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ध्वनि को शुद्ध, पवित्र और सात्विक रखने पर हो ध्यान, ‘ध्वनि हमारी माता’ पर प्रतिक्रियाएं

ध्वनि को माता के समकक्ष बताकर इसके महत्त्व को रेखांकित करते तथा इसे बेहतर रूप में रखने की सलाह देते पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी की आलेखमाला ‘शरीर ही ब्रह्मांड’ के आलेख ‘ध्वनि हमारी माता’ को प्रबुद्ध पाठकों ने स्पंदित करने वाला बताया है।

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ध्वनि को माता के समकक्ष बताकर इसके महत्त्व को रेखांकित करते तथा इसे बेहतर रूप में रखने की सलाह देते पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी की आलेखमाला ‘शरीर ही ब्रह्मांड’ के आलेख ‘ध्वनि हमारी माता’ को प्रबुद्ध पाठकों ने स्पंदित करने वाला बताया है। उन्होंने कहा है कि लेख ध्वनि की शुद्धता, सात्विकता और पवित्रता का संदेश देने वाला है। पाठकों की प्रतिक्रियाएं विस्तार से

‘ध्वनि हमारी माता’ लेख के माध्यम से आलेख में ध्वनि के प्रभाव और उसकी उपयोगिता को दर्शाया है। ध्वनि निश्चित ही सभी पर अपना प्रभाव डालती है। यदि हम तामसिक ध्वनि निकालेंगे तो इसका प्रभाव सबसे पहले हमारे शरीर पर उग्रता के तौर पर सामने आएगा। क्रोध के दौरान निकलने वाली ध्वनि दूसरों के लिए इसी प्रवृत्ति के साथ आगे बढ़ती है, जबकि तप और जप के तौर पर निकलने वाली ध्वनि का प्रभाव सकारात्मक तौर पर नजर आता है। मंत्र-जाप और आराधना के दौरान निकलने वाली ध्वनि से शरीर में नई उर्जा के संचलन का अहसास होता है। क्रोध और आवेश में निकलने वाली ध्वनि कर्कश होती है, जो वैचारिक तौर पर रोगग्रस्त करती है।
डॉ. माया इंगले, प्राध्यापक देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर

विज्ञान में आज जिसे मैटर-एनर्जी कहा जाता है। इस सिद्धांत की व्याख्या भारतीय मनीषियों ने बहुत पहले कर दी थी। आवश्यकता उसे समझने की है। उसी सिद्धांत व तत्व का वर्णन आलेख ध्वनि हमारी माता में किया गया है। ब्रह्मांड को एक परिवार बताते हुए वसुधैव कुटुम्बकम् के रूप को बताया गया है। जिसकी पालना विश्व के परिदृश्य को बदल सकती है।
माधव गोपाल, पाली

ध्वनि हमारी माता आलेख में ध्वनि की गति के साथ उसके प्रभाव का विस्तृत वर्णन है। मंत्र जाप को हमारी संस्कृति में महत्व दिया गया है। उसमे असंभव को संभव बनाने की श?क्ति बताई गई है। यह ध्वनि का ही प्रभाव है। ध्वनि से मन शान्त, एकाग्र एवं ऊर्ध्वगामी होने को तैयार होता है।
प्रत्यक्षा व्यास, पाली

यह सही है कि ध्वनि तरंगों को कोई भी बाधा रोकने के असमर्थ है। यहां तक की ध्वनि चारों महाभूतों को पूर्णतया प्रभावित करती है। इसका आधार प्राण स्पन्दन और मन के भाव है। जहां से कामना, भावना और वासना का रूप तय होना तर्कसंगत है। - राकेश भाटी, श्रीगंगानगर।

शास्त्रों के अलावा वैज्ञानिक रूप से भी मंत्र जाप एक पवित्र ध्वनि है, जो मनुष्य के मन, कर्म और श्वास सबको निर्मल रूप से परिष्कृत करती है। आलेख में स्पष्ट है कि आमतौर पर हमारे शरीर में उठने वाली ध्वनियां ही जीवन को नियमित करती है, जिसमें हल्की भाषा तक सम्मिलित हैं।
- उर्मिला, श्रीगंगानगर।

