
crime
इसमें दो राय नहीं कि शराब सेवन जैसी बुराई की रोकथाम में सामाजिक स्तर पर लिए गए फैसलों की अहम भूमिका रहती है। यह भी सच है कि शराबबंदी को लेकर समाज व समूह के स्तर पर लगाई जाने वाली पाबंदियां शराब के दुष्परिणामों से बचाने की दिशा में अहम हैं। शिक्षा के प्रसार और समझाइश के आधार पर इस तरह की पाबंदी लागू भी की जानी चाहिए। लेकिन जब सामाजिक स्तर पर लगाए गए प्रतिबंधों की पालना न करने पर अपने स्तर पर सजा देना शुरू हो जाए तो कथित समाज सुधार का विदू्रप चेहरा ही नजर आता है। राजस्थान में उदयपुर के आदिवासी इलाके में शराब पीने पर रोक के सामाजिक नियम का उल्लंघन करने पर युवक के एक पैर में रस्सी बांध कर पेड़ से उल्टा लटकाकर मारपीट की घटना को समाज सुधार के नाम पर सामाजिक आतंक ही कहा जा सकता है। सोशल मीडिया के दौर में भले ही देरी सही लेकिन ऐसी घटनाएं सामने आ ही जाती हैं। यह मामला भी करीब दो माह बाद सामने आया है। इस तरह से दी गई सजा न केवल उत्पीडऩ की श्रेणी में आती है बल्कि निजी कानून-कायदों की पालना के नाम पर मानवाधिकारों के उल्लंघन को भी दर्शाता है। समाज के ठेकेदार खुद को ही जज और जल्लाद बनाने लग जाएं तो चिंता होना स्वाभाविक है।
यह घटना कोई अकेली नहीं। कभी प्रेमी युगल से मारपीट करने तो कभी चोरी में लिप्तता स्वीकार कराने के लिए निर्दोष से मारपीट करने, अपराधी को पुलिस के हवाले करने के बजाए खुद कानून हाथ में लेकर सजा देने जैसी घटनाएं आए दिन सामने आती रहती हैं। कभी-कभी तो भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या तक कर दी जाती है। पुलिस व प्रशासन के समय रहते दखल नहीं करने से भी ऐसी घटनाएं बढ़ती हैं। इस तरह के मामलों में जरा सी भी सुस्ती किसी बड़े घटनाक्रम को अंजाम देने वाली हो सकती है। सामाजिक नियमों को हिंसा के माध्यम से लागू करने के तरीकों को तो किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए।
Updated on:
16 Jul 2026 03:09 pm
Published on:
16 Jul 2026 03:09 pm
