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सख्त सजा से ही लगेगी भ्रष्टाचारियों पर लगेगी नकेल

भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) लगातार कार्रवाई कर भ्रष्ट अफसरों व कार्मिकों को दबोच रही है। इस साल के नौ माह की बात ही करें तो अब तक 380 जनों को रिश्वत लेते गिरफ्तार किया गया है।

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भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) लगातार कार्रवाई कर भ्रष्ट अफसरों व कार्मिकों को दबोच रही है। इस साल के नौ माह की बात ही करें तो अब तक 380 जनों को रिश्वत लेते गिरफ्तार किया गया है। साल भर का औसत गिनें तो औसतन रोज एक से भी ज्यादा। रोजाना हो रही एसीबी की कार्रवाई के बावजूद बड़ा सवाल यही है कि आखिर भ्रष्ट तंत्र में खौफ क्यों नहीं हो रहा?

एसीबी से ट्रेप होने के बावजूद भ्रष्ट तंत्र में सजा का डर क्यों खत्म होता जा रहा है? इसका सीधा सा जवाब है कि ऐसे लोगों को लगता है कि रिश्वत लेते पकड़े भी जाएंगे तो कानून की गलियों में उनको बचाव का रास्ता मिल ही जाएगा। और, मिलता भी है। कहीं जांच प्रक्रिया में ढिलाई तो कहीं ट्रेप प्रक्रिया ही दोषपूर्ण रहती है।

यही वजह है कि रिश्वतखोर कुछ दिनों बाद कानून के ढीले शिकंजे से छूट जाते हैं और फिर भ्रष्टाचार की गंगा में डुबकी लगाने लगते हैं। दरअसल तमाम छोटी-बड़ी कार्रवाईयों के बीच एसीबी आमजन में व्याप्त इस धारणा को बदलने में विफल रही है कि सरकारी महकमों में बिना लिए-दिए कुछ काम होता ही नहीं। चाहे काम छोटा हो या बड़ा। बिना दान-दक्षिणा फाइल आगे सरकती ही नहीं।

इन दिनों चल रहे तबादलों के दौर में तो सरकारी कार्मिकों के साथ-साथ जनप्रतिनिधि भी चांदी कूटने में लगे हैं। ‘समरथ को नहीं दोष गोसाईं। इन पर हाथ भला कौन डाले? और, जो तबादलों के लिए रिश्वत दे भी रहा है उसे भी अपना काम होने से मतलब है। पिछले सालों के उदाहरण देखें तो ऐसे कई मामले सामने आए जिसमें लगता था एसीबी मामले में आखिरी कड़ी तक पहुंचेगी और बड़ा खुलासा करेगी। लेकिन लोगों को निराशा ही हाथ लगी।

हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि एसीबी का दायरा सीमित है। सरकारी अफसरों के मामले में तो कार्रवाई के बाद आरोपी के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति के लिए पत्रावली सरकार के पास लम्बे समय तक पड़ी रहती है। अभियोजन स्वीकृति नहीं मिलने से भ्रष्टाचार के आरोपी के खिलाफ मामला दाखिल दफ्तर हो जाता है।

इसलिए ऐसे मामले कम होने के बजाय बढ़ ही रहे हैं। भ्रष्टाचार के मामले में ‘जीरो टालरेंस’ की नीति का ढिंढोरा पीटना ही काफी नहीं। बिना भेदभाव के भ्रष्टाचार के मामलों में सख्त कार्रवाई होनी ही चाहिए। अन्यथा हर बार एसीबी अपनी उपलब्धियां गिनाएंगी और भ्रष्ट तंत्र अपनी।

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