
मजदूरों के लिए कल्याणकारी योजनाएं बनाने का समय
राजेश देवलिया
कोरोना महामारी ने समाज के हर तबके को संकट से घेरा है। आम आदमी से लेकर किसान -मजदूर तक और नियोक्ता से लेकर कामगार तक। अभी लॉक डाउन का दौर आंशिक छूट के साथ जारी रहने वाला है। श्रमिकों के लिए भी कुछ राहत वाले क़दमों की सरकार ने घोषणा की है। लेकिन 21 दिन का लॉक डाउन और आज तक मजदूरों को जितने संकट देखने पड़े वे सबके सामने हैं। देखा जाये तो इस महामारी ने मजदूरों के कल्याण के लिए बेहतर काम करने का अवसर भी दिया है। कार्य क्षेत्र में मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए गाइडलाइंस बनाने की जरूरत है ताकि आपदाओं या इमरजेंसी की स्थिति में इन्हें तुरंत राहत पहुँच सके।
सरकारी तथा निजी कामों में मजदूरों के हित सुनिश्चित करने के प्रयास करने होंगे ताकि नियोक्ता आपात परिस्थितियों में अपनी जिम्मेदारियों से बचते हुए, कामगारों को उनके हाल पर ना छोड़ दें। उम्मीद है जन प्रतिनिधि व शासन द्वारा इस दिशा में सार्थक पहल की जाएगी। यह सब जरुरत इसलिए है क्योंकि मजदूरों के हितों की रक्षा करने के लिए फैक्ट्री ऐक्ट, पेमेंट ऑफ वेज ऐक्ट, वर्कमेन कंपेंसेशन ऐक्ट, ट्रेड यूनियन ऐक्ट, सामाजिक सुरक्षा योजना आदि अनेक कानून व योजनाएं तो हैं पर लॉकडाउन से पता चला कि ये कानून और योजनाएं आपदा के समय मजदूरों के हितों की रक्षा करने में असमर्थ हैं। मजदूरों के कल्याण की योजनाओं को दोबारा परिभाषित करने की जरूरत है। विभिन्न कार्यस्थलों में मौजूद मजदूरों के बारे में जानकारी का अभाव होने से लाखों मजदूर आपदा प्रबंधन उपायों के दायरे से बाहर हैं जिस वजह से उन्हें पिछले दिनों कष्ट उठाना पड़ा।
देश में प्रवासी तथा असंगठित क्षेत्र के मजदूरों का सही लेखा-जोखा केंद्र व राज्य सरकारों के पास भी नहीं है। मोटे तौर पर यह अनुमान है कि यह संख्या टोटल वर्क फोर्स का 85 से 90 प्रतिशत के आसपास है। असंगठित क्षेत्र के कामगारों के हितों के लिए सोशल सिक्यूरिटी एक्ट,2008 के तहत इंदिरागांधी वृद्धावस्था पेंशन योजना, फेमिली बेनिफ़िट स्कीम,जननी सुरक्षा योजना, हेंडलूम वीवर कोम्प्रीहेंसिव वेलफेयर स्कीम, हेंडीक्राफ्ट आर्टिसन कोम्प्रीहेंसिव वेलफेयर स्कीम, पेंशन टू मास्टर क्राफ्ट पर्सन, फिशरमेन वेलफेयर स्कीम,जननी बीमा योजना,आम आदमी बीमा योजना, राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना शामिल हैं ।
इनमें आपदा के समय कामगारों के व्यापक हितों की रक्षा करने के प्रावधान नहीं है। ऐसे कानून व योजनाओं की आवश्यकता है जिनसे आपदाओं के समय मजदूरों की तकलीफ़ों का ध्यान रखा जा सके। मजदूर सिर्फ कोरोना आपदा से प्रभावित हुए हैं, ऐसा नहीं है। समय-समय पर मजदूर अन्य प्राकृतिक आपदाओं के भी शिकार होते रहते हैं।
समय की आवश्यकता है कि इन मजदूरों का विस्तृत डेटा बेस तैयार किया जाए। सोशल सिक्युरिटी ऐक्ट में जिला प्रशासन के माध्यम से विभिन्न श्रेणियों के कामगारों के पंजीयन व उन्हें स्मार्ट पहचान पत्र देने की व्यवस्था की गई है। लेकिन यह मजदूरों की लोकेशन और उनके बदलते रोजगारों को ट्रेक नहीं करते। यदि ऐसा होता तो लॉकडाउन की प्लानिंग में इनके मूवमेंट का ध्यान रखा जाता और बड़े स्तर पर हुए पलायन व अन्य परेशानियों से बचा जा सकता था। (वरिष्ठ भू-वैज्ञानिक एवं प्रमुख सीमेंट कंपनी में उपाध्य्क्ष )
Published on:
16 Apr 2020 02:18 pm

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