बस कंडक्टर थे। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम कितने समृद्ध परिवेश से हैं पर बच्चों को अभी से बताना पड़ेगा कि वे अपने सपने कैसे बुनें। बच्चों के लिए यह देखना भी जरूरी है कि दुनिया में बेस्ट क्या होता है, बेस्ट करने के लिए क्या करना होता है, वल्र्ड लेवल पर क्या व कैसे उपलब्धि हासिल की जाती हैं।

विभिन्न रिसर्च और मतों के अनुसार बच्चों के लिए 12 वर्ष की उम्र जीवन की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होती है। खेलों में तो इससे भी पहले कदम बढ़ाने होते हैं। और सिर्फ बात खेलों की नहीं है। खेलों में रुचि नहीं है तो भी ओलंपिक देखिए, आपको अपने पसंदीदा क्षेत्र में भी आगे बढऩे की प्रेरणा मिलेगी। इसके लिए कोई अतिरिक्त पैसा भी नहीं लग रहा है। घर पर टीवी और अखबार से इतना कुछ जानने को मिल रहा है। कोई भी रणनीति तभी कारगर होगी जब आप पहले लक्ष्य सोचेंगे। माता-पिता की भूमिका भी अहम है।

ओलंपिक सिखाते हैं कि कैसे इंसानी क्षमताओं से आगे जाकर कुछ बड़ा हासिल किया जा सकता है। अपनी प्रतिभा के साथ कैसे एक व्यक्ति क्षमताओं को बढ़ाकर कुछ पा सकता है। ये खिलाड़ी हर दिन इंसानी क्षमता का दायरा बढ़ाने की जंग जीत रहे हैं। क्या कभी हमने सोचा था कि 9.58 सेकेंड में 100 मीटर की दौड़ पूरी की जा सकती है। यह संभव हुआ सही प्रशिक्षण, माइंड ट्रेनिंग और शरीर का दमखम बढ़ाने वाले पौष्टिक खानपान से। हमें एक-एक सेकेंड के लिए इंसानी क्षमता बढ़ाने की खूबी समझनी होगी। जीवन में सफलता का आधार बड़ी सोच भी है। जबतक हम बड़ा नहीं सोचेंगे तो हासिल कैसे करेंगे? अमरीका का सेन फ्रांसिस्को टेक की दिग्गज कंपनियों का बड़ा केंद्र है। यहां युवा स्टार्टअप्स की जमीन तैयार होती है। सोच है कि यहां चला तो अमरीका में भी अच्छा चलेगा और फिर दुनिया फतह। क्या हम राज्यों की प्रतिभाओं को कोई ऐसी जमीन दे सकते हैं? क्यों न प्रादेशिक स्तर पर विश्व स्तरीय केंद्र आकार लें। ओलंपिक में आपको इसका जवाब भी मिलेगा। अभी मौका है। बच्चों को ओलंपिक दिखाइए। उनकी सोच को सपने से जोडऩे की तरफ कदम बढ़ाने का इससे बेहतर अवसर नहीं मिलेगा।

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