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शरीर ही ब्रह्माण्ड: प्रारब्ध भोग में सहायक माया

परा प्रकृति जीवन की सारी गतिविधियों का केन्द्र है। स्त्री के जीवात्मा में पितर अंश और वर्ण नहीं होते। ब्रह्मांश भी नहीं होता। ये सब तो ब्रह्मांश (बीज) से जुड़े होते हैं। दोनों के जीवात्मा प्रारब्ध कर्मों का भोग यहां साथ करते हैं।

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जयपुर

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Gulab Kothari

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गुलाब कोठारी

Apr 04, 2026

Sharir Hi Brahmand

फोटो: पत्रिका

माया एक बल है जो रस के साथ एकाकार होकर रहता है। रस ब्रह्म को कहा है और बल माया रूप है। माया सातों लोकों और चौदह भुवन में समान रूप से कार्य करती है। पृथ्वी के ऊपर स्थूल सृष्टि नहीं है। अत: उसकी चर्चा, उसके व्यवहारगत स्वरूप की अभिव्यक्ति भी पृथ्वी के संदर्भ में ही होती है। यहां भी स्पष्ट अभिव्यक्ति चूंकि मानव योनि में ही होती है, अत: माया को स्त्री के रूप में (स्त्रैण भाव) अधिक ही प्रस्तुत किया जाता है। ग्रन्थों ने माया के जिस रूप को सामने रखा है, शिक्षा ने उस पर तो पानी फेर दिया। स्त्री का एक स्वरूप पत्नी का है। दूसरा रूप साध्वी का है। इन दोनों को भारतीय दर्शन ने पूजनीय माना है। शेष रूप परिस्थितियों का प्रभाव ही है।


पत्नी पुरुष की शक्ति होती है। प्रत्येक वस्तु की शक्ति उसी के भीतर निहित होती है, किन्तु मानव और देव की शक्ति उनकी पत्नी में रहती है। पुरुष भीतर स्त्री ही है, सोम है। निराकार है अत: शक्तिहीन है। स्त्री भीतर पुरुष है, साकार-आग्नेय स्वरूप है। वही सृष्टि को चलाती है। अत: समाज को पुरुष प्रधान कहना गलती नहीं है। दृष्टि भेद कह सकते हैं। वैसे तो दोनों के शरीर एक ही 'मां’ के पेट से निर्मित होते हैं। मां धरती माता का ही परिवर्तित पंचभौतिक शरीर होता है। सृष्टि के सभी शरीर धरती से उत्पन्न अन्न से ही बनते हैं। उसी अन्न में ब्रह्म का अंश भी प्रवाहित रहता है, जो पुरुष (बीजी) शरीर का निर्माण करता है। अर्थात सम्पूर्ण विश्व का एक ही पिता है और एक ही माता। पृथ्वी के आगे सूक्ष्म शरीर होते हैं।


महर्षि वेद व्यास ने लिखा है कि एक पुरुष को एक स्त्री के लिये ही नहीं बनाया। इस तथ्य का आधार पंचाग्नि का सिद्धान्त ही है, जहां एक ब्रह्म के लिए पांच माताएं उपलब्ध होती हैं। पांचवीं माता स्थूल स्त्री रूप होती है। माया ही अव्यक्त भाव से सूक्ष्म होती हुई स्थूल रूप लेती है। स्त्री देह में तीनों स्वरूप समाहित रहते हैं। प्रकृति में स्त्री जैसा कोई तत्त्व है ही नहीं, केवल ब्रह्म है। जो उसे आवरित करके लोक विशेष की आकृति प्रदान कर दे, वही माया (स्त्री) कहलाती है। इसीलिए प्रत्येक लोक में और प्रत्येक योनि में स्त्री का रूप बदल जाता है। यह रूप एक योनि की आयु तक रहता है। योनि बदलते ही आकृति (देह) बदल जाती है। पंच महाभूत से निर्मित देह (अस्थायी) पंचमहाभूत में मिल जाती है। ब्रह्म नहीं बदलता। पृथ्वी ही स्थूल देह का उपादान कारण है।
स्थूल देह चूंकि पंचमहाभूत से बनती है, स्त्री-पुरुष दोनों की समान रूप से बनती है, प्रत्येक योनि में बनती है, अत: यह क्षरणशील है। इसका समय के साथ क्षरण होता है और अन्त में विलीन हो जाती है। यह अपरा प्रकृति है। इस दृष्टि से पुरुष शरीर भी स्त्री भाव की भांति अस्थायी है—स्त्रैण है। नाम उसका उस देह में पुरुष है क्योंकि वह बीजी है। पुरुष देह के साथ उसके बीज भी नष्ट हो जाते हैं।


अक्षर सृष्टि भी अस्थायी होती है। यह प्राणमय कोश होता है। यह जीवात्मा का आश्रय है। जीवात्मा है तब तक आश्रय है। स्थूल देह की आयुपर्यन्त यह भी कारण शरीर के साथ देह में (पंचकोश रूप) कार्य करता है (निमित्त)। कारण शरीर ब्रह्म का मूल संचालक है। परा प्रकृति रूप अधिकारी ही जीवात्मा का नियन्ता है। परा प्रकृति में जीवात्मा का हृदय होता है- ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र अक्षरों (प्राण रूप) में जो अग्नि-सोम से युक्त होकर अक्षर संस्था का संचालन करता है। अक्षर देह में क्रिया नहीं होती। ये तो अव्यय के नेतृत्व में कार्य करते हैं।


