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राजस्थान वीरों की भरा है। वीर, अन्य प्रजा की रक्षा के लिए ही जीता है। वीर शब्द के कई अर्थ है-पराक्रमी, शुरवीर, सामर्थवान, दृढ़, ऊर्जित, साहसी, शक्तिमान, क्षमतावान, कान्ति, बलवान आदि।

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राजस्थान वीरों की भरा है। वीर, अन्य प्रजा की रक्षा के लिए ही जीता है। वीर शब्द के कई अर्थ है-पराक्रमी, शुरवीर, सामर्थवान, दृढ़, ऊर्जित, साहसी, शक्तिमान, क्षमतावान, कान्ति, बलवान आदि। सभी अर्थ एक ही दिशा को इंगित करते हैं। हम सबको मिलकर इस घरा की रक्षा करनी है। कलियुग ये चारों और आसुरी प्रकोप रहता है। हर चेहरे पर कोई मुखौटा (मुंह खोटा) दिखाई पड़ता है। हमें भी इसी दौर में जीना है। विवेक के सहारे हम इस स्थिति को अपने पक्ष में बदल सकते हैं। यह विवेक, मतदान में हमारे साथ बना रहे-आज ईश्वर से यही प्रार्थना है। एक मंत्र याद रहे-ईश्वर/अल्लाह तेरो नाम, सबको सन्मति दे भगवाना !

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आज हमारे लिए भविष्य निर्माण का दिन है। भविष्य युवाओं के हाथ में है। हम सब युवाओं के उज्ज्वल भविष्य के लिए मतदान करते हैं। किसी जाति-धर्म-सम्प्रदाय के नाम पर मतदान तो विनाश का मार्ग है। कायरों का मार्ग है, वीरों का नहीं।

कहने को यह चुनाव दो दलों में से एक को चुनने के लिए हो रहा है। पिछले चुनाव तक ऐसा ही था। परिणाम तो इस बार भी इन दो में से ही आएंगे, किन्तु इनमें शकुनि की धूर्तता भी छिपी हुई नजर आएगी। दोनों दलों के नेताओं ने निर्देलियों के रूप में अपने-अपने पासे फेंके हैं। हाईकमान की आंखों में धूल झोंकने और आंखें दिखाने के प्रयास भी आप देख सकते हैं। उम्मीदवारों में अपराधियों के जाने- माने चेहरे-जिनमें हत्या बलात्कार व लूट के आरोपी एवं अय्याश तक भी दिखाई देंगे। इसका अर्थ तो यह लगता है कि इस बार चुनाव की दिसा बागी और निर्दलीय तय करेंगे। मुख्य दल पर्दे के पीछे होंगे। इनकी संख्या पहली बार इतनी बड़ी है, जो दलों की कमजोरी और स्वार्थपरता की गणित को ही प्रकट करती है। पार्टी से शक्ति अर्जित करके पार्टी को ही चुनौती देने वाले भस्मासुर बन गए है। यानी कि 'आलाकमान मेरी जूती'। न दे टिकट, मुझे तो लड़ना है। चर्चा यहां तक होने लगी है कि दोनों दलों के प्रांतीय नेता एक ही सपना देख रहे है कि उनके दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिले। तभी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण दिखाई देगी। वरना उनको कौन पूछेगा। अतः इनके पासे भी चौसर में दिख जाएंगे।

दूसरा बड़ा दृश्य इस चुनाव का यह भी है कि तीनों हिन्दी राज्यों में कांग्रेस के मुखिया का चेहरा है, वहीं भाजपा में केवल कमल और मोदी का नाम ही चेहरा है। एक बड़े परिवर्तन की सूचना है। कांग्रेस जहां जातीय समीकरण की ओर देश को पीछे ले जाने की बात दोहरा रही है, वहीं भाजपा चुनाव को राष्ट्रव्यापी रूप में-दो दलों के मध्य- सामने रख रही है। जबकि चुनाव का आधार तो दल की नीतियां होनी चाहिए, व्यक्ति की तो सामर्थ्य देखी जाती है। व्यक्ति ही सामन्ती अवशेष है, जो लोकतंत्र की अवधारणा को पुनः मिटा देना चाहता है। इसमें एक राष्ट्र की अवधारणा कहीं दिखाई ही नहीं देती। हम हर राज्य में यदि अलग व्यक्ति को देखकर मतदान करते हैं, तो मुख्य दल ही गौण हो जाता है। इसका प्रभाव यह हुआ कि जो चुनाव दो दलों के मध्य राज्य विधानसभा के लिए होना था, वह केन्द्र की भाजपा और राज्य कांग्रेस के मध्य आकर ठहर गया।

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लोकतंत्र की नई आकृति

एक ओर प्रधानमंत्री तथा दूसरी ओर प्रदेशों के मुख्यमंत्री रह गए है। इस रस्साकसी में दोनों ही दलों के राज्य के शीर्ष नेता भी सभी जगह प्रचार से ओझल हो गए। एक ओर दिल्ली, दूसरी ओर मतदाता और उम्मीदवार। लोकतंत्र की नई आकृति।

इस चुनाव का तीसरा खतरनाक पहलू यह है कि यदि मुख्य दल बहुमत नहीं लाते, बागी तय करते हैं तब खरीद-फरोख्त का बाजार गर्म होगा। लोकतंत्र सड़कों पर निर्वस्त्र हो जाएगा। दलों को आंखें दिखाने वाले ही दलों पर भारी पडेंगे और जनता पर भी। कोई धन मांगेगा, कोई मंत्री पद। लुटेरे ही राज करेंगे। विकास ही हास में बदल जाएगा। मुफ्त की रेवड़ियों ने मतदाता को पहले ही 'लेने वाला' बना दिया। तब 'दाता' कहां रह गया?

यह सारा मायाजाल आज सिमट जाना चाहिए। राजस्थान का इसी में है। हमारा युवा जागरुक है। कृष्ण की गीता को याद करें-
'क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ।' (गीता 2/3)

हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर मतदान कर-हे युवा! देश का निर्माण कर। वही तेरा भविष्य भी है। ईश्वर-जो भीतर बैठा है-को साक्षी मानकर बटन दबाना है-विवेकपूर्वक! शुभम!

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