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स्पंदन : स्त्री-3

पत्नी तो एक ही होगी, औरतें कितनी भी हों। सभी मुखौटे लगाकर पुरुष को ठगती भी हैं और शायद पीठ के पीछे खिल्ली भी उड़ाती हों। रूप यह भी उसी माया का होता है। अनेक रूपों में दिखाई पड़ता है। पुरुष को आवरित करना ही इसका उद्देश्य होता है। वह धैर्यवान है और प्रतीक्षा करने में संकल्पवान भी है।

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Gulab Kothari

Oct 03, 2021

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- गुलाब कोठारी

जीवन की सारी गतिविधियां स्त्री के चारों ओर ही घूमती हैं। गतिविधि का मूल ही माया है। ब्रह्म तो मात्र साक्षी है। जहां भी उसका अहंकार बीच में आया, मामला बिगड़ता ही है। उसको जीवन यापन के लिए बुद्धि बाहुल्य मिला है। इसका उपयोग जब-जब भी आपसी सम्बंधों में होगा, नुकसान ही होगा। शादी के समय तक तो मुझे भी स्त्री की इतनी बड़ी भूमिका का अनुमान नहीं था। धीरे-धीरे शरीर से परिचय हुआ, बुद्धि के स्तर आदान-प्रदान हुआ। तब भी हम जीवन का उद्देश्य नहीं समझ पाए। घर में और कार्यालय में गतिविधियों की रेलम-पेल थी। यात्राओं का दौर था। न अपने जीवन को समझने का अवसर मिला, न माता-पिता के जीवन का आकलन कर पाए। इस बीच बड़ा काल खण्ड बीत गया।

स्त्री की भूमिका, स्त्री का संकोच, स्त्री की कामना का विस्तार, परिग्रह, जीवन के अंशों को आवरित करने की कला, लोभ, ईष्र्या, आसक्ति आदि भाव गृहस्थी में रहकर बहुत ही नजदीक से देखे। स्त्री का देने का भाव और नारी की लेते रहने की प्रवृति के विविध आयाम दिखाई पड़े। स्त्री अपने पति को सदा ऊपर उठते देखना चाहती है। उसमें सदा सहयोगी बनती है। नारी का स्वार्थ पुरुष का भोग है। न भागीदारी, न ही त्याग। वह तो प्रवाह पतित ही करती है। पत्नी तो एक ही होगी, औरतें कितनी भी हों। सभी मुखौटे लगाकर पुरुष को ठगती भी हैं और शायद पीठ के पीछे खिल्ली भी उड़ाती हों। रूप यह भी उसी माया का होता है। अनेक रूपों में दिखाई पड़ता है। पुरुष को आवरित करना ही इसका उद्देश्य होता है। वह धैर्यवान है और प्रतीक्षा करने में संकल्पवान भी है। पुरुष के उतावलेपन से अच्छी तरह परिचित भी है। अत: आसानी से शिकार कर लेती है। प्रारब्ध और अहंकार दो इसके कारण होते हैं। शक्तिमान सदा निर्बल पर आक्रमण करता है। स्त्री कभी निर्बल नहीं होती। न प्रमाद ही करती है, न अवसर हाथ से जाने देती।

स्त्री होना ही एकमात्र अर्थ है जीवन का। स्त्री भी केन्द्र में तो पुरुष ही है-पुरुष की तरह। किन्तु जीवन का रहस्य है दोनों के स्त्रैण होने में। आज बाहर पुरुष तो अहंकार से ओतप्रोत है, स्त्री भी पुरुष रूप ही जीना चाहती है। अर्थ और काम के बीच स्त्रैण ही धर्म और मोक्ष का मार्ग है। शिव है तो शक्ति है। शक्ति शिव के भीतर ही है। जब शक्ति सुप्त है, तब शिव भी शव की तरह निष्क्रिय है। पुरुष भी शिव है, नारी भी शिव है। दोनों की अपनी-अपनी शक्तियां हैं। ये शक्तियां ही दोनों के जीवन को चलाती हैं। शक्ति या ऊर्जा का कोई ***** नहीं होता। देवी-देवता भी सृष्टि के पॉजिटिव-नेगेटिव तत्त्व होते हैं, किन्तु इनका भी ***** भेद नहीं होता। बुद्धि या भावना का कोई ***** भेद हो सकता है क्या? प्राणों का कोई भेद नहीं होता, सिवाय स्थूल और सूक्ष्म के। ‘अग्रि-सोमात्मक जगत’ के सिद्धान्त के आधार पर दो मुख्य श्रेणियां अवश्य बनी हुई हैं।

शायद गृहस्थाश्रम की समाप्ति तक मेरा चिन्तन स्त्रैण की ओर गंभीरता से नहीं मुड़ा। एक प्रश्न अवश्य मन में आया-वानप्रस्थ में क्या छोडऩा है और क्या नया जोडऩा है। निश्चित है कि घर नहीं छोडऩा। पत्नी, बच्चे, परिवार को नहीं छोडऩा। तब? जिस पौरुष के आधार पर गृहस्थ धर्म चल रहा था, उसे स्त्रैण बनाना है। विरक्त नहीं, निवृत्त होना है। पहले काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि से निवृत्त होना है। अविद्या, अस्मिता, आसक्ति (राग-द्वेष), अभिनिवेश से निवृत्त होना है। इसके लिए विद्या का, उपासना का, संकल्प का सहारा लेना होता है। कई बार गुरु मिल भी जाते हैं, कई बार गुरुओं की महत्त्वाकांक्षा से पाला पड़ता है। कई बार स्वयं संकल्प के सहारे एकलव्य की तरह मार्ग ढूंढऩा पड़ता है। किन्तु जिसकी पत्नी इस यात्रा में साथ रहने को सहर्ष तैयार रहे, उसे समझो मार्ग मिल गया। अधिकांशत: लोग पत्नी से ही दु:खी रहते हैं। यह तो एक शुभ लक्षण है। बिना किसी प्रयास अथवा अभ्यास के आप विरक्ति की ओर बढ़ रहे हैं। ईश्वर की आप पर कृपा है।

