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PATRIKA OPINION : स्वरों का महल खड़ा कर देते थे मलिक

दरभंगा-अमता घराने की विरासत संजोते उसे निरंतर समृद्ध करने वाले थे पंडित रामकुमार मलिक

जयपुरJun 16, 2024 / 03:35 pm

विकास माथुर

ध्रुवपद के दरभंगा, अमता घराने के पंडित रामकुमार मलिक का निधन ध्रुवपद के एक युग का अवसान है। वह जितने सरल थे, उतना ही उनका गान मधुर-सहज था। उनकी लूंठी लयकारी, धैर्यपूर्ण आलाप और फिर उसका विरल विस्तार सुनते मन नहीं भरता। पिता और गुरु पंडित विदुर मलिक से जो कुछ उन्होंने सीखा, उसमें अपने तईं बढ़त करते उन्होंने ध्रुवपद की विरासत को निरंतर समृद्ध—संपन्न किया। बहुत पहले समित मलिक के साथ गाई उनकी बंदिश ‘त्रिवेणी, कालिंदी, सरस्वती…’ सुनी थी। स्वरों की जैसे यह छलकती गगरी लगी। प्रयाग में त्रिवेणी को जीवंत करती।
विद्यापति के पदों में निहित शृंगार ही नहीं दर्शन को भी जिस तरह से गान में उन्होंने जिया, वह अंदर तक मन को मथता है। ध्रुवपद के दरभंगा घराने के संस्थापक पंडित राधाकृष्ण और पंडित कर्ताराम रहे हैं। तानसेन के उत्तराधिकारियों में से एक भूपत खां से उन्होंने ध्रुवपद सीखा। रोचक वाकया है, दरभंगा क्षेत्र में कभी भयंकर अकाल पड़ा था। लोगों ने सुना था कि ये दोनों भाई मेघ-मल्हार गाते हैं तो वर्षा होती है। दरभंगा नरेश से इनको गवाने की गुहार की गई। दोनों भाइयों ने गाना शुरू किया। घन गरजे और बरसने लगे। तीन घंटे तक लगातार बारिश होती रही। इतना जल बरसा कि पूरा क्षेत्र जलमग्न हो गया।
तत्कालीन दरभंगा नरेश महाराज माधव सिंह ने इससे प्रभावित होकर दोनों भाइयों को अमता ग्राम सहित कई सौ एकड़ जमीन पुरस्कार स्वरूप दी। ब्राह्मण जमीन के मालिक बने। कालान्तर में मालिक शब्द मलिक बन गया। अमता गांव संगीत का बड़ा घराना हो गया। पंडित रामकुमार मलिक इसी घराने की बारहवीं पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करते थे। विद्यापति माने ज्ञान के अधिपति। उन्होंने जो लिखा, शब्द में घुला संगीत ही तो है! विद्यापति के कुछ पदों को जिस तरह से पंडित रामकुमार मलिक ने गाया है, उन्हें सुनेंगे तो लगेगा शास्त्र और लोक में गूंथी गान की मौलिक दृष्टि वहां है। एक पद है, ‘बिगलित चिकुर मिलित मुखमंडल..’। जैसे स्वरों की बढ़त में दृश्य की मनोहरी छटाएं यहां हंै। विद्यापति ने क्या तो खूब लिखा है और पंडित रामकुमार मलिक ने उसे वैसे ही गान में जिया है।
पद का अर्थ है, दो मुख-मंडल परस्पर सट गए हैं। शशि को घनमाला ने घेर लिया। कानों के जड़ाऊ कुंडल हिलने लगे, तिलक पसीने में बह गया! सुंदरी, तुम्हारा मुख मंगलकारी है। किंकिणियां बज रही हैं किन-किन, किन-किन… कंगन बज रहे हैं कन-कन, कन-कन… घन बज रहे हैं नूपुर। रति-रण में कामदेव ने अपनी हार मान ली है। इन शब्दों में निहित अर्थ खोलते पंडित रामकुमार मलिक अपने गान में होले—होले शृंगार रस के अपूर्व से जैसे साक्षात् कराते हैं। ऐसे ही राग ललित और भैरव में ‘नारायण हरि तुम…’ सुनेंगे तो लगेगा जैसे बहुत जतन से वह स्वरों का महल खड़ा करते हैं। खंडार वाणी और गौहर वाणी के संयोजन में पंडित रामकुमार मलिक ने स्वरों का सौंदर्य रचा है। राग भीम पलासी में ‘शंभु हर गंगाधर…’ में शिव के महादेवत्व को जैसे हम पा लेते हैं तो ‘ओम, हरि ओम अनंत हरि ओम’ का उनका आलाप भी मन में घर करता है।
स्वर-शुद्धता के अन्त: उजास में माधुर्य की सहजता को अनुभव करना हो तो पंडित रामकुमार मलिक को सुनें। मन करेगा, गुनें और बस गुनते ही रहें। उनका निधन स्वर को रंजक और श्रुति मधुर बनाते भावों की गहराई वाले दरभंगा-अमता घराने की ध्रुवपद संगीत-दृष्टि की अपूरणीय क्षति है।
— डॉ. राजेश कुमार व्यास

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