
हमारे देश में कई मंदिरें हैं, उन मंदिरों में पुजारी पुरुष होते हैं लेकिन आज हम आपको एक ऐसे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां पर पुजारी की भूमिका महिलाएं निभाती हैं। इस मंदिर को श्राप मुक्ति स्थल कहा जाता है। यह मंदिर बिहार के दरभंगा जिले के कमतौल में स्थित है। इस मंदिर में देवी अहिल्या विराजित हैं। रामायण में भी इस घटना का वर्णन मिलता है।
क्यों प्रसिद्ध है मंदिर
यहां आने वाले लोगों का मानना है कि जिस प्रकार गौतम ऋषि के श्राप से पत्थर बनी अहिल्या का उद्धार जनकपुर जाने के दौरान त्रेतायुग में भगवान राम ने अपने चरण से किया था, उसी तरह जिस व्यक्ति के शरीर में अहिला ( मासा की तरह ) होता है, वे रामनवमी के दिन गौतम और अहिल्या स्थान कुंड में स्नान कर अपने कंधे पर बैंगन का भार लेकर मंदिर आते हैं और बैंगन का भार चढ़ाते हैं तो उन्हें अहिला रोग से मुक्ति मिल जाती है।
पति के श्राप से पत्थर बनीं थी अहिल्या
देवी अहिल्या गौतम ऋषि की पत्नी थीं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार स्वर्गलोक के देव इंद्र देवी अहिल्या पर मोहित हो गए। इंद्र इस बात को भी जानते थे कि देवी अहिल्या पतिव्रता स्त्री हैं। इसलिए जब गौतम ऋषि अपने आश्रम में नहीं थे, तब इंद्र ने गौतम ऋषि का वेश धारण करके आश्रम में पहुंच गए। इंद्र जब उनकी कुटिया से निकल रहे थे, उसी वक्त स्नान करके गौतम ऋषि आ गए और अपनी कुटिया से इंद्र को उनके वेष में निकलते देख पहचान लिए।
इसके बाद गौतम ऋषि ने क्रोधवश अपनी पत्नी को पत्थर की शिला बनने का श्राप दे दिया। इसके अलावा गौतम ऋषि ने इंद्र को श्राप दिया कि उनका वैभव नष्ट हो जाएगा। गौतम ऋषि के श्राप के कारण ही इंद्रलोक पर असुरों का अधिकार हो गया था। त्रेता युग में भगवान राम के चरणों के प्रताप से देवी अहिल्या श्राप मुक्त हुईं थीं।
महिला पंडित कराती हैं पूजा
जहां पर भगवान राम ने अहिल्या का उद्धार किया था, आज भी उनकी पीढ़ी वहां पर अवस्थित है और उस जगह पर पुरूष पंडित की जगह महिला पंडित ही पूजा कराती है। ये परंपरा सदियों से चली आ रही है।
Published on:
07 Jan 2020 02:58 pm
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