यह अलग बात है कि आप यदि अज्ञान के घेरे में हैं, तो इसका विकल्प ढूंढऩे निकल सकते हैं। वरन् पत्नी से अधिक कठोर मार्गदर्शक तो गुरु भी नहीं होता। जरूरत पडऩे पर पत्नी न केवल कटाक्ष-व्यंग्य कर सकती है, वह तो अपमानित भी कर सकती है। शिक्षित पत्नी को पति की कमियां ही दिखती हैं। वह पति की विशेषताओं को गर्व करने का विषय मानती ही नहीं। बुद्धिजीवी हो जाती है। इनके भरोसे संकल्प नहीं किया जा सकता। पति से पहले इनकी अपनी प्राथमिकता होती है। एक अदृश्य स्पर्धा इनके मन में बनी रहती है। इनके साथ संबंध गहरे नहीं हो सकते। आज की बुद्धिजीवी, समाजसेवी तथा विकास के नाम पर आन्दोलन करने वाली नारियां इसका उदाहरण हैं। स्त्री की एक भूमिका बड़े-बूढ़ों के साथ तथा एक भूमिका बच्चों के साथ भी होती है। स्वजन, परिजन एवं समाज में व्यक्ति का उत्तरदायित्व भी मूलत: पत्नी ही उठाती दिखाई देती है।

प्रकृति के तीन रूप हैं सत-रज-तम। लक्ष्मी, सरस्वती, काली इनका शक्ति रूप है। प्रत्येक नारी इन्हीं त्रिगुणों के आवरणों के सहारे अपने मायाभाव को प्रकट कर पाती है। ये बाहरी स्त्री के साथ भीतरी स्त्री के शक्ति रूप भी हैं। अद्र्धनारीश्वर का यही नारी अंश बनता है। इन तीनों शक्तियों के शक्तिमान यानी कि विष्णु-ब्रह्मा-शिव पुरुष भाग बनता है। इन तीनों का सम्मिलित रूप हृदय कहलाता है। हृ यानी कि हरने वाला, इन्द्र या शिव। संहारक देव प्राण। द यानी कि देने वाला, पोषक प्राण, विष्णु। य ब्रह्मा का अर्थ है-नियमन करने वाला। इन तीनों के कार्य शक्तियां ही करती हैं। तब कहते हैं कि पुरुष और प्रकृति मिलकर सृष्टि चलाते हैं। अत: इन दोनों का संतुलन बहुत आवश्यक है। प्रकृति को अपने आप में पूर्ण कहा है, जबकि पुरुष को अपूर्ण माना है। अत: पुरुष ही पूर्णता के लिए भटकता रहता है।

विवाह का संकल्प शायद इस कमी को पूरी करने के लिए ही कराया जाता है। पति-पत्नी रूप पुरुष- प्रकृति का योग-सामंजस्य। भीतर की स्त्री का जो भी स्वरूप होगा, उसी आधार पर बाहर की स्त्री से व्यवहार होगा। भीतर के स्त्री-पुरुष का निजी रूप हैं। बाहर के स्त्री-पुरुष एक साथ रहते हुए भी स्वतंत्र जीवात्मा है। दोनों अपने-अपने कर्मफल भोगने के लिए साथ रहते हैं। भीतर में तो अलग-अलग ही होते हैं। एक दूसरे के आध्यात्मिक विकास में सहायक होते हैं। एक दूसरे के पुरुष-प्रकृति भाव को पूर्णता देते हैं। इसी क्रम में दोनों सम्पूर्ण प्रकृति के स्वरूप को समझ पाते हैं। चूंकि कर्ता भाव प्रकृति का है, अत: प्रकृति के द्वारा ही प्रकट होता है। समझा जा सकता है। बाहर की स्त्री भीतर के प्रकृति के आवरणों को समझने, हटाने का माध्यम बन जाती है। वही कामनाओं का घेरा भी है और समझ जाने के बाद वही वैराग्य का निमित्त भी बनती है।

हृदय के तीनों मूल अक्षर प्राणों का अंग होने के कारण यही सृष्टि का उपादान कारण भी हैं। अव्यय पुरुष के प्राण भाग से ही तीनों देव प्रकट होते हैं। इसी से सृष्टि क्रम आगे बढ़ता है। प्रति सृष्टि के लिए मन की धारा प्राणों के स्थान पर चेतना की ओर मुड़ जाती है। प्राण ऊर्जा ऊध्र्व-गामी होने लगती है। विज्ञानमय कोष चेतना का क्षेत्र है। इसके भीतर आनन्दमय कोष चेतना का क्षेत्र है। ये सारे माया के ही आवरण हैं। जहां तक सत्य भाव है, वहां तक माया है। माया के इस रूप को प्रज्ञा ही समझ पाती है। स्त्री द्वारा पैदा किया गया वैराग्य ही पुरुष को ईश्वर के क्षेत्र में प्रवेश दिलाता है। इसी के आगे ऐश्वर्य की शुरुआत है।

शरीर : मैं नहीं, मेरा साधन

शरीर ही ब्रह्माण्ड : ब्रह्माण्ड का एक ही बीज