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संपादकीय: जिन पर निगरानी का जिम्मा उन्हें भी मानें अपराधी

जिस बड़े पैमाने पर यह कारोबार चला उससे साफ है कि यह एक सुनियोजित गंभीर अपराध था। ऐसी गतिविधि बिना मजबूत आपराधिक नेटवर्क, नियमित आपूर्ति और कई स्तरों पर मिलीभगत के लंबे समय तक चल ही नहीं सकती।
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जयपुर

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ANUJ SHARMA

Jul 16, 2026

Adulterated milk

Adulterated milk

दूध पौष्टिकता देने वाला पदार्थ ही नहीं बल्कि जीवन-पोषण में एक विश्वास का प्रतीक है। देश के अलग-अलग हिस्सों में समय-समय पर दूध में मिलावट के मामले सामने आते रहे हैं। इस अपराध का सबसे भयावह पक्ष यह रहता है कि इसका शिकार वे लोग बनते हैं, जिनकी रक्षा करना समाज की पहली जिम्मेदारी है। बच्चे, गर्भवती महिलाएं, बुजुर्ग और बीमार व्यक्ति सबसे अधिक दूध पर निर्भर रहते हैं। उसी दूध में डिटर्जेंट, पाम ऑयल और रासायनिक पदार्थ मिलाए जा रहे हों, तो यह सिर्फ मिलावट नहीं, लोगों के स्वास्थ्य के साथ जानबूझकर किया गया खिलवाड़ है।

महाराष्ट्र के धाराशिव में सामने आया करोड़ों लीटर मिलावटी दूध का मामला केवल आपराधिक घटना ही नहीं, बल्कि उस भरोसे पर आघात है, जिस पर लोगों की सेहत टिकी हुई है। जांच में सामने आया कि छह माह के दौरान घटिया दूध पाउडर से मिलावटी दूध तैयार कर बड़े पैमाने पर बाजार में बेच दिया गया। जिस बड़े पैमाने पर यह कारोबार चला उससे साफ है कि यह एक सुनियोजित गंभीर अपराध था। ऐसी गतिविधि बिना मजबूत आपराधिक नेटवर्क, नियमित आपूर्ति और कई स्तरों पर मिलीभगत के लंबे समय तक चल ही नहीं सकती। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब लाखों-करोड़ों लीटर मिलावटी दूध बाजार तक पहुंच गया, तब खाद्य सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाने वाली एजेंसियां क्या कर रही थीं? जिन पर दूध की जांच और निगरानी का जिम्मा था, वे भी इस अपराध में बराबर के भागीदार हैं। अपराधियों ने तो मुनाफे के लिए सेहत से खिलवाड़ किया, लेकिन निगरानी एजेंसियों ने जानबूझ कर इस खिलवाड़ को होने दिया। खाद्य सुरक्षा की व्यवस्था का उद्देश्य केवल छापेमारी करना नहीं, बल्कि अपराध को पनपने से पहले रोकना है। लाखों लीटर मिलावटी दूध के घरों तक पहुंचने के बाद कार्रवाई होना सफलता नहीं मानी जा सकती। चिंता की बात यह भी है कि मिलावट की यह समस्या किसी एक जिले या राज्य तक सीमित नहीं है। दूध ही नहीं तमाम खाद्य पदार्थों में मिलावट संगठित अपराध का रूप लेती जा रही है, जहां मुनाफा मानव जीवन से अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया है। लोगों के स्वास्थ्य से जुड़े ऐसे मामलों में अब केवल कड़ी कार्रवाई की घोषणा पर्याप्त नहीं होगी। अब तक का अनुभव बताता है कि सजा के सख्त प्रावधान होने के बावजूद मिलावट के अधिकांश मामलों में कार्रवाई की खानापूर्ति ही होती है।

दूध संग्रहण केंद्रों, डेयरियों और परिवहन आपूर्ति की नियमित वैज्ञानिक जांच, डिजिटल ट्रैकिंग और मिलावट के दोषियों के खिलाफ सख्ती होनी चाहिए। सबसे बड़ी बात यह भी कि लोगों को भी जागरूक किया जाना चाहिए कि वे अपने स्तर पर दूध व दूसरे खाद्य पदार्थों में मिलावट की जांच कैसे कर सकते हैं। इस अपराध पर कठोर अंकुश नहीं लगाया गया तो शुद्धता पर लोगों का विश्वास टूटेगा और इसकी कीमत पूरे समाज को चुकानी पड़ेगी।