
दस साल पहले केंद्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी सरकार के उभार के बाद यह माना गया था कि गठबंधन की राजनीति के दिन बीत गए। अब एक बार फिर गठबंधन सरकार के दिन वापस आ गए हैं। गठबंधन की राजनीति का बुनियादी आधार स्थानीय या क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का बढ़ता प्रभाव होता है। अपने असर वाले इलाकों में अपनी बढ़ती ताकत के जरिए वे राष्ट्रीय पार्टियों के विस्तार को रोक देते हैं। क्षेत्रीय हितों के लिहाज से क्षत्रपों का उभार किंचित फायदेमंद भले होता हो, राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से क्षत्रपों की बढ़ती ताकत और केंद्रीय स्तर पर सत्ता के कमजोरी राष्ट्रीय हितों को दरकिनार करने के लिए मजबूर कर देती है।
अठारहवीं लोकसभा के चुनाव नतीजों के बाद पांच बड़े क्षेत्रीय दल ताकतवर बनकर उभरे हैं। समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, तेलुगू देशम पार्टी और जनता दल (यू) का नए सिरे से उभार हुआ है, तो डीएमके ने भी अपनी ताकतवर स्थिति बरकरार रखी है। इन पांच में से तीन जहां केंद्र के विरोधी हैं, वहीं दो सहयोगी हैं। हालांकि इनके सहयोग की भी गारंटी नहीं मानी जा सकती है। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि इन क्षत्रपों का उभार क्या फिर से एक बार देश को अस्थिरता के दौर में ले जाएगा? स्वाधीन भारत के इतिहास में 1989 में गठबंधन की पहली सरकार बनी थी। विश्वनाथ प्रताप सिंह की यह सरकार महज 11 महीने ही चल पाई। उसके बाद चंद्रशेखर की अगुवाई में बनी सरकार महज चार महीने ही चली। देवेगौड़ा और इंद्रकुमार के नेतृत्व में बनीं सरकारें भी नहीं टिक पाईं। इसके बाद आई अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली गठबंधन की सरकार भी तेरह महीने में ही गिर गई। यह बात दूसरी है कि वाजपेयी के नेतृत्व वाली अगली गठबंधन सरकार जरूर लंबे समय तक चली।
अतीत की जिन गठबंधन सरकारों को अस्थिर करने के पीछे सबसे ज्यादा क्षेत्रीय पार्टियों और उनके नेताओं के अपने स्वार्थों और राजनीति की भूमिका बड़ी रही। चूंकि इस बार बीजेपी को खुद का बहुमत नहीं मिला है। इसके साथ ही उसके गठबंधन के साथी नीतीश कुमार और एन. चंद्रबाबू नायडू बड़ी ताकत बनकर उभरे हैं, इसलिए यह आशंका जताई जाने लगी है कि क्या डबल इंजन की सरकार की बात पुरानी हो जाएगी? क्या ये क्षत्रप भारतीय जनता पार्टी की सरकार को आराम से चलने देंगे? अतीत के इन नेताओं के कदमों को देखें तो यह आशंका भी बेमानी नहीं है। नीतीश कुमार, राजनीति के शीर्ष पर भले ही बीजेपी के साथ पहुंचे, लेकिन अपने सियासी नफा-नुकसान के चक्कर में उन्होंने अतीत में उसी बीजेपी का दो-दो बार साथ छोडऩे में भी हिचक नहीं दिखाई।
एनडीए की बैठक में हिस्सा लेने के लिए पटना से दिल्ली आते वक्त आरजेडी नेता तेजस्वी यादव के साथ हवाई जहाज में बैठे उनका फोटो खूब प्रचारित हुआ है। नीतीश राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं। बेशक वे कांग्रेस के साथ न जाएं, लेकिन इस तस्वीर के जरिए उन्होंने बीजेपी की धड़कनें जरूर बढ़ा दी हैं। इसी तरह चंद्रबाबू नायडू गठबंधन में आंध्र में चुनाव लड़े और बीजेपी के सहयोग से जीत हासिल करने में कामयाब हुए हैं। लेकिन जिस तरह की खबरें आ रही हैं, उससे लग रहा है कि सरकार समर्थन की सौदेबाजी की अपनी पुरानी कला पर हाथ आजमा रहे हैं। वाजपेयी सरकार को बाहर से समर्थन देने के एवज में वे अनुपात के लिहाज से ज्यादा फंड और राशन तत्कालीन आंध्र को ले जाते रहे हैं। चाहे नीतीश कुमार हों या चंद्र बाबू नायडू, दोनों की एक मांग समान है। दोनों अपने-अपने राज्यों को विशेष दर्जा और विशेष आर्थिक पैकेज देने की मांग करते रहे हैं। ये दोनों मांगें ऐसी हैं, जिनके लिए दोनों को अपने-अपने राज्यों से जनसमर्थन मिलता रहेगा। इसलिए यह आशंका है कि वे एनडीए सरकार को हिलाने की कोशिश कर सकते हैं।
लोकसभा में 37 सीटों के साथ तीसरा बड़ा दल बनने में कामयाब रही समाजवादी पार्टी का बीजेपी से छत्तीस का सियासी रिश्ता है। वह संसद में लगातार राजग सरकार की राह में बाधा बनने की कोशिश करती रहेगी। 1999 और 2004 के चुनाव के दिनों में ताकतवर बनी समाजवादी पार्टी ऐसा करके दिखा चुकी है। 29 सीटों के साथ तृणमूल कांग्रेस लोकसभा में चौथा सबसे बड़ा दल बनकर उभरी है तो 22 सीटों के साथ डीएमके पांचवें नंबर पर है। इन दोनों दलों के रिश्ते भी बीजेपी से बेहतर नहीं है। तीनों ही बीजेपी के अपने-अपने राज्यों में विरोधी हैं। इसलिए यह तय है कि ये तीनों भी संसद में केंद्र सरकार के लिए मुसीबतें खड़ी करते रहेंगे। क्षत्रपों के उभार के बाद सबसे बड़ी समस्या केंद्र और राज्यों के बीच रिश्तों को लेकर उठ खड़ी होती है।
राज्य अपनी मांगों को लेकर केंद्र को अल्टीमेटम तक देते रहे हैं। लेकिन जब क्षेत्रीय स्तर पर ताकतवर दल होते हैं तो केंद्र और राज्य के रिश्तों की तल्खी कुछ ज्यादा ही बढ़ जाती है। हाल के दिनों में पश्चिम बंगाल और केंद्र के रिश्ते कुछ ऐसे ही नजर आए हैं। तमिलनाडु की डीएमके की सरकार से भी केंद्र के रिश्ते बेहतर नहीं रहे। यह बात दूसरी है कि ममता जितनी आक्रामक हैं, स्टालिन उतने आक्रामक नहीं हैं। ऐसे में यह आशंका निर्मूल नहीं है कि आने वाले दिनों में केंद्र और राज्यों के बीच टकराव बढ़ेगा, इसकी वजह से राजनीति अशांत होगी, जिसका असर देश की आर्थिक सेहत पर पड़ेगा। इस तथ्य को सभी राजनीतिक दल जानते हैं। ऐसे में उनसे उम्मीद की जानी चाहिए कि राष्ट्र हित को ध्यान में रखते हुए वे अपने स्थानीय हितों को दरकिनार रखें। वैसे जिस तरह की आज की राजनीति है, ऐसी उम्मीद भी अक्सर बेमानी लगती है।
— उमेश चतुर्वेदी
Published on:
06 Jun 2024 04:14 pm
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