
Sachindra Nath Bakshi : जानें कौन थे सचिंद्र नाथ बख्शी।
राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां और चंद्रशेखर आजाद जैसे नाम भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास में खूब चर्चित हैं। लेकिन इन्हीं के साथ एक ऐसा नाम भी था, जिसने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ सशस्त्र क्रांति की नींव मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई, उनका नाम है सचिंद्र नाथ बख्शी। काकोरी ट्रेन एक्शन से लेकर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के गठन तक उनका योगदान महत्वपूर्ण था। लंबी जेल की सजा के बावजूद उनका हौसला नहीं टूटा और आजादी के बाद भी उन्होंने सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभाई।
सचिंद्र नाथ बख्शी का जन्म 25 दिसंबर 1904 को बनारस (वर्तमान वाराणसी) में हुआ था। वह उन युवाओं में शामिल थे, जिन्होंने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के वापस लिए जाने के बाद क्रांतिकारी रास्ते को अपनाया।
उस दौर में देश के कई युवा इस बात से निराश थे कि केवल अहिंसक आंदोलनों के जरिए अंग्रेजी शासन को भारत से बाहर निकालना मुश्किल होगा। इन्हीं परिस्थितियों में उत्तर भारत में एक नए क्रांतिकारी संगठन को खड़ा करने की कोशिश शुरू हुई। बख्शी इसी क्रांतिकारी धारा का हिस्सा बने और आगे चलकर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (HRA) के प्रमुख सदस्यों में शामिल हुए।
1920 के दशक की शुरुआत में क्रांतिकारियों का एक समूह अंग्रेजी शासन को सशस्त्र क्रांति के जरिए चुनौती देने की योजना बना रहा था। इसी क्रम में राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, सचिंद्र नाथ बख्शी, सचिंद्रनाथ सान्याल और जोगेश चंद्र चटर्जी जैसे क्रांतिकारियों ने HRA को संगठित किया।
संगठन का उद्देश्य केवल अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालना नहीं था। क्रांतिकारी एक ऐसे स्वतंत्र भारत की कल्पना कर रहे थे, जिसमें जनता की भूमिका महत्वपूर्ण हो और भारत एक गणतांत्रिक व्यवस्था की ओर बढ़े।
1 जनवरी 1925 को HRA का घोषणापत्र ‘द रिवोल्यूशनरी’ जारी हुआ। इसमें संगठन ने संगठित और सशस्त्र क्रांति के जरिए भारत में एक संघीय गणराज्य स्थापित करने की बात कही थी।
क्रांतिकारी संगठन के सामने सबसे बड़ी समस्या सिर्फ अंग्रेजों से लड़ना नहीं थी, बल्कि उसके लिए संसाधन जुटाना भी था। हथियार खरीदने, संगठन चलाने और भूमिगत गतिविधियों को आगे बढ़ाने के लिए धन की जरूरत थी। इसी जरूरत ने HRA को सरकारी खजाने को निशाना बनाने की योजना की तरफ बढ़ाया और फिर आया वह दिन, जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया।
9 अगस्त 1925 को लखनऊ के पास काकोरी में क्रांतिकारियों ने ट्रेन रोककर उसमें ले जाया जा रहा सरकारी खजाना लूट लिया। इस कार्रवाई में राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेंद्र लाहिड़ी, चंद्रशेखर आजाद, सचिंद्र नाथ बख्शी, केशव चक्रवर्ती, मन्मथनाथ गुप्त, मुरारी शर्मा, मुकुंदी लाल और बनवारी लाल सहित कई क्रांतिकारी शामिल थे।
काकोरी की कार्रवाई का मकसद व्यक्तिगत संपत्ति लूटना नहीं था। क्रांतिकारी इसे अंग्रेजी सरकार के धन पर हमला मानते थे और इससे मिलने वाले पैसे का इस्तेमाल संगठन की गतिविधियों के लिए करना चाहते थे। लेकिन कार्रवाई के बाद अंग्रेजी सरकार ने व्यापक दमन शुरू कर दिया। HRA के कई प्रमुख सदस्यों को गिरफ्तार कर लिया गया।
काकोरी मामले में सचिंद्र नाथ बख्शी भी गिरफ्तार किए गए। मुकदमा चला और अदालत ने उन्हें मृत्युदंड के बजाय उम्रकैद की सजा सुनाई। काकोरी मामले में चार प्रमुख क्रांतिकारियों राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह को फांसी दी गई। वहीं बख्शी समेत कई अन्य क्रांतिकारियों को लंबी जेल की सजा मिली। इस तरह वह फांसी से तो बच गए, लेकिन उनके जीवन का एक लंबा हिस्सा जेल की सलाखों के पीछे बीता।
