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ज़रा याद करो कुर्बानी: राजस्थान की राजनीति में जय नारायण व्यास का नाम क्यों है सुनहरे अक्षरों में लिखा? जानें उनकी प्रेरक कहानी!

Freedom Movement में जय नारायण व्यास की भूमिका मारवाड़ के राजनीतिक जागरण, प्रजामंडल आंदोलन और उत्तरदायी शासन की मांग से जुड़ी रही। जानिए उनके संघर्ष की पूरी कहानी और राजस्थान के निर्माण में उनके योगदान को।
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भारत

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MI Zahir

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एम आई ज़ाहिर

Aug 12, 2026

Freedom Fighter Jai Narayan Vyas News

स्वतंत्रता सेनानियों के अगुवा महान क्रांतिकारी जय नारायण व्यास। (विजुअल:AI)

क्या एक नेता की आवाज किसी रियासत की जनता में राजनीतिक चेतना जगा सकती है? मारवाड़ के इतिहास में जय नारायण व्यास का जीवन इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। उन्होंने रियासती शासन के दौर में जनता के अधिकारों, उत्तरदायी शासन और राजनीतिक भागीदारी के लिए लंबे समय तक संघर्ष किया। उनका आंदोलन केवल सत्ता में भागीदारी पाने तक सीमित नहीं था, बल्कि मारवाड़ की जनता को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक करने और स्वतंत्रता आंदोलन की विचारधारा को रियासतों तक पहुंचाने से भी जुड़ा था।

जन आंदोलनों के माध्यम से आजादी की मशाल जलाई

जय नारायण व्यास का राजनीतिक जीवन 1920 के दशक से सक्रिय हुआ और स्वतंत्रता के बाद राजस्थान के निर्माण तक जारी रहा। मारवाड़ हितकारिणी सभा, मारवाड़ लोक परिषद और विभिन्न जन आंदोलनों के माध्यम से उन्होंने रियासती शासन के सामने जनता की आवाज मजबूती से रखी। राजस्थान के स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में उनका योगदान इसी व्यापक जनजागरण की कड़ी के रूप में देखा जाता है।

मारवाड़ में राजनीतिक चेतना की शुरुआत

मारवाड़ में राजनीतिक चेतना विकसित करने में जय नारायण व्यास की महत्वपूर्ण भूमिका रही। 1923 में उन्होंने मारवाड़ हितकारिणी सभा के गठन में प्रमुख भूमिका निभाई। इस संगठन के जरिए किसानों और आम जनता की समस्याओं को उठाया गया तथा शासन व्यवस्था में सुधार और जनता की भागीदारी की मांग सामने आई। बाद में यही गतिविधियां मारवाड़ के राजनीतिक आंदोलन का महत्वपूर्ण आधार बनीं।

सरकार के दमन के बावजूद आंदोलन जारी रखा

व्यास केवल संगठन बनाने तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने लेखन को भी जनजागरण का माध्यम बनाया। ‘मारवाड़ की अवस्था’ और ‘पोपनबाई की पोल’ जैसी पुस्तिकाओं में उन्होंने राज्य प्रशासन की नीतियों और जनता की कठिनाइयों को सामने रखा। 19 सितंबर 1929 को सार्वजनिक सभा में इन पुस्तिकाओं के वितरण के बाद जय नारायण व्यास और आनंदराज सुराणा सहित अन्य कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया। सरकार के दमन के बावजूद आंदोलन जारी रहा और 1931 में व्यास तथा उनके साथियों को रिहा किया गया।

व्यास और उनके साथियों ने युवाओं को संगठित किया

सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रभाव से मारवाड़ में राजनीतिक गतिविधियां और तेज हुईं। व्यास और उनके साथियों ने युवाओं को संगठित किया और स्वदेशी व राष्ट्रीय आंदोलन की गतिविधियों को आगे बढ़ाया। इस दौर में मारवाड़ की राजनीति धीरे-धीरे स्थानीय शिकायतों से आगे बढ़कर राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन की व्यापक धारा से जुड़ने लगी।

मारवाड़ प्रजामंडल की स्थापना और लोक परिषद का गठन

मारवाड़ में रियासती शासन के विरुद्ध राजनीतिक संगठनों का विकास 1920 और 1930 के दशक में लगातार हुआ। उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोतों में 1929 में मारवाड़ देशी राज्य लोक परिषद की स्थापना और 1931 में पुष्कर में उसके प्रथम अधिवेशन का उल्लेख मिलता है। इस प्रक्रिया में जय नारायण व्यास, आनंदराज सुराणा और भंवरलाल सर्राफ जैसे कार्यकर्ता सक्रिय रहे।

