शरीर ही ब्रह्माण्ड : ब्रह्माण्ड का एक ही बीज

प्रत्येक बीज का शरीर कारण, सूक्ष्म व स्थूल-इन तीन भागों में विभक्त रहता है। बीज की देह स्थूल शरीर है- जैसे आम की गुठली का कवच-कठोर-दृढ़ रूप।

By: Gulab Kothari

Published: 24 Jul 2021, 07:13 AM IST

- गुलाब कोठारी

सभी चौरासी लाख योनियों का ब्रह्म ही एकमात्र बीज है। यही गॉड पार्टिकल कहा जा सकता है। शुद्ध प्राण रूप है। पूर्ण निराकार, निर्विकार। ब्रह्म निराकार है, बीज साकार होता है। ब्रह्म का ऋत* रूप बृंहण यानी फैलाव सृष्टि की उत्पत्ति नहीं कर सकता और उसकी शक्ति माया भी ऋत रूप ही है। दोनों मिलकर परात्पर भाव में सृष्टि नहीं कर सकते। उनको सत्य** भाव में आना अनिवार्य है। प्रलयकाल में भी यह सत्य संस्था ब्रह्मा रूप में विष्णु की नाभि में उपलब्ध रहती है। देवों की निर्बलता के कारण गति उपलब्ध नहीं होती। यह स्पन्दन रूप में बनी रहती है।

गति (परिणाम) शब्द आनन्द के लिए कहा गया है। आनन्द के आगे कहीं जाने की इच्छा नहीं होती। प्राण ही धारण पोषण करते हैं तथा प्राणी उसी के आधार पर रहते हैं। प्राण ही शरीरस्थ पदार्थों का प्रभु भी है। प्राण के साथ सब निकल जाते हैं। ये सारे भाव मन (अव्यय कला) के लिए कहे गए हैं। यही मुक्ति साक्षी या सृष्टि साक्षी बनता है। प्राण-वाक् उसी से निकलते हैं, उसी में लीन हो जाते हैं। बीज और निधान पांचवी कला (वाक्) के लिए कहे गए हैं। वाक् से पदार्थ, पंच महाभूत पैदा होते हैं। सांख्य दर्शन में पहले तन्मात्रा (शब्द) बनकर आगे सबको उत्पन्न करती है। इसी को निधान कहा गया है। क्योंकि वाक् कोई नया पदार्थ उत्पन्न नहीं करती। पहले जो उसमें विद्यमान हैं उन्हीं को प्रकट करती है। शरण और सुहृत् शब्द विज्ञान कला के लिए कहे गए हैं। आपात काल में ज्ञान ही रक्षा करता है (शरण), और ज्ञान ही बिना प्रत्युपकार की इच्छा के मित्ररूप से सबकी भलाई करता रहता है।

विद्या-अविद्या ही ब्रह्म-कर्म है। विद्या भाग एकरूप रहता है, कर्म भाग प्रतिक्षण बदलता रहता है। कर्म भाग से ही भूतों की उत्पत्ति होती है। ब्रह्म-कर्ममय अव्यय सब चेतन प्राणियों में विद्यमान है। यही उसका अपना भाव या अध्यात्म कहलाता है। अव्यय पुरुष का जितना अंश जड़ पदार्थों में रहता है, वह अधिभूत कहा जाता है। विनाशी भाव कहलाता है। जितना अव्ययांश देवताओं में रहता है, वह अधिदैवत है। दोनों (देव और भूत) के उत्पादक प्रजापति में जो अव्यय व्याप्त रहता है, वह अधियज्ञ है। वही अव्यय पुरुष रूप मुख्य प्रजापति है- कृष्ण है।

कृष्ण कह रहे हैं कि मैं ही सबकी गति हूं, मैं ही गन्तव्य हूं। मुझे प्राप्त करने के बाद फिर कहीं जाना नहीं पड़ता। मैं ही सबका बीज रूप हूं। मुझसे ही प्राणी उत्पन्न होते हैं। किन्तु अन्य बीजों की तरह मैं नष्ट नहीं हो जाता। अविनाशी रहता हुआ ही सबको उत्पन्न करता हूं। सबको अपने में लीन करने वाला (स्थान) हूं।

गतिर्भत्ता प्रभु: साक्षी निबास: शरमं सुहृत्।
प्रभव: प्रलय: स्थानं निधानं बीजमव्ययम्।। गीता 9/18

प्रत्येक बीज का शरीर कारण, सूक्ष्म व स्थूल-इन तीन भागों में विभक्त रहता है। बीज की देह स्थूल शरीर है- जैसे आम की गुठली का कवच-कठोर-दृढ़ रूप। उसके भीतर शरीर- कोमल गुठली, सूक्ष्म केन्द्र रूप हृदय। बीज का स्थान कारण शरीर होता है। वैज्ञानिक भाषा में शरीर भूतचिति है। यह पंचभूतों की चिति ही है। सूक्ष्म शरीर देवचिति है। द्यो-तन (प्रकाशरूप) देवता इन्द्रिय आदि का चयन ही है। भीतर कारण शरीर बीज शरीर कहलाता है। क्योंकि देव-भूत सबके बीजभूत अविद्या का चयन रूप ही कारण शरीर है। यही अध्यात्म है। बीज का भी बीज होता है। इस बीज में सारे कर्म-फल, संचित कर्म, वर्ण, आयु आदि का लेखा-जोखा रहता है। इस बीज के केन्द्र में अव्यय पुरुष रहता है। सम्पूर्ण सृष्टि के जड़-चेतन पदार्थों का बीज यही अव्यय है। हृदयरूप केन्द्र के साथ ही जीव भाव में रहता है।