काकोरी के बाद अंग्रेजी सरकार का मकसद साफ था, क्रांतिकारी आंदोलन की कमर तोड़ दी जाए। कई नेताओं को फांसी दी गई और बाकी को लंबी कैद में भेज दिया गया। बख्शी को भी जेल में रखा गया। लेकिन काकोरी मामले में क्रांतिकारियों ने जिस तरह अदालत को अपने विचार रखने के मंच के रूप में इस्तेमाल किया, उससे अंग्रेजी सरकार के खिलाफ उनका संघर्ष और ज्यादा चर्चा में आया। काकोरी के बाद HRA को बड़ा झटका जरूर लगा, लेकिन क्रांतिकारी विचार खत्म नहीं हुए।
1928 तक क्रांतिकारी आंदोलन में एक नई पीढ़ी तेजी से सामने आ चुकी थी। भगत सिंह, सुखदेव, शिव वर्मा और चंद्रशेखर आजाद जैसे युवा क्रांतिकारी संगठन को नए विचारों के साथ आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे थे।
सितंबर 1928 में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में हुई बैठकों के बाद HRA को नए स्वरूप में संगठित किया गया और इसका नाम हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) रखा गया। संगठन के उद्देश्य में समाजवाद को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया।
हालांकि बख्शी उस समय जेल में थे, लेकिन जिस क्रांतिकारी संगठन को उन्होंने शुरुआती दौर में खड़ा करने में योगदान दिया था, वही आगे चलकर भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद की पीढ़ी के हाथों नए रूप में सामने आया।
लंबी कैद के बाद बख्शी 1936 में जेल से बाहर आए। इसके बाद उन्होंने राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन में सक्रिय भूमिका निभाई। आजादी के बाद भी उन्होंने राजनीति में हिस्सा लिया। वह भारतीय जनसंघ से जुड़े और 1969 में वाराणसी दक्षिण विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुने गए। यानी जिस व्यक्ति ने युवावस्था में अंग्रेजी शासन के खिलाफ हथियार उठाए थे, उसने स्वतंत्र भारत में लोकतांत्रिक राजनीति के जरिए सार्वजनिक जीवन में अपनी भूमिका जारी रखी।
सचिंद्र नाथ बख्शी का योगदान किसी एक घटना तक सीमित नहीं था। उन्होंने उस दौर में क्रांतिकारी संगठन को मजबूत करने में भूमिका निभाई, जब अंग्रेजी सरकार ऐसे संगठनों को कुचलने के लिए पूरी ताकत लगा रही थी। HRA की स्थापना और संगठन निर्माण में उनकी भागीदारी, काकोरी ट्रेन एक्शन में उनका हिस्सा और उसके बाद लंबी जेल की सजा उनके संघर्ष के सबसे महत्वपूर्ण अध्याय हैं।
काकोरी की कार्रवाई ने अंग्रेजी सरकार को यह संदेश दिया कि भारत में सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन सिर्फ कुछ अलग-अलग युवाओं की गतिविधि नहीं रहा, बल्कि उसके पीछे संगठित नेटवर्क तैयार हो चुका है। यही नेटवर्क आगे चलकर बदलते विचारों और नई पीढ़ी के साथ HSRA के रूप में सामने आया।
आजादी की कहानी में कुछ क्रांतिकारी नाम जनमानस में बहुत प्रसिद्ध हो गए, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खां जैसे नाम हर भारतीय जानता है। लेकिन इनके पीछे संगठन खड़ा करने और उसे चलाने वाले कई चेहरे धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में पीछे छूट गए। सचिंद्र नाथ बख्शी भी उन्हीं चेहरों में से एक हैं।
उन्होंने अपना युवा जीवन देश की आजादी के लिए संघर्ष में लगाया, काकोरी जैसी ऐतिहासिक कार्रवाई में हिस्सा लिया और वर्षों तक जेल में रहे। उनकी कहानी यह भी बताती है कि स्वतंत्रता संग्राम केवल कुछ महान नेताओं की कहानी नहीं था, बल्कि हजारों ऐसे युवाओं के त्याग का परिणाम था जिनके नाम आज कम सुनाई देते हैं।
सचिंद्र नाथ बख्शी का निधन 23 नवंबर 1984 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में हुआ। वह 79 वर्ष के थे। आज जब काकोरी ट्रेन एक्शन की चर्चा होती है, तो बख्शी का नाम उन क्रांतिकारियों में जरूर लिया जाना चाहिए जिन्होंने अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देने के लिए अपना जीवन दांव पर लगा दिया था।
सचिंद्र नाथ बख्शी की कहानी दरअसल उस पीढ़ी की कहानी है, जिसने आजादी को केवल सपना नहीं माना, बल्कि उसे हासिल करने के लिए जेल, यातना और मौत तक का सामना किया।
Updated on:
14 Aug 2026 04:52 pm
Published on:
14 Aug 2026 04:52 pm