अक्षर पुरुष दिव्य शरीर होता है। आत्मा भी ब्रह्मांश होने से दिव्य होता है, अत: आधिदैविक कहलाता है। प्राण सदा मन का अनुसरण करता है। मन अव्यय में रहता है। यह ईश्वरीय मन होता है जहां प्रारब्ध से जुड़ी इच्छाएं पैदा होती हैं। प्राकृतिक गतिविधियां होती हैं। माया इन गतिविधियों-घटनाओं की रूपरेखा बहुत पहले ही तैयार कर लेती है ताकि अपरा प्रकृति के मन-बुद्धि-शरीर समय आने पर तैयार रहें। इसका अनुभव घटना हो जाने के बाद में होता है कि पहले 'ऐसा’ क्यों हुआ था। यह माया की कर्म-रूप भूमिका होती है। अव्यय तो आलम्बन है।


जीवन तो अक्षर पुरुष चलाता है। परा प्रकृति एक ओर अव्यय के निर्देशन में कार्य करती है। दूसरी ओर इन्द्रिय मार्ग से आने वाली कामनाएं भी इसे उद्वेलित करती रहती हैं। ये जीव की नई कामनाएं होती हैं। अव्यय पुरुष की कामनाएं संचित कर्मों का क्षय करती हैं। क्षर पुरुष की कामनाएं नए कर्म संचित करती हैं। पत्नी प्रारब्ध कर्म भोगने में सहायक होती है। देवरति में प्रवृत्त करके मोक्ष मार्ग के लिए प्रेरित करती है। अन्य स्त्री दाम्पत्य रति के साथ अधोगति की ओर प्रेरित करती है। अविद्या के मार्ग पर धकेलती है।

जीवात्मा के कर्म भाव ही नयी योनियों का मार्ग निर्मित करते हैं। केवल प्रारब्ध कर्म करने पर नए कर्म नहीं बनते। अत: जीव पुन: शेष संचित कर्म भोगता है। नए कर्म यदि संचित में जुड़ते जाते हैं तो नई योनियों के मार्ग प्रशस्त होते जाते हैं। मोक्ष मार्ग अवरुद्ध होता जाता है। परा प्रकृति हृदय संस्था के रूप में तीनों अक्षर प्राणों की शक्तियों (सत्व-रज-तम) के आवरण में कर्म करती है। यहां ब्रह्मा प्राण के केन्द्र में ही ब्रह्म की प्रतिष्ठा है। तीनों देवियां आध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक जीवन का संचालन करती हैं। कृष्ण इन्हीं को महामाया-योगमाया कहते हैं
नाहं प्रकाश: सर्वस्य योगमायासमावृत:। (गीता 7/25)


पत्नी का कार्यक्षेत्र यही परा प्रकृति या जीवात्मा का क्षेत्र है। पत्नी का आत्मा जीवात्मा के साथ जीने के लिए आकर यहां जुड़ता है। शरीर कर्म का माध्यम है, आधार नहीं है। पुरुष के शुक्र में सात पीढिय़ों के अंश (पितर) रहते हैं। उसका एक वर्ण होता है। आश्रम व्यवस्था रहती है। स्त्रैण आत्मा इन सभी से जुड़ जाता है।


परा प्रकृति जीवन की सारी गतिविधियों का केन्द्र है। स्त्री के जीवात्मा में पितर अंश और वर्ण नहीं होते। ब्रह्मांश भी नहीं होता। ये सब तो ब्रह्मांश (बीज) से जुड़े होते हैं। दोनों के जीवात्मा प्रारब्ध कर्मों का भोग यहां साथ करते हैं। दोनों की कामनाएं प्रारब्ध अनुसार यहां उठती हैं और ऋणानुबन्ध के अनुसार व्यवहार करते हैं। शरीर दोनों के भिन्न-भिन्न हैं, किन्तु पूर्व संस्कार तो पुरुष के अव्यय में ही रहते हैं। सात पीढिय़ों का साथ होता है। क्षर शरीर के नए कर्म फिर भी दोनों के भिन्न रहते हैं।


चूंकि स्त्री पति के साथ परा में रहती है, उसके सभी पत्नी रूप के कर्म (पति को लक्षित) उसके जीवात्मा के माध्यम से पति के जीवात्मा का पोषण भी करते हैं। वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम के कर्म, देवरति के कर्म, निवृत्ति भाव के कर्म, दान-भक्ति आदि सभी कर्म पुरुष आत्मा को पुष्ट करते हुए उसके जीवात्मा का भी परिष्कार करते हैं। उसके शरीर के व्रत-तप आदि भी इन्द्रिय निग्रह करते हुए नए कर्मों के प्रति संयम का अभ्यास करती है। परा-अपरा प्रकृति के नए-पुराने कर्मों का अनुपात ही जीवात्मा का भाग्य निर्माण करता है। वैसा ही संदेश अव्यय के संचित को परावर्धित करता है। उसी में से नई योनियों और नए प्रारब्ध का मानचित्र तैयार होता है।

क्रमश: gulabkothari@epatrika.com