जनता की भागीदारी की मांग को मजबूत किया

सन 1938 में देशी रियासतों में उत्तरदायी शासन की मांग को नई गति मिली। 16 मई 1938 को मारवाड़ लोक परिषद की नींव रखी गई। इसका उद्देश्य महाराजा की छत्रछाया में उत्तरदायी शासन की स्थापना करना था। परिषद ने किसानों, आम जनता और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के सवालों को उठाया तथा रियासती प्रशासन में जनता की भागीदारी की मांग को मजबूत किया।

सरकार ने परिषद पर प्रतिबंध लगा दिया था

जय नारायण व्यास इस आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल थे। फरवरी 1939 में उन पर लगे प्रतिबंध हटाए गए और उन्हें जोधपुर राज्य में प्रवेश की अनुमति मिली। राज्य सरकार ने उन्हें सलाहकार मंडल में भी शामिल किया। लेकिन अकाल के समय लोक परिषद द्वारा किए गए राहत कार्यों से संगठन की लोकप्रियता बढ़ी और इसके बाद सरकार ने फिर से परिषद पर प्रतिबंध लगा दिया। आंदोलनकारियों की गिरफ्तारियां हुईं और दमन का दौर शुरू हुआ।

संघर्ष की तीव्रता और आंदोलन की चुनौतियां

मारवाड़ लोक परिषद का आंदोलन केवल राजनीतिक अधिकारों तक सीमित नहीं था। किसानों की समस्याएं, अकाल, प्रशासनिक दमन और जागीर क्षेत्रों की कठिनाइयां भी आंदोलन के प्रमुख मुद्दे बने। परिषद ने इन समस्याओं को जनता के बीच उठाया और शासन से राहत तथा उत्तरदायी व्यवस्था की मांग की।

सरकार और लोक परिषद के बीच समझौता हुआ

सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए परिषद को गैरकानूनी घोषित किया और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया। बाद में सरकार और लोक परिषद के बीच समझौता हुआ, जिसके बाद राजनीतिक बंदियों की रिहाई का रास्ता खुला। जेल से बाहर आने के बाद जय नारायण व्यास ने ‘मारवाड़ में उत्तरदायी शासन’ और ‘जोधपुर की स्थिति पर प्रकाश’ जैसी पुस्तिकाओं के माध्यम से राज्य की राजनीतिक स्थिति पर अपनी बात रखी।

परिषद ने सलाहकार परिषद के चुनावों का बहिष्कार किया

नगरपालिका चुनावों में लोक परिषद को बहुमत मिलने के बाद जय नारायण व्यास जोधपुर नगरपालिका के अध्यक्ष चुने गए। यह घटना महत्वपूर्ण थी, क्योंकि इससे स्थानीय निकाय में जनता समर्थित राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका मजबूत हुई। इसके बाद परिषद ने सलाहकार परिषद के चुनावों का बहिष्कार किया और उत्तरदायी सरकार की मांग को लेकर आंदोलन तेज किया।

रियासती सरकार ने आंदोलनकारियों को गिरफ्तार किया

सन 1942 में जब महात्मा गांधी के नेतृत्व में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ, तो उसका प्रभाव मारवाड़ में भी दिखाई दिया। रियासती सरकार ने आंदोलनकारियों को गिरफ्तार किया। जय नारायण व्यास भी गिरफ्तार किए गए और बाद में 28 मई 1944 को जेल से रिहा हुए। इस दौरान मारवाड़ में स्वतंत्रता, नागरिक अधिकार और उत्तरदायी शासन की मांगें एक-दूसरे से जुड़ती चली गईं।

क्रांतिकारी बालमुकुंद बिस्सा की जेल में मृत्यु हो गई

इसी दौर में क्रांतिकारी बालमुकुंद बिस्सा की जेल में हुई मृत्यु ने भी मारवाड़ के आंदोलन को झकझोर दिया। उनके साथ किए गए अमानवीय व्यवहार के विरोध में जोधपुर में आक्रोश फैल गया और रियासती दमन के खिलाफ जनभावना और मजबूत हुई।

