14 अगस्त 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

दिल की सेहत पर मौसम की मार! गर्मी, ठंड और प्रदूषण से कितना खतरा?

क्या आपने कभी सोचा है कि बढ़ती गर्मी आपके दिल की सेहत पर क्या असर डाल सकती है? जानिए कैसे जलवायु परिवर्तन आपके दिल की बीमारियों को बढ़ा रहा है और इस खतरनाक सच से कैसे बचा जा सकता है!
3 min read
Google source verification

भारत

image

Ravi Gupta

Aug 14, 2026

heart disease and climate change

प्रतीकात्मक तस्वीर | ChatGPT

जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य के बीच एक नया संबंध उभर रहा है। विशेषकर दिल की बीमारियों (कार्डियोवैस्कुलर डिजीज, CVD) का कारण भी इससे जुड़ा है। हाल के शोध बताते हैं कि बढ़ता तापमान, असामान्य मौसम और वायु प्रदूषण सीधे तौर पर दिल की सेहत पर असर डाल रहे हैं।

आइए समझते हैं कि यह कैसे हो रहा है, कौन सबसे ज्यादा प्रभावित है, और हम क्या कर सकते हैं।

तापमान और दिल की बीमारी

एक व्यापक अध्ययन में 27 देशों के आंकड़ों से पता चला कि अत्यधिक गर्म और ठंडे दिनों में दिल से जुड़ी मौतों का जोखिम बढ़ जाता है। उदाहरण के लिए, अत्यधिक गर्म दिनों (97.5वीं पर्सेंटाइल से ऊपर) पर हर 1000 कार्डियोवैस्कुलर मौतों में से 2.2 अतिरिक्त मौतें होती हैं, जबकि अत्यधिक ठंडे दिनों (2.5वीं पर्सेंटाइल से नीचे) पर यह संख्या 9.1 तक पहुंच जाती है।

भारत में ओजोन और दिल की बीमारी

भारत में हाल ही में IIT खड़गपुर के नेतृत्व में किए गए एक अध्ययन (npj Clean Air में प्रकाशित) में पाया गया कि 2024 में हीटवेव के दौरान बढ़ा ओजोन प्रदूषण 26,500 से अधिक मौतों से जुड़ा था। इनमें से 15,615 मौतें इस्कीमिक हार्ट डिजीज (दिल की धमनियों में अवरोध) से और 10,898 मौतें क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (COPD) से जुड़ी थीं।

अध्ययन के अनुसार हीटवेव के दौरान ओजोन का स्तर अक्सर 85–110 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक पहुंच गया, जो WHO के तय मानक 70 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से काफी ऊपर है - कुछ इलाकों जैसे पश्चिमी हिमालय में तो यह WHO सीमा से 115% तक ज्यादा दर्ज किया गया। सबसे प्रभावित क्षेत्रों में उत्तर-पश्चिम भारत, इंडो-गंगा का मैदान, उत्तर-मध्य भारत, पूर्वोत्तर और पश्चिमी हिमालय शामिल हैं।

ग्लोबल ट्रेंड: तापमान और इस्कीमिक हार्ट डिजीज

Global Burden of Disease (GBD) 2021 डेटा के अनुसार, 2021 में दुनिया भर में लगभग 6.1 लाख इस्कीमिक हार्ट डिजीज (IHD) से होने वाली मौतें अनुपयुक्त तापमान (बहुत गर्म या बहुत ठंडा) से जुड़ी थीं। यह संख्या 1990 से लगभग 42% बढ़ी है। हालांकि, उम्र-मानकित दरें घट रही हैं, लेकिन जनसंख्या वृद्धि और बुजुर्गों की संख्या बढ़ने से कुल मौतों में इजाफा हुआ है। ठंडे तापमान का असर (81.8%) गर्मी (18.2%) की तुलना में कहीं अधिक था।

नीति और स्वास्थ्य प्रणाली में कमी

भारत में राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर जलवायु और स्वास्थ्य से जुड़ी कई योजनाएं हैं, लेकिन इनमें CVD को पर्याप्त स्थान नहीं मिला है। अधिकांश योजनाएं वेक्टर जनित और संक्रामक रोगों पर केंद्रित हैं। हीट-संबंधी बीमारियों और वायु प्रदूषण से जुड़ी राष्ट्रीय कार्ययोजनाओं में भी CVD की व्यापक निगरानी और डेटा अभी भी बहुत सीमित है।

अब हमारे पास स्पष्ट संकेत हैं कि जलवायु परिवर्तन दिल की बीमारियों के लिए एक नया जोखिम कारक बनता जा रहा है। इससे निपटने के लिए कुछ व्यावहारिक कदम हैं:

  • शहरों में हीट अलर्ट सिस्टम में ओजोन और वायु गुणवत्ता की जानकारी शामिल करें।
  • कमजोर समूहों (जैसे बुजुर्ग, गरीब, बाहर काम करने वाले श्रमिक) के लिए विशेष स्वास्थ्य जागरूकता अभियान चलाएं।
  • स्वास्थ्य निगरानी प्रणाली में CVD को जलवायु-संवेदनशील बीमारी के रूप में शामिल करें।
  • घरों और स्कूलों में ठंडा और स्वच्छ वातावरण बनाए रखें - जैसे छाया, हवादार कमरे, पौधे।
  • व्यक्तिगत स्तर पर: धूम्रपान छोड़ें, नमक कम करें, नियमित जांच कराएं और डॉक्टर की सलाह पर दवाइयां समय पर लें।

जलवायु और दिल की सेहत का यह संबंध अभी पूरी तरह समझा नहीं गया है, लेकिन उपलब्ध शोध स्पष्ट संकेत दे रहे हैं। हमें अब नीति, स्वास्थ्य प्रणाली और समुदाय स्तर पर मिलकर काम करना होगा। यदि हम समय रहते जागरूकता बढ़ाएं और ठोस कदम उठाएं, तो यह नया जोखिम कारक नियंत्रित किया जा सकता है।

आइए, इस गर्मी और बदलते मौसम में अपनी और अपने परिवार की दिल की सेहत का ख्याल रखें - क्योंकि दिल की बीमारी अब सिर्फ जीवनशैली की समस्या नहीं, बल्कि जलवायु की चुनौती भी बन चुकी है।