यही हृद प्राण-अव्यय पुरुष के सहारे आगे से आगे सृष्टि विस्तार करते जाते हैं। हृदय ही ऋक्, यजु, साम है। हृदय ही मन-प्राण-वाक् है। हृदय ही आत्मा है। जितने भी स्थितिमान् पदार्थ हैं, वे चारों ओर गतिमान ही हैं। गति को गर्भ रखकर ही ये पदार्थ स्थिरधर्मा बने रहते हैं। ये तभी गतिमान होते हैं जब इनकी विरुद्ध गति को हटा दिया जाए। यही विज्ञान का सिद्धान्त है- गति को केन्द्र में रखकर ही स्थिति अपना स्वरूप सुरक्षित रखती है। यदि स्थिति में से गति निकाल दी जाती है, तो यह स्थिति गतिरूप परिणत हो जाती है। यही सिद्धान्त सृष्टि की अग्नि-सोम विद्या का केन्द्र है। विशुद्ध बुद्धि निरपेक्ष स्थिति-गति-आगति रूप प्राण ब्रह्म की स्वरूप व्याख्या भूतविज्ञान के द्वारा नहीं हो सकती। वैदिक विज्ञान दृष्टि से स्पष्ट है।

पदार्थ विज्ञान भाषा में ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र ही क्रमश: स्थिति-आगति-गति हैं। गति समष्टि ही स्थिति है। केन्द्र से परिधि की ओर जाना गति है, परिधि से केन्द्र की ओर आना आगति है। जब गति-आगति किसी केन्द्र बिन्दु पर मिलती है- समभाव में, तब वह स्थिति बन जाती है। एक ही गति-प्राण तत्त्व तीन भागों में बदल जाता है। एक ही हृदय के ये तीन अक्षर हैं। प्रत्येक वस्तु का यही हृदय रूप है- तीनों अक्षर प्राण हैं। यही ब्रह्म रूप बीज का प्रथम विकास है। आगे जब आगति भाव स्थिति में समाविष्ट होता है तो संकोचगति बनती है। जब गति भाव स्थिति के गर्भ में समाविष्ट हो जाता है, तो विकासगति उत्पन्न हो जाती है। ये पांच गतियां एक ही अक्षर प्राण की पांच अवस्थाएं- पंचाक्षर कहलाईं। इनमें ब्रह्मा स्थिति, आगति विष्णु, गति रूप इन्द्रप्राण तथा विकासगति अग्नि और संकोचगति सोम कहे गए। ये ही सृष्टि के प्रत्येक बीज का हृदय (केन्द्र) हैं। यही सृष्टि का सूक्ष्म शरीर है। हमारे शरीर में इसी को प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय कोष कहते है। गतिविद्या के गर्भ में ही क्षर विद्याएं प्रतिष्ठित रहती हैं।

अव्यय पुरुष कुछ करता नहीं, किन्तु सबका आधार होने से ही वही कर्ता है। समुद्र स्थानीय है। जल में तरंग बुद्बद् आदि जल से बाहर नहीं हैं। ‘‘मन: परतरं नाम्यत्’’। चाहे ब्रह्म के विवर्त भाव हों या प्रकृति के गुणों के विकार हों, वे सब अव्यय से ही उत्पन्न कहे जाएंगे। किन्तु अव्यय पुरुष की उनमें विभूति मात्र रहेगी। प्रकृति विकारों में अव्यय का बन्ध या योग नहीं होता।*** कृष्ण कह रहे है कि मैं अव्यय रूप से सब जगत में व्याप्त हूं। पृथ्वी में पवित्र गंध रूप से रहता हूं। जहां कहीं दुर्गंध है वह माया के कारण। प्राणियों में जीवन शक्ति और तपस्वियों का तप मैं हूं। तपस्वियों का जीवन तप के लिए ही होता है।

सब जड़ चेतनात्मक वस्तुओं का बीज मुझको समझ। बीज की विशेषता है कि अंकुर पैदा होने के बाद बीज का अपना स्वरूप कुछ नहीं रहता, किन्तु मैं सब जगत को उत्पन्न करके भी स्व-स्वरूप से वैसा ही बना रहा हूं। यही अर्थ ‘सनातन’ शब्द का है। श्रुति कहती है-

पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ बृहदारण्यक उपनिषद।

जगत का उत्पादक परमात्मा भी पूर्ण है, जगत भी पूर्ण है। उस पूर्ण से ही यह पूर्ण निकला है। पूर्ण से पूर्ण निकलने के बाद भी शेष पूर्ण ही बचता है। जगत के विस्तार का कारण ब्रह्म ही है। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ब्रह्म की सन्तान है- चौरासी लाख योनियों का ब्रह्म ही बीज है।

जब पेड़ बड़ा हो जाता है, तब बीज नहीं रहता। क्या बीज मर जाता है? तब वैसे ही फल-फूल-आकृति कैसे प्राप्त होती है? बीज की स्थूल देह विलुप्त हो गई। सन्तान से बिछुड़ गई, किन्तु उसका हृदय पेड़ में समा गया। तीनों अक्षर प्राण गति-आगति-स्थिति रूप में पेड़ का पोषण कर रहे हैं। फल-फूल लगाते हैं। हमारे शरीर में भी माता-पिता-गुरु (यदि दीक्षित हैं तब) प्राण (देव) रूप में संचालन करते हैं। तब हम कहते हैं- मातृदेवो भव!

क्रमश:

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