मारवाड़ के किसान आंदोलन में नया मोड़ आया

सन 1947 में डाबड़ा कांड ने मारवाड़ के किसान आंदोलन को नया मोड़ दिया। किसान सम्मेलन के दौरान हुए हमले ने रियासती शासन और सामंती शक्तियों के खिलाफ असंतोष को बढ़ाया। इस घटना का उल्लेख राजस्थान के प्रजामंडल और किसान आंदोलनों के इतिहास में महत्वपूर्ण रूप से मिलता है। ऐसे प्रसंगों को प्रस्तुत करते समय शहीदों की संख्या को लेकर अलग-अलग स्रोतों में मिलने वाले दावों के बजाय प्रमाणित नाम और घटना का विवरण देना अधिक उचित है।

स्वतंत्रता के बाद: मंत्रिमंडल और विलय

भारत 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ, लेकिन देशी रियासतों का राजनीतिक एकीकरण अभी बाकी था। जोधपुर रियासत भी इस महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रक्रिया के केंद्र में थी। महाराजा उम्मेद सिंह के निधन के बाद हनुवंत सिंह शासक बने। इस दौर में जोधपुर के भारत के साथ संबंध और रियासत के भविष्य को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज हुईं। अंततः जोधपुर भारतीय संघ में शामिल हुआ।

जय नारायण व्यास और लोक परिषद का संघर्ष जारी रहा

रियासत के भीतर उत्तरदायी शासन की मांग को लेकर जय नारायण व्यास और लोक परिषद का संघर्ष जारी रहा। अंततः व्यास के नेतृत्व में मंत्रिमंडल का गठन हुआ, जिसमें लोक परिषद का प्रभाव था। यह घटना मारवाड़ में जनता के प्रतिनिधित्व की दिशा में महत्वपूर्ण कदम थी।

जोधपुर का राजस्थान में विलय हो गया

इसके बाद राजस्थान के एकीकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ी। 30 मार्च 1949 को राजस्थान संघ का उद्घाटन हुआ और जोधपुर का राजस्थान में विलय हो गया। राजस्थान विधानसभा के आधिकारिक विवरण के अनुसार वर्तमान राजस्थान का गठन इसी व्यापक एकीकरण प्रक्रिया के बाद हुआ, जिसमें राजपूताना की रियासतें और अन्य क्षेत्र शामिल हुए।

राजस्थान का निर्माण किसी एक नेता के प्रयास का परिणाम नहीं था

इस पूरी प्रक्रिया में जय नारायण व्यास की भूमिका महत्वपूर्ण थी, लेकिन राजस्थान का निर्माण किसी एक नेता के प्रयास का परिणाम नहीं था। इसके पीछे प्रजामंडल आंदोलनों, किसान संगठनों, स्वतंत्रता सेनानियों, राष्ट्रीय नेतृत्व और विभिन्न रियासतों के राजनीतिक संघर्षों का लंबा योगदान था।

जय नारायण व्यास: मारवाड़ के शेर कहलाए

जय नारायण व्यास की पहचान केवल एक राजनेता के रूप में नहीं बनी। उन्होंने पत्रकारिता, लेखन, संगठन और जन आंदोलन को राजनीतिक संघर्ष के साधन के रूप में इस्तेमाल किया। रियासती शासन के दौर में जब जनता के राजनीतिक अधिकार सीमित थे, तब उन्होंने उत्तरदायी शासन की मांग को लगातार उठाया।

राजस्थान के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेता माने जाते हैं व्यासजी

उनकी पुस्तिकाओं ने शासन की नीतियों पर सवाल खड़े किए, संगठनों ने जनता को एकजुट किया और आंदोलनों ने राजनीतिक अधिकारों की मांग को व्यापक बनाया। मारवाड़ हितकारिणी सभा से लेकर लोक परिषद तक की गतिविधियों में उनकी भूमिका ने उन्हें राजस्थान के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में स्थान दिलाया।

आज का पाठक क्या समझे

बहरहाल,जय नारायण व्यास की कहानी यह बताती है कि स्वतंत्रता आंदोलन केवल ब्रिटिश शासन के खिलाफ चलने वाला संघर्ष नहीं था। देशी रियासतों में रहने वाली जनता भी अपने अधिकारों, प्रतिनिधित्व और उत्तरदायी शासन के लिए संघर्ष कर रही थी। मारवाड़ में प्रजामंडल और लोक परिषद जैसी संस्थाओं ने जनता को राजनीतिक रूप से संगठित किया। किसानों, युवाओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की भागीदारी से आंदोलन का आधार व्यापक हुआ। जय नारायण व्यास इसी जनजागरण के प्रमुख चेहरों में थे। व्यास जी के अतुलनीय योगदान पर मुहम्मद अल्वी का शेर याद आता है:

हाय वो लोग जो देखे भी नहीं,
याद आएं तो रुला देते हैं।