- ध्वनि हमारी माता आलेख में बहुत ही वैज्ञानिक तरीके से जन लोक को विद्युत लोक की संज्ञा दी है। आलेख का अध्ययन करने से कई तरह की भ्रांतियां दूर होती है और नया ज्ञान प्राप्त होता है।
- मोहन लाल, हनुमानगढ़ जंक्शन

- आलेख में सुंदर बात कही कि प्राणों की दिशा बदलना केवल मन के हाथ में है, वह इसलिए कि प्राण केवल मन का ही अनुसरण करते हैं, किन्तु मन तो स्वयं बहुत चंचल है, इसलिए भटकता और अटकता रहता है। जब मन साध लिया जाएगा तो मन भी प्राणों को सही दिशा देगा। नि:संदेह बड़े ही रोचक ढंग से जीवन का सार आलेखों में मिलता है।
- मनोज कुमार शर्मा, हनुमानगढ़ जंक्शन।

‘शरीर ही ब्रह्मांड’ कॉलम में काफी ज्ञानवर्धक जानकारी मिल रही है। आलेख में भी ध्वनि को परिभाषित करते हुए बहुत ही अच्छी व्याख्या की गई है। सही कहा है कि जो कुछ ध्वनि अपने मुख से निकलती है, वह आसपास के वातावरण, जड़, प्राणी प्रत्येक शरीर से गुजरती है। वही ध्वनि सबसे पहले हमारे शरीर की धातुओं को भी प्रभावित करती है। बाद में बाहर के पदार्थ पर असर डालती है।
संतोष सिंह परिहार, साहित्यकार, बुरहानपुर

मन का संचालन प्रकृति करती है तो वह प्रसन्न रहता है, संसार से जुड़ा रहता है, किंतु जैसे ही आत्मा इसका संचालन करती है तो वह मोक्ष की ओर अग्रसर करने लगता है। यदि मनुष्य दोनों के बीच संतुलन बना ले तो वह संसार का सबसे सुखी व्यक्ति बन जाता है। मन की इच्छाओं के चलते ही आज मनुष्य दर-दर भटकने को मजबूर हो रहा है, जबकि वह इच्छाओं को नियंत्रित कर सुखी जीवन व्यतीत कर सकता है। आज आधुनिकता और भौतिकवादी युग में मनुष्य का नियंत्रण स्वयं पर नहीं रहा है। वह मन इच्छाओं के वशीभूत होकर खुद को कष्ट देने में लगा है। ईश्वर से जुडऩा ही नहीं चाहता है।
डॉ. सत्येन्द्र स्वरूप शास्त्री, एस्ट्रोलॉजर, जबलपुर

ऐसा कहा जाता है कि इंसान की ध्वनि पर मां सरस्वती विराजमान होती है। यही वजह है कि दिन भर में मुख से निकली कोई न कोई ध्वनि सत्य भी होती है। मनुष्य को अपने ध्वनि उच्चारण के समय ध्यान रखना चाहिए कि कभी भी किसी के प्रति अनिष्ट शब्द न निकले। ध्वनि का आधार प्राण-स्पंदन है, मन के भाव हैं। यहीं से कामना-भावना-वासना के रूप भी तय होते हैं।
गौरव उपाध्याय, ज्योतिषाचार्य, ग्वालियर

आलेख में जिस तरह बताया गया है कि ध्वनि तरंगों को कोई बाधा रोक नहीं पाती और ध्वनि चारों महाभूतों को प्रभावित करती है। यह बात सही है। ध्वनि का वेग सबसे अधिक होता है। ध्वनि आकाश में व्याप्त हो जाती है और वहीं से इसका संचालन होता है।
योगिता झा, एडवोकेट, शिवपुरी

आलेख मेें सृष्टि के तत्त्वों पर प्रकाश डाला गया है। ध्वनि के आध्यात्मिक व वैज्ञानिक दृष्टि से महत्त्व को बताते हुए उन्होंने कहा है यह चारों दिशाओं को प्रभावित करती है। दूसरे तत्त्वों की तुलना में यह अधिक प्रभावी है। जल, अग्नि व वायु की दिशाएं निर्धारित होती हैं, लेकिन ध्वनि की तरंगें चारों दिशाओं में फैलती हैं। उन्होंने ध्वनि के लाभ और हानि दोनों की चर्चा की है।
डॉ. विनोद राय, सिंगरौली

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